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Karnal News: कुत्ते ही नहीं, बिल्ली, चूहे और बंदर भी नोच रहे, तीन माह में 14 फीसदी केस बढ़े

Fri, 30 Jan 2026 01:37 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल Updated Fri, 30 Jan 2026 01:37 AM IST
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Not only dogs, but cats, rats and monkeys are also biting, with a 14% increase in cases in three months.
ईएनटी रोग विशेषज्ञ डॉ. जयवर्धन
करनाल। कुत्ते ही नहीं, बिल्ली और चूहे व अन्य पालतू जानवर भी लोगों को निशाना बना रहे हैं। जिला नागरिक अस्पताल में एंटी रेबीज वैक्सीन लगवाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, बीते तीन महीनों में जानवरों के काटने के सात हजार से अधिक लोग एआरवी डोज लगवाने पहुंच रहे हैं।
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बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक हर आयु वर्ग इनका शिकार हो रहा है। आंकड़ों की बात करें तो स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, नागरिक अस्पताल में अक्तूबर माह में 2344, नवंबर में 2236 और दिसंबर में 2661 जानवरों के काटने के मामले आए जो एंटी रेबीज वैक्सीन लगवाने पहुंचे। हर मरीज को चार-चार डोज लगवानी पड़ रही हैं। इनमें 5 से 15 वर्ष और 16 से 35 वर्ष आयु वर्ग व बुजुर्ग तक शामिल हैं। बच्चे खेलते समय और युवा सड़क व सार्वजनिक स्थानों पर चलते वक्त अधिक शिकार बन रहे हैं। कई लोग जो पालतू जानवर रख रहे हैं उनको भी काटने के मामले सामने आ रहे हैं। नर्सिंग अधिकारियों का कहना है कि एंटी रेबीज वैक्सीन लगवाने के लिए 60 प्रतिशत लोग आते हैं। वहीं, मामले घटने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं।
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नागरिक अस्पताल में 1900 एंटी रेबीज वैक्सीन वाइल उपलब्ध
रेबीज से बचाव के लिए जिला नागरिक अस्पताल में करीब 1900 एआरवी वायल उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, अस्पताल में आने वाले मरीजों को पूरी डोज देने के लिए पर्याप्त मात्रा में एंटी रैबीज वैक्सीन वायल उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई लोग इन जानवरों के काटने या खरोंच को हल्का मानकर इलाज नहीं कराते, जो जानलेवा साबित हो सकता है।
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कैटेगरी के आधार पर किया जाता है इलाज
जानवरों के काटने के मामलों को गंभीरता के आधार पर कैटेगरी-1 और कैटेगरी-2 में विभाजित किया गया है। कैटेगरी-1 में बिना खून निकले हल्की खरोंच या संपर्क के मामले आते हैं, जबकि कैटेगरी-2 में खून निकलने वाली खरोंच या त्वचा को नुकसान पहुंचने पर तुरंत एआरवी लगाना जरूरी होता है। हालांकि दोनों ही मामलों में एआरवी की डोज लगनी जरूरी होती है। आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक कैटेगरी-2 के केस अधिक सामने आते हैं।

राष्ट्रीय रैबीज नियंत्रण कार्यक्रम के अधिकारी व नागरिक अस्पताल से प्रवक्ता डॉ. दीपक गोयल के अनुसार, रैबीज का वायरस नसाें के जरिये धीरे-धीरे दिमाग तक पहुंचता है। जब तक घबराहट, पानी से डर और बेचैनी जैसे लक्षण सामने आते हैं तब तक स्थिति नियंत्रण में नहीं रहती। इसके लिए जरूरी है कि समय पर वैक्सीन लें और डॉक्टर के अनुसार सभी डोज लें।
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