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Kurukshetra News: अब श्रीलंका ने प्राकृतिक खेती की तरफ किया रुख, लागू होगा आचार्य देवव्रत का प्राकृतिक खेती मॉडल
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कुरुक्षेत्र। गुरुकुल कुरुक्षेत्र में प्राकृतिक फार्म का दौरा करते श्रीलंका का प्रतिनिधिमंडल के
कुरुक्षेत्र। प्राकृतिक खेती के प्रति रुझान लगातार बढ़ता जा रहा है। अब यह हमारे देश में ही नहीं विदेशों तक फैलने लगा है। श्रीलंका ने भी प्राकृतिक खेती की ओर रुख कर लिया है, जहां गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत का प्राकृतिक खेती मॉडल लागू किया जाएगा। इसके लिए पहल भी शुरू कर दी गई है। श्रीलंका के उच्चायुक्त मिलिन्दो मोरागोडा, उनकी पत्नी जेनिफर मोरागोडा, पुष्पकुमारा, मिनिस्टर शरत गोडाकांडा, एलजी दिशा नायक आदि ने गुरुकुल के फार्म का दौरा कर प्राकृतिक कृषि और फसलों का बारीकी से मुआयना किया।
यहां गुरुकुल पहुंचने पर उनका निदेशक कर्नल अरुण दत्ता, प्राचार्य सूबे प्रताप सहित व्यवस्थापक रामनिवास आर्य ने जोरदार स्वागत किया। कर्नल दत्ता ने जहां मिलिन्दो को गुरुकुल की शैक्षिक गतिविधियों से अवगत कराया वहीं रामनिवास आर्य और डॉ. हरिओम ने प्राकृतिक खेती से जुड़ी तमाम जानकारी तथ्यों सहित प्रदान की।
इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने कृषि फार्म का निरीक्षण किया और फ्रूट, गेंहू, गन्ना व सब्जियों की फसलों को बारीकी से जाना। मिलिन्दो और उनकी धर्मपत्नी जेनिफर ने प्राकृतिक गन्ने का भी आनंद लिया। उच्चायुक्त ने गुरुकुल फार्म पर धान की फसल के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की।
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बता दें कि श्रीलंका चावल पर बहुत अधिक निर्भर है। पिछले दिनों वहां खेती में मिली असफलता से भारी संकट उत्पन्न हो गया था, जिसके बाद श्रीलंका जैविक और रासायनिक खेती का विकल्प तलाश रहा है। इसी संदर्भ में श्रीलंका के उच्चायुक्त पिछले दिनों राज्यपाल आचार्य देवव्रत से मिले, जहां उन्हें प्राकृतिक खेती के बारे में विस्तार से बताया। प्राकृतिक खेती में चावल की पैदावार जहां 32 क्विंटल प्रति एकड़ तक मिल रही है, जिस पर लागत बहुत कम आती है और पानी की 50 प्रतिशत तक बचत होती है। इन्हीं विशेषताओं को देखते हुए श्रीलंका भी प्राकृतिक खेती को अपनाना चाहता है।
प्राकृतिक खेती फार्म का दौरा करने के बाद उच्चायुक्त ने चर्चा करते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती मॉडल बेहतरीन है। इससे जहां स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद अनाज उत्पन्न होगा वहीं जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बरकरार रहेगी। वे श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को एक पत्र भेजकर प्राकृतिक खेती की विशेषताओं के बारे में अवगत करवाएंगे, साथ ही पत्र के माध्यम से वहां के कृषि विशेषज्ञों और किसानों को प्राकृतिक खेती की ट्रेनिंग दिये जाने का भी अनुरोध करेंगे। उन्होंने बताया कि जैविक खेती के कारण श्रीलंका में खेती की जमीन की उर्वरा शक्ति कमजोर हो गई है, जल स्तर बहुत नीचे जा चुका है। ऐसे हालात में प्राकृतिक खेती ही बेहतर विकल्प है, जिससे वहां के किसानों और जमीन को नया जीवन मिल सकता है।
नेपाल के किसान भी जान चुके हैं प्राकृतिक खेती की बारीकी
