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जिस कुएं में नानक ने किया था स्नान, वह आज भी कर्ण नगरी में विराजमान
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गुरुद्वारा मंजी साहिब। संवाद
गगन तलवार
करनाल। सिखों के प्रथम गुरु गुरु नानक देव 507 साल पहले कर्ण नगरी आए थे। अपने करनाल प्रवास के दौरान गुरु जी ने जिस खुई (कुएं) पर स्नान किया था। उससे आज भी पवित्र जल निकलता है। इस जल से श्रद्धालु स्नान करते हैं और मन की मुरादें पाते हैं। कई दिन तक ठठियारा मोहल्ले में प्रवास कर गुरु जी ने आम जन को जनकल्याण का संदेश दिया था।
ठठियारा मोहल्ले के जिस बगीचे में गुरु जी ने डेरा डाला था, आज उसी जगह पर गुरुद्वारा मंजी साहिब पहली पातशाही बना है। सर्राफा बाजार स्थित यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा संगत की आस्था का केंद्र है। इस पवित्र स्थल पर गुरु अमर दास, गुरु हरकिशन और बाबा बंदा बहादुर भी आ चुके हैं। गुरुद्वारा के हेड ग्रंथी अमृतपाल सिंह और प्रधान बलकार सिंह के अनुसार, गुरु नानक देव जी ने इस जगह से लोगों को शांति, सद्भाव कायम करने और सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने की उन्होंने राह दिखाई। उनके समय का कुआं आज भी यहां बने गुरुद्वारा में विराजमान है। बोहली साहिब के नाम से जानी जाने वाली खुई को गुरु नानक देव जी की चरण छू प्राप्त है। गुरुद्वारे में संगत के ठहरने की भी पूरी व्यवस्था है। दूर-दराज से संगत माथा टेकने के लिए पहुंचती है।
पहली उदासी के अंतिम चरण में हुआ था गुरु जी का आगमन
गुरुद्वारा के हेड ग्रंथी अमृतपाल सिंह और प्रधान बलकार सिंह के अनुसार, अपनी चार उदासी में से पहली उदासी (धार्मिक यात्रा) के अंतिम चरण में गुरु नानक देव जी श्यामन (शाम गढ़) से होते हुए सितंबर 1515 में करनाल पहुंचे थे। यहां वे ठठियारा मोहल्ले के उस बगीचे में रुके। उस समय करनाल पर अब्बू अली शाह कलंदर का काफी प्रभाव था। शहर के लोग गुरु नानक देव जी के दर्शनों को आने लगे। इस बात का सैय्यद मुबारक अली शाह को पता चला तो उसने अपने पीर अब्बू अली शाह कलंदर को इसकी सूचना दी। गुरु नानक देव जी के प्रभाव की कहानी सुनकर वे तिलमिला गए और करामात करने लगे। जब उन्होंने देखा कि उनकी करामातों का असर गुरु नानक देव पर नहीं हो रहा है तो वे अपनी करामातों को छोड़कर पैदल चलकर गुरु जी के पास आए। यहां गुरु नानक देव जी ने पीर अब्बू अली शाह कलंदर को भी उपदेश दिया और दुनिया की भलाई के लिए प्रेरित किया।
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1709 में यहीं से स्थापित हुआ था जमींदारा राज
गुरु नानक देव जी के बाद इस पवित्र स्थान पर गुरु हरकिशन साहिब दिल्ली जाते हुए 1663 ई में आए थे। तीसरे पातशाह गुरु अमर दास जी भी इस पवित्र स्थान पर आ चुके हैं। 1709 ई में बाबा बंदा सिंह बहादुर ने करनाल शहर को फतेह करके यहां जमींदारा राज स्थापित किया था। प्रधान और हेडग्रंथी के अनुसार, सभी गुरुओं की याद में ही यहां गुरुद्वारा स्थापित हुआ। शहर के मुख्य बाजार में स्थापित गुरुद्वारा में सुबह शाम गुरबाणी का पाठ और कीर्तन होता है। रोजाना श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है।
