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समाज के उत्थान में भाषा का महत्वपूर्ण योगदान
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केयू आयोजित कांफ्रेंस को संबोधित करते वीसी प्रो. सोमनाथ सचदेवा। संवाद
- फोटो : Kurukshetra
संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। समाज के उत्थान में विज्ञान एवं तकनीक से ज्यादा भाषा का महत्वपूर्ण योगदान है। विज्ञान एवं तकनीक जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में सहायता तो कर सकती है, लेकिन भाषा के माध्यम से मनुष्य समाज से जुड़कर संस्कृति, संस्कार व जीवन मूल्यों में अपना अहम योगदान दे सकता है। यह कहना है कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा का। वे बुधवार को पंजाबी विभाग, पंजाबी भाषा विज्ञान संघ तथा पटियाला एवं पंजाब कला परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कांफ्रेंस में संबोधित कर रहे थे।
गुरु तेग बहादुर की 400वीं जयंती को समर्पित तीन दिवसीय आठवीं अखिल भारतीय भाषा विज्ञान और लोकधारा कांफ्रेंस का विषय ‘21वीं सदी में भाषा विज्ञान और लोकधारा में आ रहे परिवर्तन’ रखा गया। इसके साथ ही लेखक डॉ. जीतेंदर सिंह की ‘नाटक राहे भाषा विज्ञान’ पुस्तक का विमोचन भी किया गया। पंजाबी लेखक एवं पंजाब कला परिषद के अध्यक्ष (पद्मश्री) डॉ. सुरजीत पातर ने कहा कि समय के साथ भाषाएं बदलती हैं। एक भाषा के रूप में पंजाबी कभी निर्जीव नहीं होगी, क्योंकि पंजाबी भाषा बोलने वाले इसकी ताकत और सांस्कृतिक मूल्य जानते हैं।
मुख्य वक्ता अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रो. मोहम्मद जहांगीर वारसी ने कहा कि सृजनात्मक एवं आलोचनात्मक समझ के लिए भाषा का वैज्ञानिक ज्ञान जरूरी है। भाषा जानने के लिए उसे वैज्ञानिक तौर पर जानना जरूरी है। भाषा के आधार पर भारत पूर विश्व में अमीर है। युवा पीढ़ी को अपनी विरासत एवं संस्कृति को जानने एवं पहचानने की आवश्यकता है।
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आईपीएस डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि ज्ञान से बड़ा कोई शुद्धिकरण नहीं है। किसी भी भाषा के व्याकरण एवं संरचना को भाषा विज्ञान कहा जाता है, लेकिन भाषा विज्ञान एवं दर्शन दोनों अलग है। भविष्य में भाषा दर्शन का ज्ञान प्रसार में बहुत बड़ा योगदान रहेगा। मनुष्य के व्यवहार, आचार में लोकधारा का महत्व है तथा लोकधारा को भाषा विज्ञान के माध्यम से ही समझा जा सकता है। पंजाबी भाषा विज्ञान संघ के अध्यक्ष डॉ. भूपेंद्र सिंह खैरा ने कहा कविता में लिखे शब्दों के उच्च स्तर को समझने की क्षमता भाषा की समझ के अनुसार होती है। भाषा समझ का आधार है यह केवल लिखने व पढ़ने तक ही सीमित नहीं है।
पंजाबी विभाग के अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह ने कहा कि जिस राष्ट्र की भाषा और साहित्य का क्षरण होता है, उसकी संस्कृति और भाषा का पतन होना भी तय है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में भाषा, संस्कृति और साहित्य के क्षरण के प्रति जागरूकता लाना है। इस अवसर पर डॉ. परमजीत कौर, प्रो. बृजेश साहनी, प्रो. सुभाष, डॉ. कामराज सिंधु, प्रो. हरसिमरन रंधावा, प्रो. तेजेंद्र शर्मा, डॉ. महासिंह पूनिया, डॉ. जितेंद्र, डॉ. रविंद्र गासो, प्रो. नरेंद्र सिंह कौशल, विकास सभ्रवाल, डॉ. हुकम सिंह आदि मौजूद रहे।
