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जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए गन्ने की नई किस्में करेंगे विकसित

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 12 Jul 2022 02:45 AM IST
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Will develop new varieties of sugarcane for waterlogged areas
कर्मबीर लाठर
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करनाल। उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के राज्यों के अंतर्गत जलभराव की समस्या से ग्रस्त इलाकों में गन्ने की विभिन्न प्रजातियों का परीक्षण कार्य शुरू कर दिया गया है। अधिक बारिश, बाढ़ या जल्द पानी निकासी नहीं हो पाने की स्थिति में जलभराव झेलने वाली प्रजातियां चिह्नित की जाएंगी। भविष्य में ऐसे इलाकों के लिए वैज्ञानिक गन्ने की नई किस्में विकसित करेंगे। इन अनुसंधानों से जलभराव की त्रासदी झेलने वाले गन्ना उत्पादक किसानों को क्षति से बचाया जा सकेगा और उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी।
प्रथम चरण में गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) की ओर से गन्ने की 20 किस्मों और करनाल स्थित गन्ना प्रजनन केंद्र की ओर से 18 किस्मों के परीक्षण के लिए इस बार उत्तरप्रदेश की विभिन्न चीनी मिलों के अंतर्गत क्षेत्र में बिजाई करवाई गई है। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जिले में अनुबंध के उपरांत ट्रायल शुरू कर दिया गया है। वहीं बिहार के जलभराव वाले इलाकों में अक्तूबर 2022 से परीक्षण करने की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। गन्ना प्रजनन केंद्र के अध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एसके पांडे ने कहा कि गोरखपुर के रामकोला इलाके में 70 प्रतिशत तक जलभराव की समस्या है। बलरामपुर चीनी मिल क्षेत्र में परीक्षण के लिए भी अनुबंध हो गया है। 38 किस्मों को लगाकर परखा जाएगा कि इन पर जलभराव का क्या प्रभाव रहा। गन्ना बिजाई से चीनी रिकवरी तक की प्रक्रिया परीक्षण में शामिल की गई है। हरियाणा में यमुना के अंदर गन्ने की खेती होती है। यमुनानगर से सोनीपत जिले तक यमुना के अंदर और इसके अलावा नीची जमीनों में अधिक वर्षा और जलभराव से गन्ना की फसल डूबने का अंदेशा रहता है। जलभराव के कारण फसल खराब हो जाती है। गन्ने की प्रजातियां ज्यादा दिन तक पानी नहीं झेल सकती। केवल सीओ-0238 किस्म 15 दिन तक पानी झेलने की क्षमता रखती है। यह सभी बिंदु वैज्ञानिकों के संज्ञान में हैं। भविष्य में ऐसी प्रजातियां भी विकसित होंगी, जो जलभराव वाले क्षेत्र में बिजाई के लिए अनुशंसित की जाएंगी। उन्होंने बताया कि गन्ने की नई किस्में विकसित करने में करीब 13 वर्ष तक लगते हैं।
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बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाके ऐसे हैं जिनमें अलग-अलग जलस्तर की स्थिति होती है। कहीं पर फसल डूबने और कहीं पर एक या दो फुट पानी होने की स्थिति बनती है। परीक्षण कार्य शुरू हो चुका है। आने वाले तीन वर्षों में परीक्षण के नतीजे स्पष्ट होंगे और किस्में चिह्नित की जाएंगी।
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- डॉ. एसके पांडे, अध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक, गन्ना प्रजनन केंद्र करनाल
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