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कर्णनगरी की बेटी ने समझा आदिवासियों का दर्द, उत्थान का उठाया बीड़ा
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56: वरिष्ठ रंगकर्मी कृष्ण मलिक
भानू भारद्वाज
करनाल। कुछ अलग करने का जज्बा हो तो हालात व दूरियां मायने नहीं रखतीं। पढ़ाई के दौरान ही कर्ण नगरी की बेटी यशिका ने आदिवासियों के उत्थान का बीड़ा उठाकर यह साबित कर दिखाया। यशिका ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान उन्होंने असम में आदिवासियों के साथ समय बिताकर उनका दर्द समझा और अब उसे दूर कर शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास में जुटी हैं।
यशिका ने बताया कि पीजी की पढ़ाई के दौरान उसने देश के पारंपरिक शिल्प से जुड़ी एनजीओ में काम करना शुरू किया। सबसे पहले असम के एक आदिवासी इलाके में स्थित आगोर संगठन से जुड़ी। साथ ही गुजरात के कच्छ स्थित खमीर संस्था के साथ मिलकर कपास, ऊन कताई और हथकरघा यानी हाथ से कपड़ा बनाने वाली महिलाओं के काम को जाना और उनकी दशा सुधारने का संकल्प लिया। यशिका ने बताया कि
इनके उत्पाद को देशभर में पहचान मिले, इसके लिए कच्छ स्थिति सोमैया कला विद्या संस्थान के साथ कार्यक्रम समन्वयक के रूप में जुड़ी। अब इस संस्था के बैनर तले इन परंपरागत हस्तकला कारीगरों को डिजाइन की शिक्षा प्रदान कर रही हूं, ताकि वे अपने उत्पाद हैंडलूम साड़ी, चुनरी, स्टोल, होम डेकोर आदि बनाकर इससे अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकें।
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रचनात्मक गतिविधियों में है रूचि
यशिका ने बताया कि उनकी रुचि रचनात्मक गतिविधियां जैसे खेलकूद और कला में है। स्नातक की पढ़ाई के लिए जब उन्होंने केवीए डीएवी कॉलेज में दाखिला लिया तो पहले सेमेस्टर में ही ठान लिया था कि पढ़ाई के साथ कुछ अलग करना है। प्रथम वर्ष में ही कॉलेज के छात्र परिषद का हिस्सा बनीं। द्वितीय वर्ष उपाध्यक्ष और अंतिम वर्ष में अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाई। उस समय कॉलेज में एक पहचान तो थी, साथ ही यह अहसास भी हुआ कि जब हम समाज में एक समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं तो उसके साथ एक जिम्मेदारी भी बनती है। बस यहीं से उनके सफर की शुरुआत हुई। अपने इरादे को पूरा करने के लिए अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी बंगलुरु से एमए इन डेवलपमेंट कोर्स चुना। जहां समाज के कई पहलुओं के बारे में समझा जैसे राजनीति, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, आजीविका इत्यादि।
रंगमंच, फिल्मों के जरिए कृष्ण मलिक जगा रहे अलख
करनाल। हरियाणवी संस्कृति को रंगमंच और फिल्मों के माध्यम से बढ़ावा देने की दिशा में कर्णनगरी के वरिष्ठ रंगकर्मी कृष्ण मलिक अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। कृष्ण मलिक का कहना है कि युवा अवस्था को परिभाषित करना बहुत मुश्किल कार्य है। कहते हैं कि आदमी उम्र से नहीं अपितु दिल से जवान होता है। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर प्रत्येक युवा के लिए केवल अपने भविष्य की चिंता नहीं बल्कि समाज की नब्ज को भी समझना जरूरी है। तकनीक के इस युग में जहां युवाओं के लिए बहुत काम सरल हो गए हैं, वहीं उसके ऊपर बढ़ता मानसिक दबाव चिंता का विषय है। आज भागदौड़ भरी जिंदगी में युवा को संवेदना, प्रेम, आपसी भाईचारा, परिवार, रिश्ते, जीवन, संबंधों और माता-पिता जैसे सरल शब्दों सहित जीवन में अहम भूमिका निभाने वाले शब्दों के जरिए उसके मानसिक दबाव को कम करने की कोशिश करने की जरूरत है, ताकि उन्हें मुख्यधारा में जोड़े रखा जा सके। ब्यूरो
परिवार-समाज की अहमियत समझें युवा
रंगमंच का विद्यार्थी और अध्यापक होने के नाते मैंने हमेशा ये प्रयास किया है कि युवा परिवार और समाज से अलग-थलग न हो कर उसकी अहमियत को समझें और अपने जीवन में सांस्कृतिक संस्कारों के साथ सामाजिक पृष्ठभूमि को मजबूत करने में अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करें। ऐसे में रंगमंच के जरिए मैंने विभिन्न शैक्षणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ कार्यशालाओं के माध्यम से हमेशा ये बीज बोने की कोशिश की है। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं इस दिशा में कुछ हद तक सफल भी रहा।
