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‘हमारी संस्कृति में सिख गुरुओं का उल्लेखनीय योगदान’
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केयू की तरफ से आयोजित वेबिनार में हिस्सा लेते वक्ता। संवाद
- फोटो : Kurukshetra
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के आईआईएचएस में एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार आयोजित किया गया। आईआईएचएस के इतिहास विभाग एवउच्च शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास हरियाणा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस वेबिनार का मुख्य विषय सिख गुरुओं का पंजाब इतिहास और संस्कृति (1489-1708) रहा। वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति में सिख गुरुओं का उल्लेखनीय योगदान बताया।
कुलसचिव डॉ. संजीव शर्मा ने सिख धर्म के 10 गुरुओं के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक गुरु ने शिक्षा दी है कि नाम जपो, मेहनत करो और समर्पण की भावना रखो। प्रत्येक सिख अपनी कमाई का दसवां हिस्सा लंगर में समर्पण करे। लंगर की भावना से समाज में भाईचारे की भावना बढ़ती है। मध्यकालीन भारत में जो विकास हुआ वह सिखों का विकास है। सभी सिख गुरुओं के रास्ते पर चलकर समाज में बुराइयों का अंत करें।
मुख्य वक्ता पंजाब विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रिया तोष शर्मा ने बताया कि हमारी संस्कृति में सिख गुरुओं का बहुत योगदान रहा। वीर सावरकर का उदाहरण देकर बताया गया कि भारत में शुरुआत से ही सिंधु नदी को पार करके आगे जाने वाले सारे हिंदुस्तानी कहलाते थे। भारत की संस्कृति सबसे अच्छी रही है। मुख्य अतिथि जगराम सिंह ने कहा कि शोध में सबको साथ मिलकर चलने और घोर चिंतन करना यह गुरु नानक जी का संदेश है का वर्णन किया।
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डॉ. विवेक कोहली ने भारतीय ज्ञान की परंपरा को आगे बढ़ाने के बारे में बताया। इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. गोपाल प्रसाद ने इतिहास शिक्षा में भारतीय दृष्टि के बारे में बताया कि सामाजिक और धार्मिक समरसता की परंपरा सिर्फ सिख धर्म में है।प्रो. रीटा दलाल ने गुरुओं के आध्यात्म का विस्तार से वर्णन किया। इस अवसर पर तकनीकी प्रभारी डॉ. हरिकिशन व डॉ. कुसुम लता आदि मौजूद रहीं।
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कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के आईआईएचएस में एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार आयोजित किया गया। आईआईएचएस के इतिहास विभाग एवउच्च शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास हरियाणा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस वेबिनार का मुख्य विषय सिख गुरुओं का पंजाब इतिहास और संस्कृति (1489-1708) रहा। वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति में सिख गुरुओं का उल्लेखनीय योगदान बताया।
कुलसचिव डॉ. संजीव शर्मा ने सिख धर्म के 10 गुरुओं के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक गुरु ने शिक्षा दी है कि नाम जपो, मेहनत करो और समर्पण की भावना रखो। प्रत्येक सिख अपनी कमाई का दसवां हिस्सा लंगर में समर्पण करे। लंगर की भावना से समाज में भाईचारे की भावना बढ़ती है। मध्यकालीन भारत में जो विकास हुआ वह सिखों का विकास है। सभी सिख गुरुओं के रास्ते पर चलकर समाज में बुराइयों का अंत करें।
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मुख्य वक्ता पंजाब विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रिया तोष शर्मा ने बताया कि हमारी संस्कृति में सिख गुरुओं का बहुत योगदान रहा। वीर सावरकर का उदाहरण देकर बताया गया कि भारत में शुरुआत से ही सिंधु नदी को पार करके आगे जाने वाले सारे हिंदुस्तानी कहलाते थे। भारत की संस्कृति सबसे अच्छी रही है। मुख्य अतिथि जगराम सिंह ने कहा कि शोध में सबको साथ मिलकर चलने और घोर चिंतन करना यह गुरु नानक जी का संदेश है का वर्णन किया।
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डॉ. विवेक कोहली ने भारतीय ज्ञान की परंपरा को आगे बढ़ाने के बारे में बताया। इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. गोपाल प्रसाद ने इतिहास शिक्षा में भारतीय दृष्टि के बारे में बताया कि सामाजिक और धार्मिक समरसता की परंपरा सिर्फ सिख धर्म में है।प्रो. रीटा दलाल ने गुरुओं के आध्यात्म का विस्तार से वर्णन किया। इस अवसर पर तकनीकी प्रभारी डॉ. हरिकिशन व डॉ. कुसुम लता आदि मौजूद रहीं।