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कुरुक्षेत्र। समाज के उत्थान में विज्ञान एवं तकनीक से ज्यादा भाषा का महत्वपूर्ण योगदान है। विज्ञान एवं तकनीक जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में सहायता तो कर सकती है, लेकिन भाषा के माध्यम से मनुष्य समाज से जुड़कर संस्कृति, संस्कार व जीवन मूल्यों में अपना अहम योगदान दे सकता है। यह कहना है कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा का। वे बुधवार को पंजाबी विभाग, पंजाबी भाषा विज्ञान संघ तथा पटियाला एवं पंजाब कला परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कांफ्रेंस में संबोधित कर रहे थे।
गुरु तेग बहादुर की 400वीं जयंती को समर्पित तीन दिवसीय आठवीं अखिल भारतीय भाषा विज्ञान और लोकधारा कांफ्रेंस का विषय ‘21वीं सदी में भाषा विज्ञान और लोकधारा में आ रहे परिवर्तन’ रखा गया। इसके साथ ही लेखक डॉ. जीतेंदर सिंह की ‘नाटक राहे भाषा विज्ञान’ पुस्तक का विमोचन भी किया गया। पंजाबी लेखक एवं पंजाब कला परिषद के अध्यक्ष (पद्मश्री) डॉ. सुरजीत पातर ने कहा कि समय के साथ भाषाएं बदलती हैं। एक भाषा के रूप में पंजाबी कभी निर्जीव नहीं होगी, क्योंकि पंजाबी भाषा बोलने वाले इसकी ताकत और सांस्कृतिक मूल्य जानते हैं।
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मुख्य वक्ता अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रो. मोहम्मद जहांगीर वारसी ने कहा कि सृजनात्मक एवं आलोचनात्मक समझ के लिए भाषा का वैज्ञानिक ज्ञान जरूरी है। भाषा जानने के लिए उसे वैज्ञानिक तौर पर जानना जरूरी है। भाषा के आधार पर भारत पूर विश्व में अमीर है। युवा पीढ़ी को अपनी विरासत एवं संस्कृति को जानने एवं पहचानने की आवश्यकता है।
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आईपीएस डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि ज्ञान से बड़ा कोई शुद्धिकरण नहीं है। किसी भी भाषा के व्याकरण एवं संरचना को भाषा विज्ञान कहा जाता है, लेकिन भाषा विज्ञान एवं दर्शन दोनों अलग है। भविष्य में भाषा दर्शन का ज्ञान प्रसार में बहुत बड़ा योगदान रहेगा। मनुष्य के व्यवहार, आचार में लोकधारा का महत्व है तथा लोकधारा को भाषा विज्ञान के माध्यम से ही समझा जा सकता है। पंजाबी भाषा विज्ञान संघ के अध्यक्ष डॉ. भूपेंद्र सिंह खैरा ने कहा कविता में लिखे शब्दों के उच्च स्तर को समझने की क्षमता भाषा की समझ के अनुसार होती है। भाषा समझ का आधार है यह केवल लिखने व पढ़ने तक ही सीमित नहीं है।
पंजाबी विभाग के अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह ने कहा कि जिस राष्ट्र की भाषा और साहित्य का क्षरण होता है, उसकी संस्कृति और भाषा का पतन होना भी तय है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में भाषा, संस्कृति और साहित्य के क्षरण के प्रति जागरूकता लाना है। इस अवसर पर डॉ. परमजीत कौर, प्रो. बृजेश साहनी, प्रो. सुभाष, डॉ. कामराज सिंधु, प्रो. हरसिमरन रंधावा, प्रो. तेजेंद्र शर्मा, डॉ. महासिंह पूनिया, डॉ. जितेंद्र, डॉ. रविंद्र गासो, प्रो. नरेंद्र सिंह कौशल, विकास सभ्रवाल, डॉ. हुकम सिंह आदि मौजूद रहे।