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शनि देव के स्वामित्व में दो अप्रैल से होगा नव संवत्सर का आगाज

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 31 Mar 2022 02:24 AM IST
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New Samvatsar will start from April 2 under the ownership of Shani Dev
संवाद न्यूज एजेंसी
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करनाल। एक जनवरी को नए साल की शुरुआत शनिवार से हुई थी, संयोगवश दो अप्रैल 2022 से विक्रम नवसंवत्सर 2079 का शुभारंभ भी शनिवार को ही होगा। शनिदेव अभी अपने स्वामित्व वाली मकर राशि में ही हैं, अगले वर्ष 29 अप्रैल को वे कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे। उसके स्वामी भी वे ही हैं। वर्तमान विक्रम संवत्सर 2078 का राजा मंगल है, जबकि अगले नवसंवत्सर के राजा शनि व मंत्री बृहस्पति (गुरु) होंगे। खास बात यह भी है कि 100 साल में 15वीं बार और 10 साल में दूसरी बार नए साल की शुरुआत शनिवार से होगी।
हिंदू कालगणना के अनुसार हिंदू वर्ष का चैत्र महीना नववर्ष का पहला महीना होता है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि हिंदू नववर्ष का पहला दिन माना जाता है। इसी तिथि पर चैत्र नवरात्रि भी आरंभ हो रहे हैं। वैदिक हिंदू परंपरा और सनातन काल गणना में चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर नववर्ष की शुरुआत होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन ब्रह्राजी ने समस्त सृष्टि की रचना की थी, इसी कारण हिंदू मान्यताओं में नए वर्ष का शुभारंभ होता है।
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श्री श्याम बाला ज्योतिष केंद्र के संचालक पंडित विनोद शास्त्री ने बताया कि फाल्गुन पूर्णिमा तिथि के बाद चैत्र कृष्ण प्रतिपदा लग जाती है, फिर भी उसके 15 दिन बाद नया हिंदू नववर्ष मनाया जाता है। दरअसल चैत्र का महीना होली के दूसरे दिन ही शुरू हो जाता है, लेकिन यह कृष्ण पक्ष होता है, जो कृष्ण पक्ष पूर्णिमा से अमावस्या तिथि के 15 दिनों तक रहता है और कृष्ण पक्ष के इन 15 दिनों में चंद्रमा धीरे-धीरे लगातार घटने के कारण पूरे आकाश में अंधेरा छाने लगता है। सनातन धर्म का आधार हमेशा अंधेरे से उजाले की तरफ बढ़ने का रहा है यानि तमसो मां ज्योतिर्गमय, इसी वजह से चैत्र माह लगने के 15 दिन बाद जब शुक्ल पक्ष लगता तो प्रतिपदा तिथि से हिंदू नववर्ष मनाया जाता है। अमावस्या के अगले दिन शुक्ल पक्ष लगने से चंद्रमा हर दिन बढ़ता जाता है।
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चैत्र माह की प्रतिपदा तिथि पर ही महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, माह और वर्ष की गणना करते हुए हिंदू पंचांग की रचना की थी। इस तिथि से ही नए पंचांग प्रारंभ होते हैं और वर्ष भर के पर्व, उत्सव और अनुष्ठानों के शुभ मुहूर्त निश्चित होते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इस वजह से भी चैत्र प्रतिपदा तिथि का इतना महत्व है।

ऐसे करें शुरूआत
इस दिन प्रात: नित्य कर्म के बाद तेल का उबटन लगाकर स्नान आदि से शुद्ध एवं पवित्र होकर हाथ में गंध अक्षत पुष्प और जल लेकर देश काल का उच्चारण करते हुए संकल्प करना चाहिए और यह संकल्प करने के बाद गणेश अंबिका पूजन आदि के पश्चात ओम ब्राह्मण नम: मंत्र से ब्रह्मा जी का वान षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। इस दिन पंचांग का श्रवण भी करना चाहिए। नवीन पंचांग से इस वर्ष के राजा मंत्री सेना अध्यक्ष आदि का तथा वर्ष का फल रावण करना चाहिए, यथासामर्थ्य दान करना चाहिए। नया वस्त्र धारण करना चाहिए तथा घर को ध्वज पताका बंदनवार आदि से सजाना चाहिए। आज के दिन नीम के पत्तों-पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा और अजवाइन डालकर खाना चाहिए, इससे रक्त विकार नहीं होता और आरोग्य की प्राप्ति होती है। इस दिन नवरात्र के लिए घटस्थापना और तिलक व्रत भी किया जाता है। यथासंभव नदी सरोवर, घर पर स्नान करके संवत्सर की मूर्ति बनाकर उसका चित्र वसंत आदि नामों से पूजन करना चाहिए।
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