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वक्त के साथ घटा साइकिल का वजन पर कीमत बढ़ी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 03 Jun 2022 02:21 AM IST
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Over time, the weight of the bicycle decreased but the price increased
माई सिटी रिपोर्टर
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करनाल। जमाना बदला तो मोटर से फिर साइकिल की तरफ लोगों का रुझान बढ़ गया है। पहले साधन के रूप में साइकिल चलाते थे। अब खुद को फिट रखने के लिए सवारी का प्रचलन बढ़ा है। वहीं तकनीक और मॉडलों के बदलते दौर में साइकिल का जैसे-जैसे वजन घटा है, वैसे-वैसे कीमत भी बढ़ती जा रही है।
कभी 11 किलोग्राम की साइकिल 1600 रुपये में मिल जाती थी। अब ऐसी सामान्य साइकिल की कीमत भी चार हजार से पार है। बात खेल जगत की करें तो अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में एक करोड़ रुपये की कीमत तक की साइकिलें आने लगी हैं। हालांकि हरियाणा में अभी भी खिलाड़ी चार से पांच लाख रुपये तक की कीमत की साइकिल से प्रतिद्वंद्वी को टक्कर देते नजर आते हैं।
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कर्ण नगरी के खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों के अनुसार विश्व स्तर पर जूनियर वर्ग के साइकिलिंग के टीम स्प्रेंट इवेंट में भारत के खिलाड़ी सबसे आगे है, वहीं हरियाणा इसलिए भी पीछे है, क्योंकि प्रदेश में कहीं भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबलों में टक्कर देने योग्य बनने के लिए वैलोड्रम की सुविधा नहीं है।
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प्रदेश की टीम में तीन-चार ही होती थी 1600 की साइकिलें
प्रशिक्षकों के अनुसार 2000 तक की देसी साइकिल से अभ्यास करना ही बड़ी बात मानी जाती थी। कुछ समय बाद रेसर साइकिल का जमाना आया। पहली रेसिंग साइकिल हॉक 1600 रुपये में मिलती थी। महंगी होने के कारण प्रदेश की टीम में तीन से चार साइकिल ही हुआ करती थी, इसीलिए आपस में मिलकर अभ्यास करते थे। वहीं 2003 व 2004 में नौ किलो वजनी साइकिल पहली माउटेंन रेसिंग आई, जोकि बिना गेयर के थी। इसी दौरान सात से आठ किलो वजनी 70 हजार रुपये की एलॉय व्हील युक्त एलुमिनियम फ्रेम वर्क आई। 2008 तक तो कई ब्रांड की साइकिल मार्केट में आ चुकी थी। पिनवैलो, सरवैलो, बीएनजी आदि अधिकतर साइकिल कार्बन फाइबर बॉडी की थी। वजन पांच से छह किलोग्राम, लेकिन कीमत डेढ़ से लेकर ढाई लाख रुपये तक थी।
सरकार ने महंगी साइकिलें दी तो बढ़ा रुझान
साइकिलिंग प्रशिक्षक ओंकार सिंह के अनुसार भारत में हुए कॉमन वेल्थ गेम के दौरान तीन से चार लाख की साइकिल प्रतियोगिता में देखी गई, जिसका वजन भी तीन से चार किलोग्राम था। 2018 में प्रदेश सरकार की ओर से खिलाड़ियों को तीन लाख से ज्यादा रुपये वाली साइकिलें बांटी गई थी। उसका साइकिलिंग खिलाड़ियों को बहुत फायदा मिला, जहां पहले करनाल में ही 10 से 15 खिलाड़ी होते थे जो कभी-कभार पदक लाते थे। अब 150 से अधिक खिलाड़ियों की टीम के साथ एक-एक वर्ष में ही 10 से 12 पदक जीत कर लाते हैं।
फोटो: 52, 53
सात लोगों का क्लब कई ग्रुपों में बदला
एलआईसी से रिटायर्ड कर्मचारी राजीव ओहरी ने पिछले तीन वर्षों से अपनी फिटनेस को प्राथमिकता देते हुए 30 हजार किलोमीटर साइकिलिंग का सफर सफलतापूर्वक पूर्ण किया। जिसके चलते उन्होंने 543 स्त्रावा डिजिटल ट्रॉफीज व 222 वर्चुअल साइकिलिंग चैलेंज भी पूर्ण किया हैं। राजीव बताते हैं कि पूर्व में करनाल के एसपी रहे पंकज नैन के प्रयासों से 2016 में रॉयल साइकिलिंग क्लब की स्थापना सात लोगों के साथ की गई थी, जो अब कई ग्रुपों में बदल चुका हैं। इसी का एक रॉयल साइकिलिंग क्लब करनाल रैंडोनियर्स क्लब जिसमें लगभग 250 से ज्यादा डाक्टर, सीए, कंप्यूटर इंजीनियर, एनडीआरआई के वैज्ञानिक, बीएसएनएल के कर्मचारी, छात्र और व्यापारी अन्य सदस्य हैं।

सड़कें भी साइकिलिंग के अनुरूप बनें
रैंडोनियर्स क्लब के प्रधान राजीव ओहरी का कहना है कि स्मार्ट सिटी के तहत ही सड़क निर्माण के दौरान साइकिलिंग को ध्यान में रखा जाना चाहिए। सरकारी कर्मचारियों को साइकिल से चलने पर प्रोत्साहन भी देना चाहिए। अभी हमारे देश में साइकिल चलाने वाले को हीन भावना से देखा जाता हैं।
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