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Karnal News: भरे शहर में बुजुर्गों को पनाह नहीं मिलती, फुटपाथ पे सोये तो जगह नहीं मिलती...
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- मासिक काव्य गोष्ठी में कवियों ने अपनी रचनाएं पेश कर बटोरीं तालियां
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। कुंजपुरा गांव स्थित रामलीला भवन में रविवार को विकास क्लब साहित्य कला मंच के मासिक साझा विरासत कार्यक्रम में कवियों ने अपनी रचनाएं सुनाकर खूब तालियां बटोरीं।प्रेमपाल सागर ने कहा, भरे शहर में बुजुर्गों को पनाह नहीं मिलती, फुटपाथ पे सोये तो जगह नहीं मिलती, फूलों के तीरो-तबर से है बागवां जरूरी, कराह रहे दिन-रात दवा नहीं मिलती...। रचनाकार डॉ. कमर रईस सोनीपत ने कहा, हर नशेमन पे हो बरकत जरूरी तो नहीं, दिल की पूरी हो हर इक बात जरूरी तो नहीं...। कवि भारत भूषण वर्मा असंध ने कहा, सहज मिलती नहीं खुशियां यकीनन, मिली हैं जो उसे तू यूं न गंवा...।
मोहम्मद साबिर खान ने कहा, जिस संग दर पे सजदे से तसकीन ही न हो, उस संग दर पे भूल के सजदा न कीजिये...। कमलेश कुमार पालीवाल कमल ने कहा कि सिर्फ पानी ही मेरे दर्द का उपचार लगता है, रो लेता हूं मैं जब हृदय पर भार लगता है...। सतविंद्र राणा बाल ने कहा कि तेरी गलियों को छान कर जाना, क्या-क्या होता है यार आंखों में...। रामेश्वर देव ने कहा कि लड़खड़ाते कदमों से भी चलने की कोशिश की है, मुश्किलों में पार दरिया करने की कोशिश की है...।
रचनाकार सत्या कोहंड ने कहा, नदियों से झरनों से बसंत के फूलों से चुनी जाती है कविता, यादों से जज्बातों से मीठी-मीठी बातों से बुनी जाती है कविता...। ममता प्रवीण ने कहा कि यह सब छिनता ही रहेगा, मानवता जब तक न समझोगे इसका सही अर्थ उलझा उलझा छल...। अमित कामरा ने कहा, बड़ा होना भी एक कला है...। सलिंद्र मचल ने हम तेरे शहर में आए एक मुसाफिर की तरह... गीत गाया। मंच संचालन कर रहे अश्विनी शर्मा ने कहा कि तुम न समझो मगर ये हकीकत है...। सचिन पाल दिवाना ने कहा, पतझड़ सी वीराना है जिंदगी, तू अब बहारों की बात न कर...। इस मौके पर पूर्णचंद शर्मा, पंकज गहलोत, रविंद्र कुमार मौजूद रहे। क्लब के संरक्षक संत प्रेमपाल सागर ने कहा कि आतंकवाद को कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता। पूरी दुनिया को मिल बैठकर समस्या का समाधान निकालना चाहिए और विश्व शांति के प्रयास किए जाने चाहिए।
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। कुंजपुरा गांव स्थित रामलीला भवन में रविवार को विकास क्लब साहित्य कला मंच के मासिक साझा विरासत कार्यक्रम में कवियों ने अपनी रचनाएं सुनाकर खूब तालियां बटोरीं।प्रेमपाल सागर ने कहा, भरे शहर में बुजुर्गों को पनाह नहीं मिलती, फुटपाथ पे सोये तो जगह नहीं मिलती, फूलों के तीरो-तबर से है बागवां जरूरी, कराह रहे दिन-रात दवा नहीं मिलती...। रचनाकार डॉ. कमर रईस सोनीपत ने कहा, हर नशेमन पे हो बरकत जरूरी तो नहीं, दिल की पूरी हो हर इक बात जरूरी तो नहीं...। कवि भारत भूषण वर्मा असंध ने कहा, सहज मिलती नहीं खुशियां यकीनन, मिली हैं जो उसे तू यूं न गंवा...।
मोहम्मद साबिर खान ने कहा, जिस संग दर पे सजदे से तसकीन ही न हो, उस संग दर पे भूल के सजदा न कीजिये...। कमलेश कुमार पालीवाल कमल ने कहा कि सिर्फ पानी ही मेरे दर्द का उपचार लगता है, रो लेता हूं मैं जब हृदय पर भार लगता है...। सतविंद्र राणा बाल ने कहा कि तेरी गलियों को छान कर जाना, क्या-क्या होता है यार आंखों में...। रामेश्वर देव ने कहा कि लड़खड़ाते कदमों से भी चलने की कोशिश की है, मुश्किलों में पार दरिया करने की कोशिश की है...।
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रचनाकार सत्या कोहंड ने कहा, नदियों से झरनों से बसंत के फूलों से चुनी जाती है कविता, यादों से जज्बातों से मीठी-मीठी बातों से बुनी जाती है कविता...। ममता प्रवीण ने कहा कि यह सब छिनता ही रहेगा, मानवता जब तक न समझोगे इसका सही अर्थ उलझा उलझा छल...। अमित कामरा ने कहा, बड़ा होना भी एक कला है...। सलिंद्र मचल ने हम तेरे शहर में आए एक मुसाफिर की तरह... गीत गाया। मंच संचालन कर रहे अश्विनी शर्मा ने कहा कि तुम न समझो मगर ये हकीकत है...। सचिन पाल दिवाना ने कहा, पतझड़ सी वीराना है जिंदगी, तू अब बहारों की बात न कर...। इस मौके पर पूर्णचंद शर्मा, पंकज गहलोत, रविंद्र कुमार मौजूद रहे। क्लब के संरक्षक संत प्रेमपाल सागर ने कहा कि आतंकवाद को कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता। पूरी दुनिया को मिल बैठकर समस्या का समाधान निकालना चाहिए और विश्व शांति के प्रयास किए जाने चाहिए।
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