गुरुकुल कुरुक्षेत्र में पिछले सप्ताह ही नेपाल के किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल भी पहुंचा था, जहां प्राकृतिक खेती की बारीकियां समझी थीं तो वहीं कृषि विशेषज्ञों से भी चर्चा की थी। प्रतिनिधिमंडल प्राकृतिक खेती के मॉडल को देखकर गदगद हो गया था और नेपाल में भी इसे अपनाने को लेकर भरोसा दिया था। इस प्रतिनिधिमंडल में काठमांडू के 52 सब्जी उत्पादक किसान शामिल थे।
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यहां गुरुकुल पहुंचने पर उनका निदेशक कर्नल अरुण दत्ता, प्राचार्य सूबे प्रताप सहित व्यवस्थापक रामनिवास आर्य ने जोरदार स्वागत किया। कर्नल दत्ता ने जहां मिलिन्दो को गुरुकुल की शैक्षिक गतिविधियों से अवगत कराया वहीं रामनिवास आर्य और डॉ. हरिओम ने प्राकृतिक खेती से जुड़ी तमाम जानकारी तथ्यों सहित प्रदान की।
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इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने कृषि फार्म का निरीक्षण किया और फ्रूट, गेंहू, गन्ना व सब्जियों की फसलों को बारीकी से जाना। मिलिन्दो और उनकी धर्मपत्नी जेनिफर ने प्राकृतिक गन्ने का भी आनंद लिया। उच्चायुक्त ने गुरुकुल फार्म पर धान की फसल के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की।
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बता दें कि श्रीलंका चावल पर बहुत अधिक निर्भर है। पिछले दिनों वहां खेती में मिली असफलता से भारी संकट उत्पन्न हो गया था, जिसके बाद श्रीलंका जैविक और रासायनिक खेती का विकल्प तलाश रहा है। इसी संदर्भ में श्रीलंका के उच्चायुक्त पिछले दिनों राज्यपाल आचार्य देवव्रत से मिले, जहां उन्हें प्राकृतिक खेती के बारे में विस्तार से बताया। प्राकृतिक खेती में चावल की पैदावार जहां 32 क्विंटल प्रति एकड़ तक मिल रही है, जिस पर लागत बहुत कम आती है और पानी की 50 प्रतिशत तक बचत होती है। इन्हीं विशेषताओं को देखते हुए श्रीलंका भी प्राकृतिक खेती को अपनाना चाहता है।
प्राकृतिक खेती फार्म का दौरा करने के बाद उच्चायुक्त ने चर्चा करते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती मॉडल बेहतरीन है। इससे जहां स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद अनाज उत्पन्न होगा वहीं जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बरकरार रहेगी। वे श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को एक पत्र भेजकर प्राकृतिक खेती की विशेषताओं के बारे में अवगत करवाएंगे, साथ ही पत्र के माध्यम से वहां के कृषि विशेषज्ञों और किसानों को प्राकृतिक खेती की ट्रेनिंग दिये जाने का भी अनुरोध करेंगे। उन्होंने बताया कि जैविक खेती के कारण श्रीलंका में खेती की जमीन की उर्वरा शक्ति कमजोर हो गई है, जल स्तर बहुत नीचे जा चुका है। ऐसे हालात में प्राकृतिक खेती ही बेहतर विकल्प है, जिससे वहां के किसानों और जमीन को नया जीवन मिल सकता है।
नेपाल के किसान भी जान चुके हैं प्राकृतिक खेती की बारीकी
गुरुकुल कुरुक्षेत्र में पिछले सप्ताह ही नेपाल के किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल भी पहुंचा था, जहां प्राकृतिक खेती की बारीकियां समझी थीं तो वहीं कृषि विशेषज्ञों से भी चर्चा की थी। प्रतिनिधिमंडल प्राकृतिक खेती के मॉडल को देखकर गदगद हो गया था और नेपाल में भी इसे अपनाने को लेकर भरोसा दिया था। इस प्रतिनिधिमंडल में काठमांडू के 52 सब्जी उत्पादक किसान शामिल थे।