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हरियाणवी लोक संस्कृति का वाहक बना शिक्षक

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 30 May 2022 02:27 AM IST
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Teacher became the carrier of Haryanvi folk culture
123: नाटक का मंचन करने के बाद कलाकारो का परिचय कराते मास्टर सतपाल मलिक।
करनाल। आधुनिकता के दौर में जहां देश में पाश्चात्य संस्कृति हावी हो रही, वहीं कर्ण नगरी का एक शिक्षक लोक संस्कृति को मजबूती दे रहा है। हिंदी अध्यापक सतपाल मलिक का कहना है कि हमारी संस्कृति विश्व में सर्वोपरि है। यदि संस्कृति से कट जाएंगे तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। वह शिष्यों को मुफ्त में पढ़ाने के साथ-साथ संस्कृति को कायम रखने में 12 वर्षों से समर्पित हैं।
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राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय बड़ागांव में कार्यरत शिक्षक अब तक 14 नाटक लिख चुके हैं। इसके अलावा हरियाणवी लोक संस्कृति से जुड़ी कविताएं और गीतों की रचना कर चुके हैं। इन रचनाओं की प्रस्तुति प्रदेश स्तर तक के कार्यक्रमों में छाप छोड़ चुकी है। इनके द्वारा रचित नाटकों को रंगमंच पर युवा रंगकर्मी मंचित करते हैं। बेहतर प्रस्तुति से कई विद्यार्थी रंगकर्मी पुरस्कार विजेता भी बने। उस समय के विद्यार्थी रहे कई युवा अब इसी क्षेत्र में अपना भविष्य बना रहे हैं।
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इन नाटकों ने विभिन्न मंचों पर छोड़ी छाप
शिक्षक सतपाल मलिक ने 14 नाटक लिखे। जिन्होंने विभिन्न मंचों पर धमाल मचाते हुए अमिट छाप छोड़ी। इन नाटकों में बुढ़ापा बैरी कदे ना आवै, अनपढ़ माणस का के जीणा, नई पीढ़ी में लुप्त होते मानव मूल्य, मेरे राम का मुकुट कदे ना भीगै, वतन के सिपाही, दुल्हन ही दहेज है, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, कृष्ण-सुदामा, मैले आंचल में लिपटी भारत माता, मत बांटो इंसान को, वीर हकीकत राय, आज आब हवा खराब हो गई, नशे का जहर और कन्या भ्रूण हत्या महापाप शामिल है।
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बुजुर्गों के अपमान से हुआ था आहत, तभी संस्कृति को बनाया हथियार
शिक्षक ने बताया कि पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव और बुजुर्गों के अपमान की घटनाओं को देखते हुए लोगों को जागरूक करने के लिए लोक संस्कृति को हथियार बनाया। नाटकों के माध्यम से स्कूल और कॉलेजों में जाकर संदेश देने लगे। शुरुआत में सकारात्मक असर दिखा तो ये नाटकों का सिलसिला साल दर साल आगे बढ़ता गया। हर वर्ष वे नए मुद्दे पर नाटक तैयार कर जागरूक करने लगे। अब भी स्कूल की छुट्टी के बाद या अवकाश के दिन वे गांवों में नाटक मंचन करते हैं।

रचनाओं में गीता के संदेश को भी किया आत्मसात
अपनी रचनाओं में शिक्षक सतपाल मलिक ने गीता के संदेशों को भी आत्मसात किया है। उन्होंने कहा कि गीता का संदेश निरंतर कर्म करते रहने की प्रेरणा देता है। इसी बात को ध्यान में रखकर वह नाटक लिखने और मंचन करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता। उन्होंने बताया कि यदि नाटक से एक व्यक्ति की भी सोच बदलती है तो वह अपने प्रयास को सफल मानते हैं।
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