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परशुराम कांवड़ गाथा लिख पेश की भाईचारे की मिसाल
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कुरुक्षेत्र। सुनो, सुनो! ये कथा सुनो तुम कांवड़ के उत्थान की, सबसे पहले लाए कावंड परशुराम भगवान की, जय परशुराम जय भोलेनाथ जय परशुराम की जय बोलो... ये गीत जैसे ही गूंजा तो युवाओं से लेकर बड़े-बुजुर्ग भी इसके शब्दों एवं धुन पर मदमस्त हो गए। मौका था अक्षय तृतीया के दिन गांव मथाना स्थित शिव मंदिर में भगवान परशुराम जन्मोत्सव का। कार्यक्रम में वाल्मिकी समाज के कलाकार जसबीर मथाना द्वारा लिखी परशुराम कांवड़ गाथा को जयंती समारोह में खूब सराहना मिली। पहले जसबीर ने ब्राह्मण समाज को गाथा के रूप में जयंती पर तोहफा दिया तो वहीं समारोह आयोजकों ने भी कलाकार को सम्मानित कर मान बढ़ाया।
आयोजन कमेटी एवं जिला कष्ट निवारण समिति के सदस्य नरेंद्र शर्मा ने कहा कि खुद को एक ही जाति के बंधन से मुक्त करके सर्वसमाज के लिए लेखनी को आगे बढ़ाने तथा देश में बढ़ती जा रही जाति-पाति की खाई को पाटने का यह प्रयास प्रेरणादायक है। भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए लेखक जसबीर की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। उन्हें भगवान परशुराम का स्वरूप एवं सहयोगी राशि के साथ सम्मानित करना भी अच्छी पहल है।
भारत सरकार द्वारा यंग आर्टिस्ट अवार्ड एवं स्कॉलरशिप हासिल कर चुके ख्याति प्राप्त कलाकार जसबीर मथाना ने बताया कि भाईचारे को समर्पित उनके लिखे 9 मिनट के गीत को रवि सांपला ने गाया, जबकि संगीतबद्घ सतीश सहगल ने किया। फिलहाल इसका ऑडियो वर्जन लांच किया है। वीडियो भी जल्द तैयार करके समाज को अर्पण किया जाएगा। बोले कि परशुराम जी कांवड़ लाने वाले पहले महापुरुष रहे हैं। उनकी इस गाथा के दौरान वर्णन किया कि वे कैसे और किन कठिनाईयों से गुजरते हुए कंधे पर कांवड़ उठाकर लाए। साथ ही कांवड़ लाने का कारण भी बताया।
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कुछ इस तरह का वर्णन है परशुराम कांवड़ गाथा में
गाथा में जिक्र हुआ कि किसी कारणवश पिता जमदग्नि ने अपनी पत्नी रेणुका को मारने के लिए छोटे पुत्र परशुराम को आदेश दिया। पिता के आदेश की पालना करते हुए उन्होंने अपनी माता की हत्या कर दी। माता को मारने का दाग लेकर वे विचलित हो गए और नारायण का ध्यान किया। नारद मुनि प्रकट होकर बोले कि तेरी भलाई शिवजी की भक्ति में है और गोमुख से गंगाजल लाने पर इस पाप का प्रायश्चित हो सकेगा, लेकिन रास्ते में कांवड़ धरती पर न रखी जाए। सारे पाप एवं विघ्न दूर हो जाएंगे। इसके बाद कठिन डगर के बावजूद परशुराम चलते रहे और गोमुख जा पहुंचे। वहां गंगा मां का प्रणाम किया तो वे प्रकट होकर बोली कि नारद ने जो बताया था उसका स्मरण रखना। इसके बाद पेड़ से एक टहनी तोड़कर कांवड़ को फूल-पत्तियों से सजाया और उसकी अर्चना की। गंगाजल को कमंडल में लेकर कंधे पर रख वापस अपने गंतव्य को रवाना हो गए। रास्ते में भीलों की बस्ती आई, जहां उन्हें रोक लिया गया। थोड़ी देर में वे बंदी बन गए, लेकिन कांवड़ को धरती पर नहीं रखा और भीलों से कोई लड़ाई नहीं लड़ी। ये दृ्श्य देख पार्वती ने शिवजी को बताया कि आपका भक्त कष्ट में है। पार्वती वहां भीलनी का रूप धरकर आई तो परशुराम ने उसे मासी कहकर पानी पिलाने को कहा। ये सुन भीलनी ने सारे भील इकट्ठे कर लिए और बोली कि अबसे सारे भील परशुराम के भाई हैं। वचन दिया कि जब भी भीड़ पड़ेगी तो ये सभी तेरा साया बनेंगे। इसके बाद चलते-चलते वे गढ़मुक्तेश्वर में कांवड़ ले आए। यहां शिवजी ने उन्हें दर्शन दिए और परशुराम को अमरत्व का वरदान दिया। इसी स्थान को अब परशुरामेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है। यहीं परशुराम के कष्टों का निवारण हुआ था। मान्यता है कि जो गोमुख नहीं जा सकता, वह इसी गढ़मुक्तेश्वर (गढ़गंगा) से गंगाजल ला सकते हैं। इसको वर्तमान दौर में छोटे हरिद्वार के नाम से भी जाना जाता है।
