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मनरेगा मजूदर यूनियन क सदस्यों ने दिया धरना जताया रोष
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मनरेगा मजदूर यूनियन जिला इकाई द्वारा मंगलवार को यूनियन का स्थापना दिवस मनाया गया। इस दौरान मनरेगा मजदूर विभिन्न समस्याओं को लेकर नये बस अड्डे से प्रदर्शन करते हुए लघु सचिवालय पहुंचे और धरना दिया। धरने की अध्यक्षता राज्य प्रधान नरेश कुमार ने की।
उन्होंने कहा कि प्रदेश में मनरेगा कानून के तहत ग्रामीण मजदूरों को साल में 100 दिन के रोजगार गारंटी के अधिकार का हनन किया जा रहा है। मौजूदा वित्तीय वर्ष 31 मार्च 2022 को खत्म होने वाला है, लेकिन मनरेगा काम पाने के इच्छुक सभी मजदूरों को 100 दिन का काम नहीं दिया गया है। मनरेगा अफसरों के पास मजदूर काम की मांग करके थक चुके हैं। आरोप है कि जिला प्रशासन द्वारा मनमर्जी से काम दिया जाता है। जिस वक्त मजदूरों को खेतों में काम उपलब्ध होता है उसी वक्त मनरेगा का भी काम दे दिया जाता है, जिससे समस्या पैदा हो जाती है। कहा कि मनरेगा के नियमानुसार यदि काम नहीं दिया जाता तो बेरोजगारी भत्ता दिया जाए। मनरेगा कार्यस्थल दूर होने पर मजदूरों को आने जाने में बहुत कठिनाई होती है और बहुत समय बर्बाद होता है। मनरेगा काम के दौरान कोई दुर्घटना होने पर जिसमें मजदूर की जान चली जाती है या फिर दिव्यांग हो जाता है, उस स्थिति में मनरेगा मजदूर को आर्थिक सहायता बहुत कम दी जाती है। यूनियन मांग करती है की कार्यस्थल पर मनरेगा मजदूर की मृत्यु या दिव्यांगता की स्थिति में न्यूनतम 20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता तथा पीड़ित परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए। धरने को संबोधित करते हुए यूनियन के जिला उपप्रधान रोशन लाल ने कहा कि अभी तक तो पिछले वित्तीय वर्ष की मजदूरी भी प्राप्त करनी बकाया है, लेकिन सरकार ने आने वाले वित्तीय वर्ष में मनरेगा का बजट पहले से भी कम कर दिया है, जबकि आवश्यकता बजट को बढ़ाने की थी। इस दौरान मांगो को लेकर प्रदेश सरकार के नाम सीटीएम चंद्रकांत कटारिया को ज्ञापन भी सौंपा गया। मनरेगा मजदूर यूनियन के जिला प्रधान मेवाराम ने धरने का संचालन किया किया।
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उन्होंने कहा कि प्रदेश में मनरेगा कानून के तहत ग्रामीण मजदूरों को साल में 100 दिन के रोजगार गारंटी के अधिकार का हनन किया जा रहा है। मौजूदा वित्तीय वर्ष 31 मार्च 2022 को खत्म होने वाला है, लेकिन मनरेगा काम पाने के इच्छुक सभी मजदूरों को 100 दिन का काम नहीं दिया गया है। मनरेगा अफसरों के पास मजदूर काम की मांग करके थक चुके हैं। आरोप है कि जिला प्रशासन द्वारा मनमर्जी से काम दिया जाता है। जिस वक्त मजदूरों को खेतों में काम उपलब्ध होता है उसी वक्त मनरेगा का भी काम दे दिया जाता है, जिससे समस्या पैदा हो जाती है। कहा कि मनरेगा के नियमानुसार यदि काम नहीं दिया जाता तो बेरोजगारी भत्ता दिया जाए। मनरेगा कार्यस्थल दूर होने पर मजदूरों को आने जाने में बहुत कठिनाई होती है और बहुत समय बर्बाद होता है। मनरेगा काम के दौरान कोई दुर्घटना होने पर जिसमें मजदूर की जान चली जाती है या फिर दिव्यांग हो जाता है, उस स्थिति में मनरेगा मजदूर को आर्थिक सहायता बहुत कम दी जाती है। यूनियन मांग करती है की कार्यस्थल पर मनरेगा मजदूर की मृत्यु या दिव्यांगता की स्थिति में न्यूनतम 20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता तथा पीड़ित परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए। धरने को संबोधित करते हुए यूनियन के जिला उपप्रधान रोशन लाल ने कहा कि अभी तक तो पिछले वित्तीय वर्ष की मजदूरी भी प्राप्त करनी बकाया है, लेकिन सरकार ने आने वाले वित्तीय वर्ष में मनरेगा का बजट पहले से भी कम कर दिया है, जबकि आवश्यकता बजट को बढ़ाने की थी। इस दौरान मांगो को लेकर प्रदेश सरकार के नाम सीटीएम चंद्रकांत कटारिया को ज्ञापन भी सौंपा गया। मनरेगा मजदूर यूनियन के जिला प्रधान मेवाराम ने धरने का संचालन किया किया।
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