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Kurukshetra News: अब शादी कार्ड तक सिमट गया महिला संगीत
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कुरुक्षेत्र। आधुनिकता के दौर में शादियों का स्वरूप भी बदल गया है। समय के साथ रीति-रिवाज और बजट में भी बदलाव हो गया। साथ ही शादी का अंदाज भी बदल गया है। रस्म-रिवाज कम होने के साथ न के बराबर हो चुके हैं।
शादी का महत्वपूर्ण हिस्सा महिला संगीत का स्वरूप भी बदल चुका है। हालांकि अब शादी के कार्ड पर महिला संगीत को जगह दी गई है, मगर उसका महत्व पहले के दौर से बिल्कुल बदल चुका है। 90 के दशक में शादी के 10-15 दिन पहले से ही घर से ढोलकी की थाप पर महिलाओं का संगीत सुनाई देता था। इसमें रिश्तेदारों से लेकर आसपास की महिलाएं भी पूरे चाव के साथ शामिल होती थी। उस दौर में महिला संगीत में फिल्मी गीतों की बजाए लोकगीत को ज्यादा महत्व दिया जाता था। साथ ही इन लोकगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करते थे। हालांकि अब महिला संगीत का पूरा स्वरूप बदल चुका है।
अब शादी से 10-15 दिन पहले चलने वाले महिला संगीत सिर्फ एक दिन तक सिमट गया है। साथ ही इसका स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। आजकल महिला संगीत में ढोलकी की थाप और लोकगीत सुनाई नहीं देते हैं। अब डीजे और फिल्मी गीतों को उसमें शामिल किया गया है। अब सिर्फ एक दिन पहले ही रस्म-रिवाज के तौर पर महिला संगीत चलता है। हालांकि अब भी गांव और छाेटे कस्बों में महिला संगीत कुछ दिन पहले शुरू होता है, मगर उसमें भी घर और आसपड़ोस की महिलाएं ही शामिल होती हैं।
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पूरे गांव और मोहल्ले को पता चलता था घर में शादी का माहौल : कृष्णा देवी, फोटो 48
बुजुर्ग कृष्णा देवी ने बताया कि वो दौर कुछ और था, क्योंकि उस दौर में 20 दिन पहले ही लोग शादी की तैयारी करते थे। रिश्तेदार, खासकर घर की बेटियाें को 15-20 दिन पहले ससुराल से मायके बुलाया जाता था। रात को महिला संगीत में आसपास की महिलाएं शामिल होती थी। पूरे गांव और मोहल्ले को पता चलता था कि इस घर में शादी का माहौल है।
संगीत से पहले मनाए जाते थे गणेशजी : मुकेश रानी
मुकेश रानी ने बताया कि महिला संगीत की शुरुआत में सबसे पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता था। उसके बाद महिलाएं वर-वधू की अच्छी जिंदगी के लिए मंगल गान करती थी। इसमें लोकगीत ज्यादा शामिल होते थे। संगीत के बाद सभी महिलाओं को शगुन के तौर गुलगुले, बताशे, बिस्कुट, लड्डू, बूंदी और नमकीन दिया जाता था।
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शादी का महत्वपूर्ण हिस्सा महिला संगीत का स्वरूप भी बदल चुका है। हालांकि अब शादी के कार्ड पर महिला संगीत को जगह दी गई है, मगर उसका महत्व पहले के दौर से बिल्कुल बदल चुका है। 90 के दशक में शादी के 10-15 दिन पहले से ही घर से ढोलकी की थाप पर महिलाओं का संगीत सुनाई देता था। इसमें रिश्तेदारों से लेकर आसपास की महिलाएं भी पूरे चाव के साथ शामिल होती थी। उस दौर में महिला संगीत में फिल्मी गीतों की बजाए लोकगीत को ज्यादा महत्व दिया जाता था। साथ ही इन लोकगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करते थे। हालांकि अब महिला संगीत का पूरा स्वरूप बदल चुका है।
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अब शादी से 10-15 दिन पहले चलने वाले महिला संगीत सिर्फ एक दिन तक सिमट गया है। साथ ही इसका स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। आजकल महिला संगीत में ढोलकी की थाप और लोकगीत सुनाई नहीं देते हैं। अब डीजे और फिल्मी गीतों को उसमें शामिल किया गया है। अब सिर्फ एक दिन पहले ही रस्म-रिवाज के तौर पर महिला संगीत चलता है। हालांकि अब भी गांव और छाेटे कस्बों में महिला संगीत कुछ दिन पहले शुरू होता है, मगर उसमें भी घर और आसपड़ोस की महिलाएं ही शामिल होती हैं।
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पूरे गांव और मोहल्ले को पता चलता था घर में शादी का माहौल : कृष्णा देवी, फोटो 48
बुजुर्ग कृष्णा देवी ने बताया कि वो दौर कुछ और था, क्योंकि उस दौर में 20 दिन पहले ही लोग शादी की तैयारी करते थे। रिश्तेदार, खासकर घर की बेटियाें को 15-20 दिन पहले ससुराल से मायके बुलाया जाता था। रात को महिला संगीत में आसपास की महिलाएं शामिल होती थी। पूरे गांव और मोहल्ले को पता चलता था कि इस घर में शादी का माहौल है।
संगीत से पहले मनाए जाते थे गणेशजी : मुकेश रानी
मुकेश रानी ने बताया कि महिला संगीत की शुरुआत में सबसे पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता था। उसके बाद महिलाएं वर-वधू की अच्छी जिंदगी के लिए मंगल गान करती थी। इसमें लोकगीत ज्यादा शामिल होते थे। संगीत के बाद सभी महिलाओं को शगुन के तौर गुलगुले, बताशे, बिस्कुट, लड्डू, बूंदी और नमकीन दिया जाता था।