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करनाल। कुछ अलग करने का जज्बा हो तो हालात व दूरियां मायने नहीं रखतीं। पढ़ाई के दौरान ही कर्ण नगरी की बेटी यशिका ने आदिवासियों के उत्थान का बीड़ा उठाकर यह साबित कर दिखाया। यशिका ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान उन्होंने असम में आदिवासियों के साथ समय बिताकर उनका दर्द समझा और अब उसे दूर कर शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास में जुटी हैं।
यशिका ने बताया कि पीजी की पढ़ाई के दौरान उसने देश के पारंपरिक शिल्प से जुड़ी एनजीओ में काम करना शुरू किया। सबसे पहले असम के एक आदिवासी इलाके में स्थित आगोर संगठन से जुड़ी। साथ ही गुजरात के कच्छ स्थित खमीर संस्था के साथ मिलकर कपास, ऊन कताई और हथकरघा यानी हाथ से कपड़ा बनाने वाली महिलाओं के काम को जाना और उनकी दशा सुधारने का संकल्प लिया। यशिका ने बताया कि
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इनके उत्पाद को देशभर में पहचान मिले, इसके लिए कच्छ स्थिति सोमैया कला विद्या संस्थान के साथ कार्यक्रम समन्वयक के रूप में जुड़ी। अब इस संस्था के बैनर तले इन परंपरागत हस्तकला कारीगरों को डिजाइन की शिक्षा प्रदान कर रही हूं, ताकि वे अपने उत्पाद हैंडलूम साड़ी, चुनरी, स्टोल, होम डेकोर आदि बनाकर इससे अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकें।
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रचनात्मक गतिविधियों में है रूचि
यशिका ने बताया कि उनकी रुचि रचनात्मक गतिविधियां जैसे खेलकूद और कला में है। स्नातक की पढ़ाई के लिए जब उन्होंने केवीए डीएवी कॉलेज में दाखिला लिया तो पहले सेमेस्टर में ही ठान लिया था कि पढ़ाई के साथ कुछ अलग करना है। प्रथम वर्ष में ही कॉलेज के छात्र परिषद का हिस्सा बनीं। द्वितीय वर्ष उपाध्यक्ष और अंतिम वर्ष में अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाई। उस समय कॉलेज में एक पहचान तो थी, साथ ही यह अहसास भी हुआ कि जब हम समाज में एक समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं तो उसके साथ एक जिम्मेदारी भी बनती है। बस यहीं से उनके सफर की शुरुआत हुई। अपने इरादे को पूरा करने के लिए अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी बंगलुरु से एमए इन डेवलपमेंट कोर्स चुना। जहां समाज के कई पहलुओं के बारे में समझा जैसे राजनीति, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, आजीविका इत्यादि।
रंगमंच, फिल्मों के जरिए कृष्ण मलिक जगा रहे अलख
करनाल। हरियाणवी संस्कृति को रंगमंच और फिल्मों के माध्यम से बढ़ावा देने की दिशा में कर्णनगरी के वरिष्ठ रंगकर्मी कृष्ण मलिक अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। कृष्ण मलिक का कहना है कि युवा अवस्था को परिभाषित करना बहुत मुश्किल कार्य है। कहते हैं कि आदमी उम्र से नहीं अपितु दिल से जवान होता है। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर प्रत्येक युवा के लिए केवल अपने भविष्य की चिंता नहीं बल्कि समाज की नब्ज को भी समझना जरूरी है। तकनीक के इस युग में जहां युवाओं के लिए बहुत काम सरल हो गए हैं, वहीं उसके ऊपर बढ़ता मानसिक दबाव चिंता का विषय है। आज भागदौड़ भरी जिंदगी में युवा को संवेदना, प्रेम, आपसी भाईचारा, परिवार, रिश्ते, जीवन, संबंधों और माता-पिता जैसे सरल शब्दों सहित जीवन में अहम भूमिका निभाने वाले शब्दों के जरिए उसके मानसिक दबाव को कम करने की कोशिश करने की जरूरत है, ताकि उन्हें मुख्यधारा में जोड़े रखा जा सके। ब्यूरो
परिवार-समाज की अहमियत समझें युवा
रंगमंच का विद्यार्थी और अध्यापक होने के नाते मैंने हमेशा ये प्रयास किया है कि युवा परिवार और समाज से अलग-थलग न हो कर उसकी अहमियत को समझें और अपने जीवन में सांस्कृतिक संस्कारों के साथ सामाजिक पृष्ठभूमि को मजबूत करने में अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करें। ऐसे में रंगमंच के जरिए मैंने विभिन्न शैक्षणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ कार्यशालाओं के माध्यम से हमेशा ये बीज बोने की कोशिश की है। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं इस दिशा में कुछ हद तक सफल भी रहा।

55: आदिवासी जनजाती के साथ करनाल की यशिका ।