आयोजन कमेटी एवं जिला कष्ट निवारण समिति के सदस्य नरेंद्र शर्मा ने कहा कि खुद को एक ही जाति के बंधन से मुक्त करके सर्वसमाज के लिए लेखनी को आगे बढ़ाने तथा देश में बढ़ती जा रही जाति-पाति की खाई को पाटने का यह प्रयास प्रेरणादायक है। भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए लेखक जसबीर की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। उन्हें भगवान परशुराम का स्वरूप एवं सहयोगी राशि के साथ सम्मानित करना भी अच्छी पहल है।
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भारत सरकार द्वारा यंग आर्टिस्ट अवार्ड एवं स्कॉलरशिप हासिल कर चुके ख्याति प्राप्त कलाकार जसबीर मथाना ने बताया कि भाईचारे को समर्पित उनके लिखे 9 मिनट के गीत को रवि सांपला ने गाया, जबकि संगीतबद्घ सतीश सहगल ने किया। फिलहाल इसका ऑडियो वर्जन लांच किया है। वीडियो भी जल्द तैयार करके समाज को अर्पण किया जाएगा। बोले कि परशुराम जी कांवड़ लाने वाले पहले महापुरुष रहे हैं। उनकी इस गाथा के दौरान वर्णन किया कि वे कैसे और किन कठिनाईयों से गुजरते हुए कंधे पर कांवड़ उठाकर लाए। साथ ही कांवड़ लाने का कारण भी बताया।
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कुछ इस तरह का वर्णन है परशुराम कांवड़ गाथा में
गाथा में जिक्र हुआ कि किसी कारणवश पिता जमदग्नि ने अपनी पत्नी रेणुका को मारने के लिए छोटे पुत्र परशुराम को आदेश दिया। पिता के आदेश की पालना करते हुए उन्होंने अपनी माता की हत्या कर दी। माता को मारने का दाग लेकर वे विचलित हो गए और नारायण का ध्यान किया। नारद मुनि प्रकट होकर बोले कि तेरी भलाई शिवजी की भक्ति में है और गोमुख से गंगाजल लाने पर इस पाप का प्रायश्चित हो सकेगा, लेकिन रास्ते में कांवड़ धरती पर न रखी जाए। सारे पाप एवं विघ्न दूर हो जाएंगे। इसके बाद कठिन डगर के बावजूद परशुराम चलते रहे और गोमुख जा पहुंचे। वहां गंगा मां का प्रणाम किया तो वे प्रकट होकर बोली कि नारद ने जो बताया था उसका स्मरण रखना। इसके बाद पेड़ से एक टहनी तोड़कर कांवड़ को फूल-पत्तियों से सजाया और उसकी अर्चना की। गंगाजल को कमंडल में लेकर कंधे पर रख वापस अपने गंतव्य को रवाना हो गए। रास्ते में भीलों की बस्ती आई, जहां उन्हें रोक लिया गया। थोड़ी देर में वे बंदी बन गए, लेकिन कांवड़ को धरती पर नहीं रखा और भीलों से कोई लड़ाई नहीं लड़ी। ये दृ्श्य देख पार्वती ने शिवजी को बताया कि आपका भक्त कष्ट में है। पार्वती वहां भीलनी का रूप धरकर आई तो परशुराम ने उसे मासी कहकर पानी पिलाने को कहा। ये सुन भीलनी ने सारे भील इकट्ठे कर लिए और बोली कि अबसे सारे भील परशुराम के भाई हैं। वचन दिया कि जब भी भीड़ पड़ेगी तो ये सभी तेरा साया बनेंगे। इसके बाद चलते-चलते वे गढ़मुक्तेश्वर में कांवड़ ले आए। यहां शिवजी ने उन्हें दर्शन दिए और परशुराम को अमरत्व का वरदान दिया। इसी स्थान को अब परशुरामेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है। यहीं परशुराम के कष्टों का निवारण हुआ था। मान्यता है कि जो गोमुख नहीं जा सकता, वह इसी गढ़मुक्तेश्वर (गढ़गंगा) से गंगाजल ला सकते हैं। इसको वर्तमान दौर में छोटे हरिद्वार के नाम से भी जाना जाता है।