फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Kurukshetra News ›   Health are hurting the traditional vehicle, Kurukshetra

सेहत बिगाड़ रहे परंपरागत वाहन

Sun, 09 Oct 2016 12:33 AM IST
ब्यूरो/कुरुक्षेत्र,अमर उजाला
ब्यूरो/कुरुक्षेत्र,अमर उजाला Updated Sun, 09 Oct 2016 12:33 AM IST
विज्ञापन
Health are hurting the traditional vehicle, Kurukshetra
वाहन। - फोटो : अमर उजाला

विज्ञापन
सड़कों पर बढ़ रहे वाहनों का धुआं लोगों को बीमारी की चपेट में ले रहा है। लेकिन, प्रशासनिक विभागों की हालत ऐसी है कि वह इस दिशा में न तो लोगों को जागरूक कर पा रहे हैं और न ही इसकी रोकथाम के लिए ही कोई उपाय तलाशा जा रहा है। इससे लोगों को कैंसर जैसी भयानक बीमारियां भी हो रही हैं। वाहनों के धुएं से बीमार होते शहर की खास रिपोर्ट :-

शहर की जनसंख्या करीब 2 लाख के आसपास है और वाहनों की संख्या करीब 70 हजार के आसपास है। शहर की सड़कों पर दिन रात दौड़ते हजारों वाहन सफर आसान करने के साथ ही शहर के लोगों के लिए बीमारियों का धुआं भी छोड़ रहे हैं। यह शहर की तबीयत पर भारी पड़ रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो वाहनों से निकलने वाला धुआं पर्यावरण के साथ ही सीधे लोगों के स्वास्थ्य पर असर कर रहा है।
विज्ञापन


ऐसे बिगड़ रही है सेहत
विशेषज्ञों के मुताबिक 90 प्रतिशत यातायात परंपरागत ईंधन वाहनों पर ही निर्भर है। जिले में डीजल के वाहनों की संख्या पेट्रोल के वाहनों की संख्या से 7 गुना ज्यादा है। पेट्रोल और डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआं लेड, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन यौगिक, नाइट्रोजन ऑक्साइड, शीशा और एल्डिहाइड सहित कई गैस निकलती हैं। धुएं में सबसे ज्यादा करीब 90 प्रतिशत तक कॉर्बन मोनोऑक्साइड होता है। धुएं के संपर्क में लगातार आने से अस्थमा, एलर्जी,चर्म रोग, आंखों में जलन जैसी सामान्य तकलीफ तो होती ही है। व्यक्ति को लंग और किडनी में कैंसर भी हो सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


एलएनजेपी अस्पताल के डॉ. शैलेंद्र शैली के मुताबिक वाहनों के धुएं में लेड सबसे ज्यादा गंभीर साबित हो सकती है। लेड व्यक्ति की लीवर को खराब कर सकता है। इसका असर नसों पर भी होता है। इससे रक्त संचार में भी बाधा आ सकती है। इसी तरह कॉर्बन मोनोऑक्साइड खून में जाकर हिमोग्लोबिन से मिलकर नया मिश्रण बनाने लगती है। यह मिश्रण शरीर में ऑक्सीजन को रोकने का काम करता है। ऑक्सीजन की कमी से सांस लेने में दिक्कत होती है। यदि यह दिक्कत बढ़ जाए तो व्यक्ति का दम भी घुट सकता है। इसी तरह हाइड्रोकॉर्बन यौगिक एंटी ऑक्सीजेंट को प्रभावित करते हैं। इससे किसी भी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधी क्षमता भी कम हो जाती है। इससे कई तरह की बीमारियां उसे जकड़ सकती हैं। धुएं में हैवी मेटल्स होते हैं जो शरीर के लिए बेहद नुकसानदायक हो सकते हैं। लेड से शरीर में आनुवंशिक विकार भी पैदा हो सकते हैं।

हर वर्ष बढ़ता है रोगियों का प्रतिशत
डॉ. शैली के मुताबिक अस्थमा के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही हैं। यदि अकेले कुरुक्षेत्र जिले में इस संख्या पर नजर डाले तो आंकड़ा करीब एक लाख से ऊपर तक जाता है। इसी तरह यह धुआं चर्म रोगियों की तादाद भी बढ़ाता है। शहर में करीब 2 से 3 प्रतिशत लोग किसी न किसी तरह के चर्मरोग से पीड़ित हैं। इसी तरह एलर्जी के रोगियों की संख्या भी शहर में करीब 10 प्रतिशत तक है।  

तय मापक से ज्यादा है प्रदूषण
कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विभाग की ओर से किए गए रिसर्च के मुताबिक शहर के वातावरण में तय मात्रा से ज्यादा प्रदूषण है। हवा में कॉर्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा 2000 माइक्रोग्राम प्रतिघन मीटर से कम होनी चाहिए। लेकिन इसकी मात्रा करीब करीब डेढ़ से दोगुनी तक हैं। पिपली सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र है। इसका कारण यहां 24 घंटे वाहनों का आवागमन रहना है।


ऐसे हो सकता है बचाव
-शहर में ई रिक्शा का चलन बढ़ने से प्रदूषण में कमी हो सकती है
-परंपरागत ईंधन से चलने वाले वाहनों का उचित रखरखाव समय समय पर हो
-वाहनों की इंजन की गुणवत्ता को बढ़ाकर
-सार्वजनिक यातायात प्रणाली में सुधार करके
-अत्यधिक प्रदूषणकारी वाहनों को सड़कों से चरणबद्ध तरीके से हटाना
-कम प्रदूषणकारी ईंधन जैसे सीएनजी, एलपीजी आदि का उपयोग
-धुएं के प्रभाव से बचने के लिए मुंह पर कपड़ा या मास्क पहने
- आंखों को बचाने के लिए चश्मे का उपयोग करें।

ट्रैफिक पोल्युशन के मामले में भारत दुनिया में छठे नंबर पर है। शहर में 10 प्रतिशत तक लोगों को सांस की कोई न कोई बीमारी है। फेफड़ों के कैंसर व दमा का कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं भी है। व्यक्ति को चाहिए कि कोई भी तकलीफ होने पर तुरंत डॉक्टर की सलाह ले और उचित इलाज कराएं।
-डॉ. शैलेंद्र ममगाई शैली, हृदय एवं छाती रोग विशेषज्ञ

वाहनों का रजिस्ट्रेशन नियमों को पूरा करने के बाद ही होता है। इसमें प्रदूषण की जांच भी शामिल होती है। वाहनों की संख्या हर वर्ष बढ़ती ही हैं।
-नरेंद्र पाल, आरटीए, कुरुक्षेत्र

फिलहाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ऐसा कोई सर्वे नहीं कराया है, जिससे यह पता चले कि वातावरण में कितना प्रदूषण शामिल है।
-कमलजीत, एसडीओ, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

वाहनों की जांच का जिम्मा ट्रैफिक पुलिस का होता है। वही ऐसे वाहनों पर कार्रवाई भी करते हैं। इस बारे में वह ही ज्यादा बता सकते हैं।
-सतेंद्रपाल, रीजनल ऑफिसर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed