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आईआईडब्ल्यूबीआर को मिला नानाजी देशमुख अवॉर्ड
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) करनाल को नानाजी देशमुख अवॉर्ड मिलने पर संस्थान के वैज्ञानिकों व कर्मचारियों में खुशी की लहर है। संस्थान के निदेशक डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के स्थापना दिवस पर शनिवार को नई दिल्ली में आयोजित समारोह में इस सम्मान से नवाजा गया। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने उन्हें सम्मानित किया।
अनुसंधान के क्षेत्र में यह पुरस्कार किसी भी अनुसंधान टीम को उसके उत्कृष्ट कार्यों के लिए दिया जाता है। संस्थान की टीम ने वर्ष 2017 में सबसे पहले भारत की पहली जैव संवर्धित गेहूं की किस्म डब्ल्यूबी-02 विकसित की जो जिंक व आयरन से परिपूर्ण है। उसके बाद कर्ण वंदना डीबीडब्ल्यू-187 विकसित की, जिसमें उच्च उत्पादन क्षमता है।
यह किस्म देश के सभी महत्वपूर्ण हिस्सों के लिए अनुशंसित है और किसानों द्वारा लगातार पसंद की जा रही है। उसके बाद नई किस्मों के बीज उत्पादन को लेकर 488 कंपनियों द्वारा अनुबंध हस्ताक्षर किए गए। जिसमें डीबीडब्ल्यू-187, डीबीडब्ल्यू-222 व डीबीडब्ल्यू-303 किस्में शामिल हैं।
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अंतस्थ ताप सहने की क्षमता
इस संस्थान से विकसित गेहूं की डीबीडब्ल्यू-90, डीबीडब्ल्यू-107, डीबीडब्ल्यू-173 व डीबीडब्ल्यू-303 किस्मों में अंतस्थ ताप को सहन करने की क्षमता है। इसी क्रम में डीबीडब्ल्यू-93, डीबीडब्ल्यू-47 व डीबीडब्ल्यू-48 किस्में विकसित की गई। साथ ही 67 जेनेटिक स्टॉक का पंजीकरण किया गया। ये सभी किस्में रोग रोधी और उच्च उत्पादन क्षमता वाली हैं। संस्थान द्वारा रोटरी डिस्क ड्रिल नामक मशीन का भी आविष्कार किया गया है जो पराली प्रबंधन में काफी सहायक होगी। गेहूं में मंडूसी नामक खरपतवार के नियंत्रण के लिए भी संस्थान ने उत्कृष्ट कार्य किया है तथा दो एसएनपी (सिंगल न्यूक्लीयोटाइड पोलीमोरपिज्म) की पहचान की है। जो मंडूसी के नियंत्रण में काफी कारगर होंगे।
भारतीय गेहूं की विदेशों में बढ़ी मांग
संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अनुज कुमार ने कहा कि गेहूं उत्पादन बढ़ाने और देश की खाद्य सुरक्षा को कायम रखने में इस संस्थान की अहम भूमिका रही है। गेहूं की वार्षिक घरेलू खपत 80 से 90 मिलियन टन तक है। वहीं पिछले वर्ष गेहूूं का उत्पादन 109.52 मिलियन टन था। देश में गेहूं का रकबा करीब 31.50 मिलियन हेक्टेयर था। इस वर्ष भी गेहूं उत्पादन में कमी नहीं रही और करीब 107 मिलियन टन गेहूं उत्पादन हुआ। वहीं कोरोना काल और रूस-यूक्रेन युद्ध के हालातों में भारतीय गेहूं की विदेशों में मांग बढ़ी।
उच्च गुणवत्ता वाली प्रजातियां विकसित करने पर होगा जार
संस्थान के निदेशक डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि देश में अनाज की कमी नहीं रही। अब गेहूं की गुणवत्ता पर जोर दिया जा रहा है। इस दिशा में अनुसंधान कार्यों पर वैज्ञानिकों का ध्यान केंद्रित है। उच्च गुणवत्ता और उत्पादकता वाली गेहूं की प्रजातियां विकसित करने पर जोर दिया जाएगा।
