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Karnal News: बधाई मांगना छोड़ किन्नर बनीं शिक्षक, बच्चों का संवार रहीं भविष्य
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- वर्ष 2015 से चला रहीं स्कूल, 65 बच्चे अंग्रेजी माध्यम में कर रहे पढ़ाई
- बोलीं- पढ़ी-लिखी हूं तो मांगकर क्यों बिताऊं जिंदगी
गगन तलवार
करनाल। किन्नरों के बारे में आम धारणा यही है कि वह मांगलिक कार्य की बधाई लेकर जीवन यापन करते हैं मगर कर्ण नगरी की एक पढ़ी-लिखी किन्नर ने इस धारणा को बदला है। वह शिक्षक बनकर न केवल बच्चों को मौलिक शिक्षा दे रही हैं, बल्कि इनकी स्थाई शिक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम का स्कूल भी खोला हुआ है। पांच वर्ष में अब तक वह 80 के करीब बच्चों को पढ़ा कर आगे बढ़ा चुकी हैं।
यह कहानी है मूल रूप से दिल्ली की रहने वाली किन्नर अदिति शर्मा की। जिन्होंने करनाल की गीता कॉलोनी में अपना स्कूल खोला है। उनका कहना है कि जब पोस्ट ग्रेजूएशन की दो डिग्री ले रखी हैं तो मांगकर या किसी के सहारे जीवन क्यों बिताऊं। इसलिए उन्होंने शिक्षक बनकर समाज को नई दिशा देने की ठानी। महज 100 से 200 रुपये फीस में संचालित वाले इस स्कूल में निजी स्कूलों की तरह सुविधाएं भी दी जा रही हैं।
निर्धारित वर्दी में टिपटॉप होकर बच्चे स्कूल पहुंचते हैं। अपनी सामान्य कक्षा के अलावा कंप्यूटर का बेसिक ज्ञान भी लेते हैं। 2015 में शुरू हुए स्कूल में फिलहाल पांचवीं कक्षा तक के स्कूल के संचालन की व्यवस्था है लेकिन किन्नर का स्कूल होने के कारण ज्यादातर लोग अपने बच्चों को यहां भेजने से परहेज कर रहे हैं। ऐसे में पहली कक्षा से शुरू हुआ स्कूल अभी तक केवल तीसरी कक्षा तक ही पहुंच पाया है। स्कूल में स्वच्छ पेयजल, अच्छे हवादार टाइल लगे फर्श वाले आठ कमरे भी बने हैं। जिनमें शिक्षा पर आधारित पेंटिंग भी की गई है।
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प्रिंसिपल, प्रबंधक और शिक्षक भी स्वयं
किन्नर अदिति शर्मा का कहना है कि उन्हें बधाई आदि मांगना पसंद नहीं था, इसलिए अलग रास्ता अपना और शिक्षा के माध्यम से अपनी एक अलग पहचान बनाई। वे कॉस्मेटोलॉजी और समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट हैं। खुद ही प्रिंसिपल, क्लास टीचर से लेकर प्रबंधक के कार्य करती हैं। उन्होंने बताया कि पहले तीन-चार साल तो कोई भी अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने को राजी नहीं था, लेकिन बाद में अभिभावकों की सोच बदली और बच्चों को स्कूल में भेजना शुरू किया। उसके बाद धीरे-धीरे बच्चों की भी संख्या बढ़ती गई और अब उनके पास करीब 65 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
शिष्टाचार का पढ़ा रहे पाठ
अदिति के पास दो वर्ष की एक बच्ची भी है। अदिति ने इस बच्ची को अस्पताल से गोद लिया था, जिसे अभिभावक परिवार में ज्यादा बेटियां होने के कारण रखना नहीं चाहते थे। वह दूसरे बच्चों का भी ध्यान रखती हैं। वह हिंदी मीडियम नहीं बल्कि इंग्लिश मीडियम में स्कूल चला रही हैं। बच्चों में शिष्टाचार का भी ज्ञान दिया जाता है। जैसे ही कोई स्कूल आता है तो बच्चे उसे गुड मार्निंग सर या मैम कहकर अभिवादन करते हैं और जाने पर जय हिंद बोलते हैं।
किसी ने काम पर नहीं रखा
किन्नर अदिति का कहना है कि पीजी में दो डिग्री होने के बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिली। किसी ने भी उन्हें काम पर नहीं रखा बल्कि तिरस्कार भरी नजरों से देखते हुए लोग उन्हें बधाई मांगने वाले किन्नरों के पास जाने को कहते थे। इसलिए उन्होंने शिक्षक बनकर स्कूल चलाने की ठानी। स्कूल खोला था तो लोगों की कई तरह की बातें सुनने को मिलीं। जो लक्ष्य लिया है वह उस पर अडिग है। स्कूल में वेस्ट सामग्री से उन्होंने जहाज के दो मॉडल भी तैयार किए हैं।
