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बारिश ने बिगाड़ा पराली का प्रबंधन

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 29 Sep 2022 02:18 AM IST
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Rain spoiled the management of stubble
105: केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के सभागार में आयोजित कार्यशाला में बोलते महानिदेशक कृषि
माई सिटी रिपोर्टर
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करनाल। पिछले दिनों में हुई बारिश ने फसल अवशेष प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। पांच और छह अक्तूबर को संभावित बारिश ने और अधिक चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि उस समय कटाई जोरो पर होगी, खेतों में नमी होने से न तो कंबाइन चल पाएंगी और ही पराली प्रबंधन की मशीनें। इस समस्या पर मंथन के लिए बुधवार को केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) के सभागार में एक राज्य स्तरीय फसल अवशेष प्रबंधन कृषक वैज्ञानिक संवाद कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला बायो डी-कंपोजर के प्रयोग की सलाह दी गई है।
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग हरियाणा के महानिदेशक डॉ. हरदीप सिंह की अध्यक्षता में आयोजित कार्यशाला में सीएसएसआरआई निदेशक डॉ. पीसी शर्मा, क्षेत्रीय निदेशक धान अनुसंधान संस्थान कौल डॉ. ओपी लठवाल, चौधरी चरण सिंह मंडल निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. बलवान सिंह, हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की पूर्व प्रधान वैज्ञानिक डॉ प्रतिभा शर्मा, कृषि विज्ञान केंद्र पानीपत से डा. राजबीर गर्ग, अभियंता स्वपनिल चौधरी आदि कई कृषि वैज्ञानिकों ने सहभागिता की। इसमें करनाल, पानीपत, हिसार, कुरुक्षेत्र, झज्जर, रोहतक, यमुनानगर, फतेहाबाद, सिरसा, जींद व कैथल से आए कृषि अधिकारियों व प्रगतिशील किसानों को बुलाया गया था।
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कृषि महानिदेशक डॉ. हरदीप सिंह ने कहा कि हरियाणा सरकार तीन बिंदुओं पर आगे बढ़ रही है, पहला ये कि पराली को डी-कंपोजर के माध्यम से खेतों में ही खत्म किया जाए, दूसरा ये कि मशीनों के जरिये गांठ बनाकर फैक्टरियों में भेजा जाए, तीसरा जो छोटे किसान हैंऔर मशीनों का प्रयोग नहीं करना चाहते, वे बायो डी-कंपोजर से पराली प्रबंधन करें। बारिश से बनी इन चुनौतियों से निपटने की योजना पर वैज्ञानिकों ने मंथन कर कार्य करने पर सहमति बनाई।
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कृषि एवं किसान कल्याण विभाग करनाल के उप निदेशक डा. आदित्य प्रताब डबास ने बताया कि 10 लीटर पानी में 300 ग्राम गुड़ व पूसा बायो डी कंपोजर की 4 टेबलेट मिलाकर घोल तैयार करें। खेत में खड़े फसल अवशेष को पहले कटर से कटवाकर गिरा दें, उसके ऊपर घोल का स्प्रे करें। 40 से 45 दिन के अंदर फसल अवशेष खाद में तब्दील हो जाएगा। भूमि की उर्वरा शक्ति काफी बढ़ जाएगी। मित्र जीवाणु की संख्या कई गुना अधिक हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि बारिश के दिनों में कटी पड़ी फसल को खेत में न छोड़े, पांच व छह अक्तूबर से पहले कटाई करें या फिर कुछ रुक कर करें। नमी अधिक रहने पर जो ड्रिल मशीन से धान के खेत में खड़े अवशेषों के अंदर ही गेहूं की बिजाई कर दें। इससे मंडूसी आदि खरपतवार नहीं होंगे। पराली को किसी भी सूरत में न जलाएं।
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