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करनाल। भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) करनाल को नानाजी देशमुख अवॉर्ड मिलने पर संस्थान के वैज्ञानिकों व कर्मचारियों में खुशी की लहर है। संस्थान के निदेशक डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के स्थापना दिवस पर शनिवार को नई दिल्ली में आयोजित समारोह में इस सम्मान से नवाजा गया। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने उन्हें सम्मानित किया।
अनुसंधान के क्षेत्र में यह पुरस्कार किसी भी अनुसंधान टीम को उसके उत्कृष्ट कार्यों के लिए दिया जाता है। संस्थान की टीम ने वर्ष 2017 में सबसे पहले भारत की पहली जैव संवर्धित गेहूं की किस्म डब्ल्यूबी-02 विकसित की जो जिंक व आयरन से परिपूर्ण है। उसके बाद कर्ण वंदना डीबीडब्ल्यू-187 विकसित की, जिसमें उच्च उत्पादन क्षमता है।
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यह किस्म देश के सभी महत्वपूर्ण हिस्सों के लिए अनुशंसित है और किसानों द्वारा लगातार पसंद की जा रही है। उसके बाद नई किस्मों के बीज उत्पादन को लेकर 488 कंपनियों द्वारा अनुबंध हस्ताक्षर किए गए। जिसमें डीबीडब्ल्यू-187, डीबीडब्ल्यू-222 व डीबीडब्ल्यू-303 किस्में शामिल हैं।
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अंतस्थ ताप सहने की क्षमता
इस संस्थान से विकसित गेहूं की डीबीडब्ल्यू-90, डीबीडब्ल्यू-107, डीबीडब्ल्यू-173 व डीबीडब्ल्यू-303 किस्मों में अंतस्थ ताप को सहन करने की क्षमता है। इसी क्रम में डीबीडब्ल्यू-93, डीबीडब्ल्यू-47 व डीबीडब्ल्यू-48 किस्में विकसित की गई। साथ ही 67 जेनेटिक स्टॉक का पंजीकरण किया गया। ये सभी किस्में रोग रोधी और उच्च उत्पादन क्षमता वाली हैं। संस्थान द्वारा रोटरी डिस्क ड्रिल नामक मशीन का भी आविष्कार किया गया है जो पराली प्रबंधन में काफी सहायक होगी। गेहूं में मंडूसी नामक खरपतवार के नियंत्रण के लिए भी संस्थान ने उत्कृष्ट कार्य किया है तथा दो एसएनपी (सिंगल न्यूक्लीयोटाइड पोलीमोरपिज्म) की पहचान की है। जो मंडूसी के नियंत्रण में काफी कारगर होंगे।
भारतीय गेहूं की विदेशों में बढ़ी मांग
संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अनुज कुमार ने कहा कि गेहूं उत्पादन बढ़ाने और देश की खाद्य सुरक्षा को कायम रखने में इस संस्थान की अहम भूमिका रही है। गेहूं की वार्षिक घरेलू खपत 80 से 90 मिलियन टन तक है। वहीं पिछले वर्ष गेहूूं का उत्पादन 109.52 मिलियन टन था। देश में गेहूं का रकबा करीब 31.50 मिलियन हेक्टेयर था। इस वर्ष भी गेहूं उत्पादन में कमी नहीं रही और करीब 107 मिलियन टन गेहूं उत्पादन हुआ। वहीं कोरोना काल और रूस-यूक्रेन युद्ध के हालातों में भारतीय गेहूं की विदेशों में मांग बढ़ी।
उच्च गुणवत्ता वाली प्रजातियां विकसित करने पर होगा जार
संस्थान के निदेशक डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि देश में अनाज की कमी नहीं रही। अब गेहूं की गुणवत्ता पर जोर दिया जा रहा है। इस दिशा में अनुसंधान कार्यों पर वैज्ञानिकों का ध्यान केंद्रित है। उच्च गुणवत्ता और उत्पादकता वाली गेहूं की प्रजातियां विकसित करने पर जोर दिया जाएगा।