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- बोलीं- पढ़ी-लिखी हूं तो मांगकर क्यों बिताऊं जिंदगी
गगन तलवार
करनाल। किन्नरों के बारे में आम धारणा यही है कि वह मांगलिक कार्य की बधाई लेकर जीवन यापन करते हैं मगर कर्ण नगरी की एक पढ़ी-लिखी किन्नर ने इस धारणा को बदला है। वह शिक्षक बनकर न केवल बच्चों को मौलिक शिक्षा दे रही हैं, बल्कि इनकी स्थाई शिक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम का स्कूल भी खोला हुआ है। पांच वर्ष में अब तक वह 80 के करीब बच्चों को पढ़ा कर आगे बढ़ा चुकी हैं।
यह कहानी है मूल रूप से दिल्ली की रहने वाली किन्नर अदिति शर्मा की। जिन्होंने करनाल की गीता कॉलोनी में अपना स्कूल खोला है। उनका कहना है कि जब पोस्ट ग्रेजूएशन की दो डिग्री ले रखी हैं तो मांगकर या किसी के सहारे जीवन क्यों बिताऊं। इसलिए उन्होंने शिक्षक बनकर समाज को नई दिशा देने की ठानी। महज 100 से 200 रुपये फीस में संचालित वाले इस स्कूल में निजी स्कूलों की तरह सुविधाएं भी दी जा रही हैं।
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निर्धारित वर्दी में टिपटॉप होकर बच्चे स्कूल पहुंचते हैं। अपनी सामान्य कक्षा के अलावा कंप्यूटर का बेसिक ज्ञान भी लेते हैं। 2015 में शुरू हुए स्कूल में फिलहाल पांचवीं कक्षा तक के स्कूल के संचालन की व्यवस्था है लेकिन किन्नर का स्कूल होने के कारण ज्यादातर लोग अपने बच्चों को यहां भेजने से परहेज कर रहे हैं। ऐसे में पहली कक्षा से शुरू हुआ स्कूल अभी तक केवल तीसरी कक्षा तक ही पहुंच पाया है। स्कूल में स्वच्छ पेयजल, अच्छे हवादार टाइल लगे फर्श वाले आठ कमरे भी बने हैं। जिनमें शिक्षा पर आधारित पेंटिंग भी की गई है।
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प्रिंसिपल, प्रबंधक और शिक्षक भी स्वयं
किन्नर अदिति शर्मा का कहना है कि उन्हें बधाई आदि मांगना पसंद नहीं था, इसलिए अलग रास्ता अपना और शिक्षा के माध्यम से अपनी एक अलग पहचान बनाई। वे कॉस्मेटोलॉजी और समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट हैं। खुद ही प्रिंसिपल, क्लास टीचर से लेकर प्रबंधक के कार्य करती हैं। उन्होंने बताया कि पहले तीन-चार साल तो कोई भी अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने को राजी नहीं था, लेकिन बाद में अभिभावकों की सोच बदली और बच्चों को स्कूल में भेजना शुरू किया। उसके बाद धीरे-धीरे बच्चों की भी संख्या बढ़ती गई और अब उनके पास करीब 65 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
शिष्टाचार का पढ़ा रहे पाठ
अदिति के पास दो वर्ष की एक बच्ची भी है। अदिति ने इस बच्ची को अस्पताल से गोद लिया था, जिसे अभिभावक परिवार में ज्यादा बेटियां होने के कारण रखना नहीं चाहते थे। वह दूसरे बच्चों का भी ध्यान रखती हैं। वह हिंदी मीडियम नहीं बल्कि इंग्लिश मीडियम में स्कूल चला रही हैं। बच्चों में शिष्टाचार का भी ज्ञान दिया जाता है। जैसे ही कोई स्कूल आता है तो बच्चे उसे गुड मार्निंग सर या मैम कहकर अभिवादन करते हैं और जाने पर जय हिंद बोलते हैं।
किसी ने काम पर नहीं रखा
किन्नर अदिति का कहना है कि पीजी में दो डिग्री होने के बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिली। किसी ने भी उन्हें काम पर नहीं रखा बल्कि तिरस्कार भरी नजरों से देखते हुए लोग उन्हें बधाई मांगने वाले किन्नरों के पास जाने को कहते थे। इसलिए उन्होंने शिक्षक बनकर स्कूल चलाने की ठानी। स्कूल खोला था तो लोगों की कई तरह की बातें सुनने को मिलीं। जो लक्ष्य लिया है वह उस पर अडिग है। स्कूल में वेस्ट सामग्री से उन्होंने जहाज के दो मॉडल भी तैयार किए हैं।