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Kurukshetra News: विद्यार्थियों को उद्यमिता, आत्मनिर्भरता और सतत कृषि की दिशा में किया प्रेरित
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कुरुक्षेत्र। खेती के बारे में विद्यार्थियों को जानकारी देते शिक्षक। संवाद
कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड एंड ऑनर्स स्टडीज (आईआईएचएस) में जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 18 और 19 फरवरी को दो दिवसीय विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को ऑर्गेनिक खेती के क्षेत्र में व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करना और उन्हें उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना रहा। कार्यक्रम का आयोजन बॉटनी विभाग की ओर से विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल गुप्ता व डॉ. शिवानी वर्मा के मार्गदर्शन में किया गया।
मुख्य अतिथि संस्थान की प्राचार्या प्रो. रीटा रहीं। उन्होंने वोकेशनल कोर्स (ऑर्गेनिक खेती) के विद्यार्थियों को कहा कि वर्तमान समय में जैविक खेती केवल खेती की एक पद्धति नहीं बल्कि स्वस्थ जीवनशैली, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे इस क्षेत्र में नवाचार को अपनाते हुए स्वरोजगार की संभावनाओं को पहचानें और समाज के लिए उपयोगी कार्य करें।
ऑर्गेनिक खेती की उपयोगिता को व्यवहार में समझाने के लिए डॉ. शिवानी वर्मा के निर्देशन में विश्वविद्यालय परिसर में सरसों, पालक, मेथी, मूली, गाजर, चुकंदर, सलाद पत्ता (लेट्यूस), फ्रांस बींस, ब्रोकली, पत्तागोभी, चना, लहसुन, धनिया, शलजम एवं फूलगोभी जैसी फसलों का उत्पादन पूर्णतः बिना रासायनिक उर्वरकों के किया गया। इस प्रक्रिया के माध्यम से विद्यार्थियों को प्राकृतिक संसाधनों के सही उपयोग का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ।
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विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल गुप्ता ने जानकारी दी कि फसलों की उर्वरता और सुरक्षा के लिए वर्मी कम्पोस्ट, नीम खली और बोनमील का प्रयोग किया गया, जबकि कीट एवं रोग नियंत्रण हेतु नीम के अर्क का उपयोग किया गया। उन्होंने बताया कि जैविक पद्धति से तैयार उत्पाद पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ रसायन मुक्त और स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया और जैविक खेती की आधुनिक तकनीकों से परिचित हुए। इस मौके पर प्रो. अनीता दुआ, प्रो. अमृत, प्रो. अश्विनी मित्तल, डॉ. कुलविंदर, डॉ. संजीव गौतम सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।
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मुख्य अतिथि संस्थान की प्राचार्या प्रो. रीटा रहीं। उन्होंने वोकेशनल कोर्स (ऑर्गेनिक खेती) के विद्यार्थियों को कहा कि वर्तमान समय में जैविक खेती केवल खेती की एक पद्धति नहीं बल्कि स्वस्थ जीवनशैली, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे इस क्षेत्र में नवाचार को अपनाते हुए स्वरोजगार की संभावनाओं को पहचानें और समाज के लिए उपयोगी कार्य करें।
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ऑर्गेनिक खेती की उपयोगिता को व्यवहार में समझाने के लिए डॉ. शिवानी वर्मा के निर्देशन में विश्वविद्यालय परिसर में सरसों, पालक, मेथी, मूली, गाजर, चुकंदर, सलाद पत्ता (लेट्यूस), फ्रांस बींस, ब्रोकली, पत्तागोभी, चना, लहसुन, धनिया, शलजम एवं फूलगोभी जैसी फसलों का उत्पादन पूर्णतः बिना रासायनिक उर्वरकों के किया गया। इस प्रक्रिया के माध्यम से विद्यार्थियों को प्राकृतिक संसाधनों के सही उपयोग का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ।
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विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल गुप्ता ने जानकारी दी कि फसलों की उर्वरता और सुरक्षा के लिए वर्मी कम्पोस्ट, नीम खली और बोनमील का प्रयोग किया गया, जबकि कीट एवं रोग नियंत्रण हेतु नीम के अर्क का उपयोग किया गया। उन्होंने बताया कि जैविक पद्धति से तैयार उत्पाद पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ रसायन मुक्त और स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया और जैविक खेती की आधुनिक तकनीकों से परिचित हुए। इस मौके पर प्रो. अनीता दुआ, प्रो. अमृत, प्रो. अश्विनी मित्तल, डॉ. कुलविंदर, डॉ. संजीव गौतम सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

कुरुक्षेत्र। खेती के बारे में विद्यार्थियों को जानकारी देते शिक्षक। संवाद