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ब्राह्मण समुदाय ने देव, ऋषि और पितृ पूजन करके धारण किया रक्षा सूत्र
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ब्राह्मण समुदाय ने सामूहिक रूप से सरस्वती तीर्थ पर पूरे विधि विधान व परंपरा के अनुसार श्रावणी उपाकर्म का पर्व श्रद्धा भाव के साथ मनाया। ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने पवित्र सरस्वती तीर्थ में स्नान करके ऋषियों, देवताओं तथा अपने पितरों के निमित्त तर्पण करके पूजन किया। समुदाय के लोगों ने एक साथ पुराना यज्ञोपवीत (जनेऊ) उतार नया यज्ञोपवीत धारण किया तथा देवता, ऋषि व पितरो का आशीर्वाद प्राप्त किया। बता दें श्रावणी उपाकर्म का पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। तीर्थ पुरोहित आशीष चक्रपाणी ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म ब्राह्मण समुदाय का मुख्य पर्व है। श्रावण माह की पूर्णिमा पर इस पर्व पर नक्षत्रों, ऋषियों, देवताओं व पितरों का पूजन किया जाता है। रविवार सुबह 9 बजे ब्राह्मण समुदाय के लोग सरस्वती तीर्थ के पापांतक घाट पर एकत्रित हुए। यहां सर्वप्रथम ब्राह्मणों ने तीर्थ के पवित्र जल में स्नान करके ऋषि देव और पितृ तर्पण किया। पूजन के उपरांत यज्ञोपवीत का पूजन करके पुराना यज्ञोपवीत तीर्थ में विसर्जन किया गया था नया यज्ञोपवीत धारण किया। इस मौके पर आशीष चक्रपाणि, विनोद पचौली, अनुज अत्री, विनोद रिष्याण, सुभाष पौलस्त्य, विकास शर्मा, योगेश शर्मा बंटी अन्य मौजूद रहे।
आशीष चक्रपाणि ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय है। प्रायश्चित संकल्प के रूप में गुरु के सानिध्य में ब्रह्मचारी गाय के दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नान करके वर्षभर में जाने अनजाने में हुए पाप कर्मों का प्रायश्चित करके जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद ऋषि पूजन, सूर्य उपासना एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं। इसे दूसरा पक्ष कहते हैं। तीसरे पक्ष में वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा छह मास तक चलती है, श्रावणी उपाकर्म पर ही पूरा किया जाता है।
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आशीष चक्रपाणि ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय है। प्रायश्चित संकल्प के रूप में गुरु के सानिध्य में ब्रह्मचारी गाय के दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नान करके वर्षभर में जाने अनजाने में हुए पाप कर्मों का प्रायश्चित करके जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद ऋषि पूजन, सूर्य उपासना एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं। इसे दूसरा पक्ष कहते हैं। तीसरे पक्ष में वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा छह मास तक चलती है, श्रावणी उपाकर्म पर ही पूरा किया जाता है।
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