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करनाल। सिखों के प्रथम गुरु गुरु नानक देव 507 साल पहले कर्ण नगरी आए थे। अपने करनाल प्रवास के दौरान गुरु जी ने जिस खुई (कुएं) पर स्नान किया था। उससे आज भी पवित्र जल निकलता है। इस जल से श्रद्धालु स्नान करते हैं और मन की मुरादें पाते हैं। कई दिन तक ठठियारा मोहल्ले में प्रवास कर गुरु जी ने आम जन को जनकल्याण का संदेश दिया था।
ठठियारा मोहल्ले के जिस बगीचे में गुरु जी ने डेरा डाला था, आज उसी जगह पर गुरुद्वारा मंजी साहिब पहली पातशाही बना है। सर्राफा बाजार स्थित यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा संगत की आस्था का केंद्र है। इस पवित्र स्थल पर गुरु अमर दास, गुरु हरकिशन और बाबा बंदा बहादुर भी आ चुके हैं। गुरुद्वारा के हेड ग्रंथी अमृतपाल सिंह और प्रधान बलकार सिंह के अनुसार, गुरु नानक देव जी ने इस जगह से लोगों को शांति, सद्भाव कायम करने और सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने की उन्होंने राह दिखाई। उनके समय का कुआं आज भी यहां बने गुरुद्वारा में विराजमान है। बोहली साहिब के नाम से जानी जाने वाली खुई को गुरु नानक देव जी की चरण छू प्राप्त है। गुरुद्वारे में संगत के ठहरने की भी पूरी व्यवस्था है। दूर-दराज से संगत माथा टेकने के लिए पहुंचती है।
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पहली उदासी के अंतिम चरण में हुआ था गुरु जी का आगमन
गुरुद्वारा के हेड ग्रंथी अमृतपाल सिंह और प्रधान बलकार सिंह के अनुसार, अपनी चार उदासी में से पहली उदासी (धार्मिक यात्रा) के अंतिम चरण में गुरु नानक देव जी श्यामन (शाम गढ़) से होते हुए सितंबर 1515 में करनाल पहुंचे थे। यहां वे ठठियारा मोहल्ले के उस बगीचे में रुके। उस समय करनाल पर अब्बू अली शाह कलंदर का काफी प्रभाव था। शहर के लोग गुरु नानक देव जी के दर्शनों को आने लगे। इस बात का सैय्यद मुबारक अली शाह को पता चला तो उसने अपने पीर अब्बू अली शाह कलंदर को इसकी सूचना दी। गुरु नानक देव जी के प्रभाव की कहानी सुनकर वे तिलमिला गए और करामात करने लगे। जब उन्होंने देखा कि उनकी करामातों का असर गुरु नानक देव पर नहीं हो रहा है तो वे अपनी करामातों को छोड़कर पैदल चलकर गुरु जी के पास आए। यहां गुरु नानक देव जी ने पीर अब्बू अली शाह कलंदर को भी उपदेश दिया और दुनिया की भलाई के लिए प्रेरित किया।
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1709 में यहीं से स्थापित हुआ था जमींदारा राज
गुरु नानक देव जी के बाद इस पवित्र स्थान पर गुरु हरकिशन साहिब दिल्ली जाते हुए 1663 ई में आए थे। तीसरे पातशाह गुरु अमर दास जी भी इस पवित्र स्थान पर आ चुके हैं। 1709 ई में बाबा बंदा सिंह बहादुर ने करनाल शहर को फतेह करके यहां जमींदारा राज स्थापित किया था। प्रधान और हेडग्रंथी के अनुसार, सभी गुरुओं की याद में ही यहां गुरुद्वारा स्थापित हुआ। शहर के मुख्य बाजार में स्थापित गुरुद्वारा में सुबह शाम गुरबाणी का पाठ और कीर्तन होता है। रोजाना श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है।

गुरुद्वारा मंजी साहिब का बोहली साहिब। संवाद