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बच्चों की याद आई तो रुंध गया गला, थम गई जुबां, चेहरे पर दिखने लगी दर्द भरी दास्तां
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घर और बच्चों की याद आई तो आंखें भर आई। गला रुंध गया, शब्द अटक गए, अपनों से मिला दर्द चेहरे पर पड़ी झुर्रियों में साकार हो उठा। किसी को बहू ने सितम दिया है तो किसी को बेटे ने। जिन्होंने उनकी जिंदगी संवारने के लिए अपनी जिंदगी खपा दी। अब उनका ठिकाना निर्मल धाम (वृद्ध आश्रम) बना है। हालात ये हैं कि अब उन्हें घर परिवार की यादों से भी डर लगता है। वह बोले बेटी डाक्टर है, बेटे अफसर हैं, लेकिन शायद उनमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि वह बुढ़ापे में अपने माता पिता को दो वक्त की रोटी खिला सके और उनकी देखरेख कर सकें।
शहर के निर्मल धाम के प्रबंधक राजेश गुप्ता ने बताया कि निर्मल धाम का निर्माण संत बाबा अमरीक देव ने अपने पिता भगत लब्भा मल व माता करतार कौर की स्मृति में 1997 में करवाया था। अब इसकी देखरेख महंत बाबा राम सिंह (निर्मल कुटिया करनाल) व संत बाबा जोध सिंह (निर्मल आश्रम ऋषिकेष) करते हैं। यहां फिलहाल 130 बुजुर्गों को सहारा मिला है। कोई खुद ठोकरें खाता यहां पहुंच गया तो किसी के परिजन छोड़ गये हैं। कई के परिजन कभी कभार मिलने आते हैं, कई लोगों के तो परिजन सालों से हालचाल पूछने भी नहीं आए, लेकिन यहां बुजुर्गों को अलग कक्ष, उनका मनपसंद भोजन, दूध, नाश्ता, बिस्तर, डाक्टर, दवाएं, लाइब्रेरी, सत्संग माहौल आदि मिलता है। सभी खुश रहते हैं।
बेटे मेरा बोझ नहीं उठा सके, घर छोड़ना पड़ा
नीलोखेड़ी क्षेत्र की 62 वर्षीय अमरजीत कौर पौने दो साल से निर्मल धाम में हैं। दो बेटे, एक बेटी है। उनका कहना है कि पति के होते हुए सभी कुछ ठीक था, लेकिन उनके निधन के बाद सब कुछ बदल गया। तीन साल पहले बेटे की टांग कट गई। तीन बच्चे हैं। दूसरा बेटा थ्री व्हीलर चलाता है। दोनों गरीब हैं, वह उनका खर्च वहन नहीं कर पा रहे थे। वह बेटों पर बोझ बनना नहीं चाहती थी, मैने पहले ही निर्मल धाम के बारे में सुन रखा था, इसलिए यहां आकर रहने लगी।
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जब भी बच्चों की याद आती हैं तो आंसू बहा लेते हैं
पंजाब के सरहिंद निवासी 79 साल की सतिंदर कौर के पति की पांच साल पहले मृत्यु हो गई। बेटी और दामाद डाक्टर हैं लेकिन बेटे को नशे की लत लग गई। इसी कारण बेटे की पत्नी भी उसे छोड़कर चली गई। नशे में बेटा घर में उत्पात करने लगा। जब पीड़ा असहनीय हो गई तो घर छोड़ना ही बेहतर समझा। लेकिन जब बेटे की बात की तो वह फफक पड़ी, करीब पांच मिनट तक गले में शब्द अटके रहे। फिर बोलीं कि अब कोई मिलने नहीं आता। पेंशन मिलती है लेकिन उसका एटीएम, बैंक बैलेंस, जगह जमीन सभी कुछ बेटे के पास ही है। बेटी उन्हें अपने पास रखना चाहती थी लेकिन दामाद के परिजनों का मन नहीं था, वैसे भी बेटी के घर का कुछ खाना पीना ठीक नहीं होता। बेटा अब मिलने भी नहीं आता। जब भी बच्चों की याद आती है यहीं किसी कोने में राधा स्वामी जी के चरणों में बैठकर आंसू बहाकर अपने मन को शांत कर लेती हूं।
