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Kurukshetra News: कोई भी देश अपनी भाषा के बिना नहीं कर सकता अपने स्वरूप का निर्माण
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कुरुक्षेत्र। डॉ कृष्ण कुमार।
कुरुक्षेत्र। कोई भी देश अपनी मातृ भाषा के बिना अपने स्वरूप का निर्माण नहीं कर सकता। मातृ भाषा के जरिये ही हम वास्तविक रूप में आगे बढ़ सकते हैं। यह कहना है राजकीय महिला कॉलेज पलवल के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्ण कुमार का।
14 सितंबर को मनाए जाने वाले हिंदी दिवस पर उन्होंने कहा कि यह दिन हमें हिंदी की आवश्यकता व महत्ता को याद दिलाता है। इस दिन हमें हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए संकल्प लेने की जरूरत है। यही नहीं हर दिन ही ऐसा होना चाहिए जिस पर हम अपनी मातृभाषा के गौरव को बढ़ा सकें। उनका कहना है कि अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए व विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को समझने के लिए भले ही हम दूसरी भाषाओं को सीखें और प्रयोग करें लेकिन साहित्य कलाएं ही वास्तव में मानवीय छाप लगाती है और यह अपनी मातृभाषा से ही संभव हो सकता है। क्योंकि किसी भी क्षेत्र में विकास के लिए चिंतन बेहद जरूरी है, जो मातृभाषा में ही संभव है। चिंतन से विद्वता बढ़ती है और उससे देश आगे बढ़ता है।
डॉ. कृष्ण कुमार बताते हैं कि हिंदी के प्रति हमारी चेतना आज भी उम्मीद के अनुसार नहीं बढ़ पाई है। हालांकि चीजें बदल रही है लेकिन इसकी गति बेहद धीमी है। यहां तक कि वोटर भाषा से लेकर नोटिंग भाषा तक हिंदी ही होनी चाहिए। हमें न्यायिक भाषा हिंदी होने की ओर कदम उठाए हैं लेकिन अभी तक पूरी तरह से सार्थक नहीं हो पाए हैं। डॉ कृष्ण कुमार बताते हैं कि हमारे देश के दक्षिणी राज्य अपनी भाषा के प्रति ज्यादा सचेत रहते हैं और यही कारण है कि उनकी मातृभाषा में ही पढाई होती है।
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अंग्रेजी भाषा में ही माना जा रहा कॅरिअर
डॉ. कृष्ण कुमार बताते हैं कि युवा अंग्रेजी भाषा में ही अपना कॅरिअर मानते हैं जिसके पीछे सरकारों की रही सोच ही जिम्मेदार है। सरकार को हिंदी की पढ़ाई अनिवार्य व अंग्रेजी को एच्छिक रखना चाहिए। इससे बड़ा बदलाव होगा और हिंदी की महत्ता बढ़ेगी।
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14 सितंबर को मनाए जाने वाले हिंदी दिवस पर उन्होंने कहा कि यह दिन हमें हिंदी की आवश्यकता व महत्ता को याद दिलाता है। इस दिन हमें हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए संकल्प लेने की जरूरत है। यही नहीं हर दिन ही ऐसा होना चाहिए जिस पर हम अपनी मातृभाषा के गौरव को बढ़ा सकें। उनका कहना है कि अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए व विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को समझने के लिए भले ही हम दूसरी भाषाओं को सीखें और प्रयोग करें लेकिन साहित्य कलाएं ही वास्तव में मानवीय छाप लगाती है और यह अपनी मातृभाषा से ही संभव हो सकता है। क्योंकि किसी भी क्षेत्र में विकास के लिए चिंतन बेहद जरूरी है, जो मातृभाषा में ही संभव है। चिंतन से विद्वता बढ़ती है और उससे देश आगे बढ़ता है।
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डॉ. कृष्ण कुमार बताते हैं कि हिंदी के प्रति हमारी चेतना आज भी उम्मीद के अनुसार नहीं बढ़ पाई है। हालांकि चीजें बदल रही है लेकिन इसकी गति बेहद धीमी है। यहां तक कि वोटर भाषा से लेकर नोटिंग भाषा तक हिंदी ही होनी चाहिए। हमें न्यायिक भाषा हिंदी होने की ओर कदम उठाए हैं लेकिन अभी तक पूरी तरह से सार्थक नहीं हो पाए हैं। डॉ कृष्ण कुमार बताते हैं कि हमारे देश के दक्षिणी राज्य अपनी भाषा के प्रति ज्यादा सचेत रहते हैं और यही कारण है कि उनकी मातृभाषा में ही पढाई होती है।
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अंग्रेजी भाषा में ही माना जा रहा कॅरिअर
डॉ. कृष्ण कुमार बताते हैं कि युवा अंग्रेजी भाषा में ही अपना कॅरिअर मानते हैं जिसके पीछे सरकारों की रही सोच ही जिम्मेदार है। सरकार को हिंदी की पढ़ाई अनिवार्य व अंग्रेजी को एच्छिक रखना चाहिए। इससे बड़ा बदलाव होगा और हिंदी की महत्ता बढ़ेगी।