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Karnal News: पवित्र थड़ा साहिब, कभी धोबी की झोपड़ी में था... आज है आलीशान गुरुघर

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 26 Nov 2025 02:00 AM IST
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The sacred Thada Sahib, once a washerman's hut... is now a magnificent Gurudwara
गगन तलवार
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करनाल। तरावड़ी कस्बे में गुरु तेग बहादुर का पवित्र शीश जिस जगह पर एक रात के लिए रखा गया था, वह पवित्र थड़ा साहिब आज भी विद्यमान है। कभी धोबी की झोपड़ी में होने वाली इस जगह पर आज आलीशान गुरु घर है। गुरुद्वारा शीश गंज साहिब पातशाही नौवीं में थड़ा साहिब के नाम से इस जगह पर माथा टेककर और दर्शन करके संगत अपनी मुरादें पाती है।

350 साल पहले हुई इस यात्रा के दौरान गुरु जी का पवित्र शीश तराईन (तरावड़ी) में भी एक रात रहा था। तब जालिमों की नजर से बचाते हुए भाई जैता जी श्री गुरु तेग बहादुर जी के शीश को दिल्ली से आनंदपुर साहिब लेकर जा रहे थे। जिस जगह पर यह गुरुद्वारा बना है, 1675 तक यहां एक धोबी देवा राम जी की झोपड़ी हुआ करती थी। आज आनंदपुर साहिब के गुरुद्वारों की निर्माण शैली पर यहां दूधिया इमारत खड़ी है।
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इसके अलावा बाबा बंदा सिंह बहादुर की अमीन में जब जंग हुई थी। उस दौरान उनके जो सैनिक शहीद हुए थे, उनके संस्कार भी इसी पवित्र स्थान पर हुए थे। वर्ष 2007 में बाबा सुक्खा सिंह की सरपरस्ती में गुरुद्वारे का नया भवन बना था। वर्तमान में बाबा जोगा सिंह जी के मार्गदर्शन में कार सेवा चल रही है। गुरुद्वारे में लगे संगमरमर के पत्थरों की छटा दिन की धूप और रात की चांदनी में अति अद्भुत, सुंदर एवं मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करती है। चारों दिशाओं से एक सरीखी दिखाई देने वाली गुरुद्वारा की इमारत हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है और यहां से निकलने वाले लोग गुरुद्वारा में दर्शन करके ही आगे बढ़ते हैं।
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देवाराम धोबी ने शीश का पहरा देकर की थी रातभर सेवा
गुरु जी का शीश लेकर आनंदपुर साहिब जाते समय भाई जैता जब तरावड़ी पहुंचा तो किले के पास धोबी घाट पर भाई देवाराम धोबी से उनकी मुलाकात हुई। उसकी जिज्ञासावश भाई जैता ने उसको सारा वृत्तांत सुनाया और कहा कि सतगुरु जी का भाणा अर्थात उनका पावन शीश कपड़े में लिपटा हुआ उसके सिर पर रखा है। भाई देवा राम ने सजल नेत्रों से शीश को नमस्कार किया और अपनी झोंपड़ी में ले जाकर शीश को आसन पर रखकर लंगर की सेवा की और स्वयं सारी रात जागकर पहरा दिया और भाई जैता जी को विश्राम दिलाया। अगली सुबह भाई जैता आनंदपुर साहिब जी की तरफ प्रस्थान कर गए। वही स्थान आज गुरुद्वारा शीशगंज के नाम से विख्यात है।

यह भी जानें
- 1958 में गुरुद्वारा बना था, तब इमारत छोटी थी।
- 2007 में गुरुद्वारे का नया भवन बना।
- 2007 में ही गुरुद्वारे में सरोवर भी बनाया गया, जहां संगत अब स्नान भी करती है।
- 1200 से ज्यादा श्रद्धालु 24 घंटे में लंगर चखते हैं।

संगत के लिए ये हैं सेवा कार्य
- बाहर से आई संगत के ठहरने के लिए 15 कमरों की भी व्यवस्था है।
- गुरुद्वारा की डिस्पेंसरी में आधे रेट में होते हैं टेस्ट, निशुल्क मरीजों का इलाज किया जाता है।
- गुरुद्वारा परिसर में पुस्तकालय भी है। जहां क्षेत्र के युवा पढ़ाई करने के लिए आते हैं।
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