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बच्चे कहते हैं कि जब घर बन जाएगा तो घर ले जाएंगे
पानीपत के भजन गायक 80 वर्षीय देशराज व 70 वर्षीय उनकी पत्नी दयारानी भी इसी निर्मल धाम परिवार के सदस्य है। दो बेटे हैं, जो कढ़ाई का काम करते हैं, बेटी की शादी हो गई है। दोनों बेटों के पांच पौत्र पौत्रियां हैं। जो कमाया, उससे बेटों की जिंदगी संवारने में लगे रहे, अपना घर नहीं बना पाए। बेटे भी अभी किराये पर रहते हैं। परिवार बढ़ा, हाथ पांव शिथिल हुए तो छोटे मकान में गुजारा मुश्किल हो गया। आमदनी कम होने के कारण बड़ा मकान नहीं ले सकते थे। इसलिए पति पत्नी को घर छोड़कर 2009 में यहां आना पड़ा। बच्चे कहते हैं कि जब मकान बन जाएगा तो वह उन्हें घर ले जाएंगे। 2500 रुपये पेंशन मिलती है लेकिन उससे अधिक तो दवाएं लग जाती है, अब सारा खर्च निर्मल धाम ही उठाता है।
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पत्नी जीवित होती तो शायद मैं यहां नहीं आता.....
कैथल (कलायत) निवासी 81 वर्षीय दर्शन दयाल परिवहन विभाग में ड्राइवर पद से सेवानिवृत्त हैं। कुछ समय पहले ही निर्मल धाम आए हैं। तीन बेटों में एक बिजली बोर्ड में जूनियर इंजीनियर है तो दूसरा सिंचाई विभाग में जेई के पद से सेवानिवृत्त हो चुका है, तीसरा दिल्ली में रहकर बिजली की दुकान करता है। दोनो जेई बेटे तो रखना चाहते हैं लेकिन उनकी पत्नियां स्वीकार नहीं करती हैं। एक बेटी है, बेटी के घर तो खाने पीने की परंपरा नहीं है। दिल्ली वाला लड़का अपने पास रखना चाहता है लेकिन उसका घर काफी छोटा है, दिल्ली में प्रदूषण के कारण दिक्कत होती है। इसलिए अब निर्मल धाम ही ठिकाना बना है। पत्नी 2007 में दुनियां से चली गई। यदि वह होती तो शायद आज मैं यहां नहीं आता। अब पेंशन आती है, उससे काम चल जाता है।
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शहर के निर्मल धाम के प्रबंधक राजेश गुप्ता ने बताया कि निर्मल धाम का निर्माण संत बाबा अमरीक देव ने अपने पिता भगत लब्भा मल व माता करतार कौर की स्मृति में 1997 में करवाया था। अब इसकी देखरेख महंत बाबा राम सिंह (निर्मल कुटिया करनाल) व संत बाबा जोध सिंह (निर्मल आश्रम ऋषिकेष) करते हैं। यहां फिलहाल 130 बुजुर्गों को सहारा मिला है। कोई खुद ठोकरें खाता यहां पहुंच गया तो किसी के परिजन छोड़ गये हैं। कई के परिजन कभी कभार मिलने आते हैं, कई लोगों के तो परिजन सालों से हालचाल पूछने भी नहीं आए, लेकिन यहां बुजुर्गों को अलग कक्ष, उनका मनपसंद भोजन, दूध, नाश्ता, बिस्तर, डाक्टर, दवाएं, लाइब्रेरी, सत्संग माहौल आदि मिलता है। सभी खुश रहते हैं।
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बेटे मेरा बोझ नहीं उठा सके, घर छोड़ना पड़ा
