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श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व से मिलती है प्रेरणा : स्वामी शाश्वत
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- श्रीकृष्ण मंदिर सेक्टर-14 में श्रीमद्भागवत कथा आयोजित
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। श्रीकृष्ण मंदिर सेक्टर-14 में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में प्रवचन करते हुए श्रीधाम गोदा विहार मंदिर, वृंदावन के महंत स्वामी शाश्वत आचार्य ने कहा कि श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व के अनेक पहलू हमें प्रेरणा देते हैं। वह मां के सामने रूठने की लीलाएं करने वाले बालकृष्ण हैं, तो अर्जुन को गीता का ज्ञान देने वाले योगेश्वर कृष्ण। इस व्यक्तित्व का सर्वाधिक आकर्षक पहलू दूसरे के निर्णयों का सम्मान है।
कृष्ण के मन में सबका सम्मान है। वह मानते हैं कि सभी को अपने अनुसार जीने का अधिकार है। उन्होंने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि कन्हैया जैसी लीला मनुष्य क्या कोई अन्य देव नहीं कर सकता। लीला और क्रिया में अंतर होता है, भगवान ने लीला की है। जैसे जिसको कर्तव्य का अभिमान तथा सुखी रहने की इच्छा हो तो वह क्रिया कहलाती है। जिसको न तो कर्तव्य का अभिमान है और न ही सुखी रहने की इच्छा हो बल्कि दूसरों को सुखी रखने की इच्छा को लीला कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने वहीं लीला की जिससे सभी गोकुल वासी सुखी हुए।
रासलीला का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान कृष्ण द्वारा संपादित रासलीला साधारण लीला नही है। श्री कृष्ण की बाल लीलाओं को समझने के लिए गोपी भाव से भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करनी होगी। आचार्य ने कहा कि इंद्र का अभिमान भंग करने के लिए भगवान ने इस लीला की रचना की। गिरिराज पूजा के प्रसंग में श्रीकृष्ण ने कर्म पर पहला उपदेश नंदबाबा को दिया है। यह ब्रज संस्कृति का अस्मिता मूलक प्रस्थान बिंदु भी हैं।
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करनाल। श्रीकृष्ण मंदिर सेक्टर-14 में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में प्रवचन करते हुए श्रीधाम गोदा विहार मंदिर, वृंदावन के महंत स्वामी शाश्वत आचार्य ने कहा कि श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व के अनेक पहलू हमें प्रेरणा देते हैं। वह मां के सामने रूठने की लीलाएं करने वाले बालकृष्ण हैं, तो अर्जुन को गीता का ज्ञान देने वाले योगेश्वर कृष्ण। इस व्यक्तित्व का सर्वाधिक आकर्षक पहलू दूसरे के निर्णयों का सम्मान है।
कृष्ण के मन में सबका सम्मान है। वह मानते हैं कि सभी को अपने अनुसार जीने का अधिकार है। उन्होंने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि कन्हैया जैसी लीला मनुष्य क्या कोई अन्य देव नहीं कर सकता। लीला और क्रिया में अंतर होता है, भगवान ने लीला की है। जैसे जिसको कर्तव्य का अभिमान तथा सुखी रहने की इच्छा हो तो वह क्रिया कहलाती है। जिसको न तो कर्तव्य का अभिमान है और न ही सुखी रहने की इच्छा हो बल्कि दूसरों को सुखी रखने की इच्छा को लीला कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने वहीं लीला की जिससे सभी गोकुल वासी सुखी हुए।
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रासलीला का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान कृष्ण द्वारा संपादित रासलीला साधारण लीला नही है। श्री कृष्ण की बाल लीलाओं को समझने के लिए गोपी भाव से भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करनी होगी। आचार्य ने कहा कि इंद्र का अभिमान भंग करने के लिए भगवान ने इस लीला की रचना की। गिरिराज पूजा के प्रसंग में श्रीकृष्ण ने कर्म पर पहला उपदेश नंदबाबा को दिया है। यह ब्रज संस्कृति का अस्मिता मूलक प्रस्थान बिंदु भी हैं।
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