न मिल रहे जन्म प्रमाणपत्र, न ही बन रही पेंशन
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सिविल अस्पताल में जाएं तो जन्म प्रमाण पत्र नहीं मिल रहे है और समाज कल्याण विभाग में जाए तो पेंशन नहीं बन पा रही है। ऐसे में बुजुर्ग लोगों को एक विभाग से दूसरे विभाग में चक्कर लगाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। बिना जन्म प्रमाण पत्र के पेंशन बनाने से जब कर्मचारी व अधिकारी इंकार करते है तो यह पत्र लेने के लिए बुजुर्ग लोगों को सिविल अस्पताल पहुंचना पड़ता है, जहां पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी हाथ खड़े कर रहे है। बुजुर्गों के साथ यह स्थिति पिछले करीब छह माह से बनी हुई है, इसके चलते सैकड़ों बुजुर्ग पेंशन बनवाने से भी वंचित है।
ऐसे हालात सिविल अस्पताल में जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र शाखा में अस्थाई रुप से तैनात उर्दू ट्रांसलेटर (महिला कर्मी) के लंबी छुट्टी पर चले जाने से हुए है। इस महिला कर्मी के लंबी छुट्टी पर जाने के बाद विभाग के पास उर्दू का कोई जानकार उपलब्ध नहीं है और इसका खामियाजा बुजुर्गों को भुगतना पड़ रहा है। हैरानी का विषय यह भी है कि इस समस्या का हल कब होगा, यह जवाब विभाग के पास भी नहीं है। परेशान बुजुर्ग बंता राम, बलदेव सिंह, रचना राम, रामकुमार आदि ने सीएम विंडो पर शिकायत देकर गुहार लगाई है कि यहां उर्दू के अनुवाद के लिए स्थायी कर्मचारी को तैनात किया जाए। लोगों का कहना है कि जन्म प्रमाण पत्र न होने के चलते वह समाज कल्याण विभाग में अपनी पेंशन भी नहीं बनवा पा रहे है। ऐसे में उन्हें सरकार द्वारा पेंशन की दी जा रही सुविधा से भी वंचित होना पड़ रहा है।
हर रोज पहुंच रहे है 5 से 6 बुजुर्ग
लोकनायक जय प्रकाश सिविल अस्पताल में स्थित जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र शाखा में हर रोज 5 से 6 बुजुर्ग जन्म प्रमाण पत्र लेने के लिए पहुंच रहे है, जिनकी जन्म रिकार्ड अनुसार उर्दू भाषा में ही दर्ज है।
1 सितंबर से छुट्टी पर, आगे सेक्शन भी नहीं
उर्दू के अनुवाद के लिए विभाग द्वारा यहां तैनात की गई महिला कर्मी प्रोमिला जहां पिछले वर्ष 1 सितंबर से मैटरनिटी लीव पर है तो वहीं 30 पिछले वर्ष 30 सितंबर को उनकी सेक्शन भी समाप्त हो चुकी है। हालांकि उन्होंने 28 फरवरी 2017 तक छुट्टी ली हुई है। इतने लंबे समय तक उनके छुट्टी पर होने के चलते विभाग के पास कोई अन्य कर्मी नहीं है, जो उर्दू का अनुवाद कर सके। जिसके चलते विभाग के हाथ-पांव फूले हुए है। आगे विभाग ने सेक्शन नहीं दी तो समस्या विकट होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
यहां झेलनी पड़ रही बुजुर्गों को भारी परेशानी : इंद्रजीत
लाडवा से अपनी सास का जन्म प्रमाण पत्र लेने पहुंचे इंद्रजीत का कहना है कि अधिकतर बुजुर्गों के नाम उर्दू भाषा में ही दर्ज है। यहां इस भाषा का दूसरा कोई अनुवादक न होने से बुजुर्गों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
सरकार तत्काल उठाए कदम : हरगोबिंद
यहां प्रमाण पत्र लेने आए गांव संदोला निवासी हरगोबिंद सिंह का कहना है कि सरकार बुजुर्गों को सम्मान देने के दावे कर रही है, लेकिन यहां उन्हें अपमान जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। दूर-दराज से आने पर उन्हें उर्दू अनुवादक न होने के कारण खाली हाथ लौटने को मजबूर होना पड़ रहा है। इन्हें राहत देेने के लिए सरकार को तत्काल कोई कदम उठाना चाहिए।
उर्दू के अलावा प्रमाण पत्रों में नहीं कोई दिक्कत : कर्मवीर सिंह
जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र शाखा में स्टेटिकल असिस्टेंट कर्मबीर सिंह का कहना है कि यहां सिर्फ उर्दू भाषा में दर्ज रिकार्ड को लेकर ही समस्या है। इसके बाद के दर्ज रिकार्ड के अनुसार प्रमाण पत्र हर रोज बनाए जा रहे है। उर्दू का स्थायी अनुवादक न होने के कारण विभाग भी असहाय सा साबित हो रहा है। उर्दू के अनुवाद के लिए भी कई-कई दिनों का रिकार्ड पूरा करवाने के लिए उन्हें कभी-कभार बुलाया जाता है।
सेक्शन के लिए की गई है मांग : डॉ एनपी सिंह
अतिरिक्त जिला रजिस्ट्रार (जन्म-मृत्यु) डॉ एनपी सिंह का कहना है कि शाखा में उर्दू अनुवाद के लिए अस्थाई तौर पर तैनात कर्मी की सेक्शन पिछले वर्ष 30 सितंबर तक ही थी। अभी उन्होंने मैटरनिटी लीव के बाद 28 फरवरी को वापस आना है, लेकिन विभाग आगे सेक्शन देगा या नहीं, यह अभी कहा नहीं जा सकता। उनके छुट्टी पर होने के चलते ही जिन बुजुर्गों के नाम उर्दू भाषा के रिकार्ड में है, उन्हें ही परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।