नीलोखेड़ी क्षेत्र की 62 वर्षीय अमरजीत कौर पौने दो साल से निर्मल धाम में हैं। दो बेटे, एक बेटी है। उनका कहना है कि पति के होते हुए सभी कुछ ठीक था, लेकिन उनके निधन के बाद सब कुछ बदल गया। तीन साल पहले बेटे की टांग कट गई। तीन बच्चे हैं। दूसरा बेटा थ्री व्हीलर चलाता है। दोनों गरीब हैं, वह उनका खर्च वहन नहीं कर पा रहे थे। वह बेटों पर बोझ बनना नहीं चाहती थी, मैने पहले ही निर्मल धाम के बारे में सुन रखा था, इसलिए यहां आकर रहने लगी।
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जब भी बच्चों की याद आती हैं तो आंसू बहा लेते हैं
पंजाब के सरहिंद निवासी 79 साल की सतिंदर कौर के पति की पांच साल पहले मृत्यु हो गई। बेटी और दामाद डाक्टर हैं लेकिन बेटे को नशे की लत लग गई। इसी कारण बेटे की पत्नी भी उसे छोड़कर चली गई। नशे में बेटा घर में उत्पात करने लगा। जब पीड़ा असहनीय हो गई तो घर छोड़ना ही बेहतर समझा। लेकिन जब बेटे की बात की तो वह फफक पड़ी, करीब पांच मिनट तक गले में शब्द अटके रहे। फिर बोलीं कि अब कोई मिलने नहीं आता। पेंशन मिलती है लेकिन उसका एटीएम, बैंक बैलेंस, जगह जमीन सभी कुछ बेटे के पास ही है। बेटी उन्हें अपने पास रखना चाहती थी लेकिन दामाद के परिजनों का मन नहीं था, वैसे भी बेटी के घर का कुछ खाना पीना ठीक नहीं होता। बेटा अब मिलने भी नहीं आता। जब भी बच्चों की याद आती है यहीं किसी कोने में राधा स्वामी जी के चरणों में बैठकर आंसू बहाकर अपने मन को शांत कर लेती हूं।
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बच्चे कहते हैं कि जब घर बन जाएगा तो घर ले जाएंगे
पानीपत के भजन गायक 80 वर्षीय देशराज व 70 वर्षीय उनकी पत्नी दयारानी भी इसी निर्मल धाम परिवार के सदस्य है। दो बेटे हैं, जो कढ़ाई का काम करते हैं, बेटी की शादी हो गई है। दोनों बेटों के पांच पौत्र पौत्रियां हैं। जो कमाया, उससे बेटों की जिंदगी संवारने में लगे रहे, अपना घर नहीं बना पाए। बेटे भी अभी किराये पर रहते हैं। परिवार बढ़ा, हाथ पांव शिथिल हुए तो छोटे मकान में गुजारा मुश्किल हो गया। आमदनी कम होने के कारण बड़ा मकान नहीं ले सकते थे। इसलिए पति पत्नी को घर छोड़कर 2009 में यहां आना पड़ा। बच्चे कहते हैं कि जब मकान बन जाएगा तो वह उन्हें घर ले जाएंगे। 2500 रुपये पेंशन मिलती है लेकिन उससे अधिक तो दवाएं लग जाती है, अब सारा खर्च निर्मल धाम ही उठाता है।
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पत्नी जीवित होती तो शायद मैं यहां नहीं आता.....
कैथल (कलायत) निवासी 81 वर्षीय दर्शन दयाल परिवहन विभाग में ड्राइवर पद से सेवानिवृत्त हैं। कुछ समय पहले ही निर्मल धाम आए हैं। तीन बेटों में एक बिजली बोर्ड में जूनियर इंजीनियर है तो दूसरा सिंचाई विभाग में जेई के पद से सेवानिवृत्त हो चुका है, तीसरा दिल्ली में रहकर बिजली की दुकान करता है। दोनो जेई बेटे तो रखना चाहते हैं लेकिन उनकी पत्नियां स्वीकार नहीं करती हैं। एक बेटी है, बेटी के घर तो खाने पीने की परंपरा नहीं है। दिल्ली वाला लड़का अपने पास रखना चाहता है लेकिन उसका घर काफी छोटा है, दिल्ली में प्रदूषण के कारण दिक्कत होती है। इसलिए अब निर्मल धाम ही ठिकाना बना है। पत्नी 2007 में दुनियां से चली गई। यदि वह होती तो शायद आज मैं यहां नहीं आता। अब पेंशन आती है, उससे काम चल जाता है।