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शहर को पॉलीथिन मुक्त करने की योजना ठंडे बस्ते में, बैठक के 10 दिन बाद भी नहीं हुए एक भी चालान
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शहर को पॉलीथिन मुक्त करने की योजना अधिकारियों द्वारा बैठक बुलाकर बड़े-बड़े दावे करने के बाद फिर से ठंडे बस्ते में चली गई। बैठक को हुए 10 दिन बीत चुके हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अधिकारियों द्वारा एक चालान तक नहीं किया गया। जबकि बैठक में जिला नगर आयुक्त ने दिन और रात को भी ड्यूटियां लगाकर दूसरे जिलों से पॉलीथिन लेकर आने वाली गाड़ियों को पकड़ने का दावा किया था, लेकिन सब दावे हवा हवाई निकले। मौजूदा हालात ऐसे हैं कि नियम-कानून ताक पर रख शहर में हर दुकान पर पॉलीथिन का धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा है। हैरानी की बात है कि पिछले कई माह से नगर परिषद द्वारा इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई। बता दें कि शहर में तीन-चार ही पॉलीथिन के होल सेलर हैं, जिनसे शहर सहित आस पास के क्षेत्र में पॉलीथिन सप्लाई होता है। पर्यावरण के लिए काम कर रही संस्थाएं इन होल सेलरों के बकायदा नाम तक लिखकर उपायुक्त को शिकायत सौंप चुकी हैं, लेकिन किसी ने इन पर कार्रवाई करना उचित नहीं समझा।
वहीं शहर की 60 हजार इकाइयों से रोजाना करीब 70 टन कूड़ा जनरेट होता है, जिसमें से 10 प्रतिशत यानी करीब 6 टन प्लास्टिक वेस्ट होता है। इसमें पॉलीथिन, प्लास्टिक की बोतलें, पैकिंग पेपर सहित अन्य सामान आता है। प्रतिदिन 6 टन प्लास्टिक वेस्ट महीने में 180 टन और साल में दो हजार 160 टन बनता है। कभी न नष्ट होने के कारण इतने प्लास्टिक से कूड़े के पहाड़ बन जाते हैं और अधिकतर प्लास्टिक नाले नालियों जाने से वह जाम हो जाते हैं। तीन दिन पहले बारिश बरसाती नालों के अटने का मुख्य कारण उनमें फंसा प्लास्टिक/पॉलीथिन ही था। बावजूद इसके अधिकारी इस गंभीर समस्या को लेकर पूरी तरह लापरवाह हैं।
जिला नगर निगम आयुक्त भारत भूषण गोगिया ने 6 जुलाई को अधिकारियों, कर्मचारियों व पॉलीथिन होलसेलर के साथ बैठक कर पॉलीथिन इस्तेमाल न करने की शपथ दिलाई थी। इस दौरान पुलिस प्रशासन को भी कार्रवाई करने के लिए लिखे जाने बारे कहा। एसोसिएशन ने भी अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि पॉलीथिन पानीपत और करनाल से कुरुक्षेत्र मेें आता है। इस पर डीएमसी ने आदेश देते हुए कहा था कि वे स्वयं पुलिस और आरटीए के साथ मिलकर इन गाड़ियों को पकडे़ंगे, इसके लिए रात्रि के समय में भी नाकाबंदी कर वाहनों की जांच की जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
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शहर में जाकर स्थिति देखी तो थानेसर बाजार, शास्त्री मार्केट, मोहन नगर मार्केट, पुरानी व नई सब्जी मंडी, पिपली मार्केट सहित सेक्टरों की मार्केट में ग्राहक दुकानों से सामान खरीद रहे थे और दुकानदार सामान को झोले के बजाय पॉलीथिन में दे रहा था। एक ग्राहक से इस संबंध में पूछा गया तो उसने कहा कि दुकानदार से झोला मांगने पर नहीं मिलता है। मजबूरी में सामान पॉलीथिन में ले जाना पड़ता है।
गोशाला एसोसिएशन के प्रधान जतिंद्र पाल ने कहा कि शहर में सड़क के किनारे लगे कूड़े का ढेर और राह चलते लोगों के द्वारा खाने की सामग्री का प्रयोग करने के बाद फेंक देना पशुओं के लिए घातक साबित हो रहा है। चारे की तलाश में जब पशु इधर-उधर भटकते हैं तब खाद्य पदार्थों का पॉलिथीन में होना उनके मौत का कारण बन जाता है। पिछले दिनों गोशाला में चिकित्सकों द्वारा एक गोवंश के पेट से चीरा लगाकर 25 से 30 किलो पॉलीथिन निकाले गए थे।
दुकानदार रवि ने कहा कि उसने अपनी दुकान पर आए ग्राहकों के लिए कपड़े के थैले बनवाए हुए हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए अन्य दुकानदारों को पॉलीथिन छोड़ कपड़े के थैले रखने चाहिए। पॉलीथिन कागज, कपड़े या गत्ते की तरह गलता नहीं है। कमर्शियल मार्केट हो या सब्जी मंडी सभी के हाथों में पॉलिथीन की थैलियां नजर जाती है। लोग कपड़े या जूट का थैला लेकर चलने में शर्म महसूस करते हैं और घर से बाजार हाथ हिलाते जाना पसंद करते हैं। पॉलीथिन के लिफाफे हमारे लिए बहुत नुकसानदायक है।
