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Kurukshetra News: मोबाइल की लत से मानसिक तनाव का शिकार हो रहे बच्चे
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कुरुक्षेत्र। डिजिटल दौर में बच्चे अब किताबों और खेलों से दूर होकर मोबाइल, टीवी और कंप्यूटर स्क्रीन पर अधिक समय बिता रहे हैं। पढ़ाई से ज्यादा वक्त गेम खेलने में बीत रहा है। इसी के चलते छोटे-छोटे बच्चे मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन और आंखों की समस्याओं का शिकार हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में स्मार्टफोन की लत इतनी बढ़ गई है कि कुछ देर फोन न मिलने पर वे चिड़चिड़ापन, घबराहट और गुस्से जैसे लक्षण दिखा रहे हैं। कई बच्चे तो खाना छोड़ देते हैं और बातचीत से भी बचने लगते हैं।
फोन हाथ में आते ही उनका मूड अचानक बदल जाता है। अभिभावक मजबूरी में उन्हें मनोरोग विशेषज्ञों के पास ले जा रहे हैं। नोरोग विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र परूथी ने बताया कि पिछले दो साल में ऐसे मामलों में बढ़ोतरी हुई है। मनोरोग ओपीडी में रोजाना 10 से 15 बच्चे अभिभावकों के साथ काउंसलिंग कराने पहुंच रहे हैं। वहीं नेत्र रोग ओपीडी में भी 10 से 12 बच्चे नेत्र जांच कराने पहुंच रहे हैं।
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अभिभावक बच्चों की आंखों की रोशनी को बचाने के लिए एंटी-रिफ्लेक्शन चश्मे बनवा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते सुधार न किया गया तो बच्चों में मानसिक और शारीरिक समस्याएं और गहरी हो सकती हैं। फोन और गैजेट्स का संतुलित उपयोग ही इस समस्या का हल है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में स्मार्टफोन की लत इतनी बढ़ गई है कि कुछ देर फोन न मिलने पर वे चिड़चिड़ापन, घबराहट और गुस्से जैसे लक्षण दिखा रहे हैं। कई बच्चे तो खाना छोड़ देते हैं और बातचीत से भी बचने लगते हैं।
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फोन हाथ में आते ही उनका मूड अचानक बदल जाता है। अभिभावक मजबूरी में उन्हें मनोरोग विशेषज्ञों के पास ले जा रहे हैं। नोरोग विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र परूथी ने बताया कि पिछले दो साल में ऐसे मामलों में बढ़ोतरी हुई है। मनोरोग ओपीडी में रोजाना 10 से 15 बच्चे अभिभावकों के साथ काउंसलिंग कराने पहुंच रहे हैं। वहीं नेत्र रोग ओपीडी में भी 10 से 12 बच्चे नेत्र जांच कराने पहुंच रहे हैं।
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अभिभावक बच्चों की आंखों की रोशनी को बचाने के लिए एंटी-रिफ्लेक्शन चश्मे बनवा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते सुधार न किया गया तो बच्चों में मानसिक और शारीरिक समस्याएं और गहरी हो सकती हैं। फोन और गैजेट्स का संतुलित उपयोग ही इस समस्या का हल है।