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बचपन में दौड़ से शुरू किया सफर, अब महिला थाने की हैं अफसर
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यूं तो दुनिया के सारे गम मैं हंस के ढो लेती हूं, जब भी पिता की याद आती है अक्सर खुद को आइने में देख लेती हूं। यह लाइनें करनाल की थाना प्रभारी इंस्पेक्टर पवना राणा के जीवन को चरितार्थ कर रहीं हैं। चार साल की उम्र में पिता को खोने के बाद उनके जैसा बनने की ललक ने पवना को इस मुकाम तक पहुंचा दिया। पवना ने सात साल की उम्र में ही पहाड़ों में दौड़ना शुरू कर दिया और 12 साल की उम्र में प्रदेशस्तर पर 10 मेडल जीते। 1987 में अफसर बनने की ओर उनके कदम बढ़े और वह हरियाणा पुलिस में सिपाही नियुक्त हुईं। आज करनाल की महिला थाना प्रभारी बनकर महिलाओं को इंसाफ दिला रही हैं।-संवाद
मां और चाचा की जुबानी सुनी पिता की कहानी
इंस्पेक्टर पवना का जन्म हिमाचल के कांगड़ा गांव में हुआ था। पिता के गुजर जाने के बाद पवना के परिवार को उसके दो चाचाओं ने संभाला। वह पांच बहनों में तीसरे नंबर पर थी। उसने दसवीं तक पढ़ाई की। पिता के बारे में वह हमेशा अपनी मां और चाचा से कहानियां सुनती थी कि उनके पिता ने भी देश सेवा के मकसद से हरियाणा पुलिस में जगह बनाई थी। वे इंस्पेक्टर बनने ही वाले थे कि अचानक उनकी मौत हो गई।
20 साल की उम्र में बनीं सिपाही
पुलिस में भर्ती होने का सपना पूरा करने के लिए उन्होंने फौजी चाचा से प्रशिक्षण दिया और 12 साल की उम्र में ही 15 पदक जीत लिए। जब पवना 18 साल की हुई तो उसके परिवार को सर्विस लेटर मिला। माता सर्विस नहीं कर सकती थी इसलिए पवना आगे आईं। 1987 में 20 साल की उम्र में उन्होंने पुलिस में भर्ती के लिए फिजिकल टेस्ट पास किया। इसके बाद सिपाही के पद पर भर्ती हुई। 1997 में पवना थाना प्रभारी के पद पर नियुक्त हुईं। वह बतातीं हैं कि इंस्पेक्टर बनने के बाद महसूस हुआ कि पिता का सपना अब पूरा हो गया है। आज पवना पांचों बहनों में अकेली अफसर हैं। अन्य चारों बहनें ग्रहणी हैं।
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1989 में पवना ने रविंद्र राणा से शादी की। वह होमगार्ड में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कमांडर हैं। पति और सास के सहयोग से पवना शादी के बाद भी नौकरी कर पाई। उनकी सास उनके साथ हर पोस्टिंग पर रही। उनके दो बच्चों की शादी भी हो चुकी है। पवना को कई वीरता और सम्मान पुरस्कार मिल चुके हैं। पवना का कहना है कि जब भी उन्होंने खुद को कमजोर पाया तो परिवार का साथ मिला। अगर महिला कुछ हासिल करने की ठान ले तो चाहे कितनी भी मुश्किलें आए मंजिल मिल जाती है।
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मां और चाचा की जुबानी सुनी पिता की कहानी
इंस्पेक्टर पवना का जन्म हिमाचल के कांगड़ा गांव में हुआ था। पिता के गुजर जाने के बाद पवना के परिवार को उसके दो चाचाओं ने संभाला। वह पांच बहनों में तीसरे नंबर पर थी। उसने दसवीं तक पढ़ाई की। पिता के बारे में वह हमेशा अपनी मां और चाचा से कहानियां सुनती थी कि उनके पिता ने भी देश सेवा के मकसद से हरियाणा पुलिस में जगह बनाई थी। वे इंस्पेक्टर बनने ही वाले थे कि अचानक उनकी मौत हो गई।
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20 साल की उम्र में बनीं सिपाही
पुलिस में भर्ती होने का सपना पूरा करने के लिए उन्होंने फौजी चाचा से प्रशिक्षण दिया और 12 साल की उम्र में ही 15 पदक जीत लिए। जब पवना 18 साल की हुई तो उसके परिवार को सर्विस लेटर मिला। माता सर्विस नहीं कर सकती थी इसलिए पवना आगे आईं। 1987 में 20 साल की उम्र में उन्होंने पुलिस में भर्ती के लिए फिजिकल टेस्ट पास किया। इसके बाद सिपाही के पद पर भर्ती हुई। 1997 में पवना थाना प्रभारी के पद पर नियुक्त हुईं। वह बतातीं हैं कि इंस्पेक्टर बनने के बाद महसूस हुआ कि पिता का सपना अब पूरा हो गया है। आज पवना पांचों बहनों में अकेली अफसर हैं। अन्य चारों बहनें ग्रहणी हैं।
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1989 में पवना ने रविंद्र राणा से शादी की। वह होमगार्ड में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कमांडर हैं। पति और सास के सहयोग से पवना शादी के बाद भी नौकरी कर पाई। उनकी सास उनके साथ हर पोस्टिंग पर रही। उनके दो बच्चों की शादी भी हो चुकी है। पवना को कई वीरता और सम्मान पुरस्कार मिल चुके हैं। पवना का कहना है कि जब भी उन्होंने खुद को कमजोर पाया तो परिवार का साथ मिला। अगर महिला कुछ हासिल करने की ठान ले तो चाहे कितनी भी मुश्किलें आए मंजिल मिल जाती है।