ग्रीन अर्थ संस्था से नरेश भारद्वाज ने कहा कि शहर में तीन चार हॉल सेलर हैं, जहां से आस पास के सभी एरिया में पॉलीथिन की सप्लाई होती है। अगर इन पर लगाम कस दी जाए तो आधी से ज्यादा समस्या का समाधान वैसे ही हो जाएगा। संस्था द्वारा इणनके नाम लिखकर प्रशासन को सौंपा जा चुका है, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। शहर को पॉलीथिन मुक्त करने के दावे हर बार झूठे साबित होते हैं।
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वहीं शहर की 60 हजार इकाइयों से रोजाना करीब 70 टन कूड़ा जनरेट होता है, जिसमें से 10 प्रतिशत यानी करीब 6 टन प्लास्टिक वेस्ट होता है। इसमें पॉलीथिन, प्लास्टिक की बोतलें, पैकिंग पेपर सहित अन्य सामान आता है। प्रतिदिन 6 टन प्लास्टिक वेस्ट महीने में 180 टन और साल में दो हजार 160 टन बनता है। कभी न नष्ट होने के कारण इतने प्लास्टिक से कूड़े के पहाड़ बन जाते हैं और अधिकतर प्लास्टिक नाले नालियों जाने से वह जाम हो जाते हैं। तीन दिन पहले बारिश बरसाती नालों के अटने का मुख्य कारण उनमें फंसा प्लास्टिक/पॉलीथिन ही था। बावजूद इसके अधिकारी इस गंभीर समस्या को लेकर पूरी तरह लापरवाह हैं।
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जिला नगर निगम आयुक्त भारत भूषण गोगिया ने 6 जुलाई को अधिकारियों, कर्मचारियों व पॉलीथिन होलसेलर के साथ बैठक कर पॉलीथिन इस्तेमाल न करने की शपथ दिलाई थी। इस दौरान पुलिस प्रशासन को भी कार्रवाई करने के लिए लिखे जाने बारे कहा। एसोसिएशन ने भी अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि पॉलीथिन पानीपत और करनाल से कुरुक्षेत्र मेें आता है। इस पर डीएमसी ने आदेश देते हुए कहा था कि वे स्वयं पुलिस और आरटीए के साथ मिलकर इन गाड़ियों को पकडे़ंगे, इसके लिए रात्रि के समय में भी नाकाबंदी कर वाहनों की जांच की जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
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शहर में जाकर स्थिति देखी तो थानेसर बाजार, शास्त्री मार्केट, मोहन नगर मार्केट, पुरानी व नई सब्जी मंडी, पिपली मार्केट सहित सेक्टरों की मार्केट में ग्राहक दुकानों से सामान खरीद रहे थे और दुकानदार सामान को झोले के बजाय पॉलीथिन में दे रहा था। एक ग्राहक से इस संबंध में पूछा गया तो उसने कहा कि दुकानदार से झोला मांगने पर नहीं मिलता है। मजबूरी में सामान पॉलीथिन में ले जाना पड़ता है।
गोशाला एसोसिएशन के प्रधान जतिंद्र पाल ने कहा कि शहर में सड़क के किनारे लगे कूड़े का ढेर और राह चलते लोगों के द्वारा खाने की सामग्री का प्रयोग करने के बाद फेंक देना पशुओं के लिए घातक साबित हो रहा है। चारे की तलाश में जब पशु इधर-उधर भटकते हैं तब खाद्य पदार्थों का पॉलिथीन में होना उनके मौत का कारण बन जाता है। पिछले दिनों गोशाला में चिकित्सकों द्वारा एक गोवंश के पेट से चीरा लगाकर 25 से 30 किलो पॉलीथिन निकाले गए थे।
दुकानदार रवि ने कहा कि उसने अपनी दुकान पर आए ग्राहकों के लिए कपड़े के थैले बनवाए हुए हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए अन्य दुकानदारों को पॉलीथिन छोड़ कपड़े के थैले रखने चाहिए। पॉलीथिन कागज, कपड़े या गत्ते की तरह गलता नहीं है। कमर्शियल मार्केट हो या सब्जी मंडी सभी के हाथों में पॉलिथीन की थैलियां नजर जाती है। लोग कपड़े या जूट का थैला लेकर चलने में शर्म महसूस करते हैं और घर से बाजार हाथ हिलाते जाना पसंद करते हैं। पॉलीथिन के लिफाफे हमारे लिए बहुत नुकसानदायक है।
ग्रीन अर्थ संस्था से नरेश भारद्वाज ने कहा कि शहर में तीन चार हॉल सेलर हैं, जहां से आस पास के सभी एरिया में पॉलीथिन की सप्लाई होती है। अगर इन पर लगाम कस दी जाए तो आधी से ज्यादा समस्या का समाधान वैसे ही हो जाएगा। संस्था द्वारा इणनके नाम लिखकर प्रशासन को सौंपा जा चुका है, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। शहर को पॉलीथिन मुक्त करने के दावे हर बार झूठे साबित होते हैं।