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Haryana: भाजपा ने साधे एक तीर से तीन निशाने, लोस चुनाव से पहले ही बिछाई विधानसभा चुनाव के लिए नई सियासी बिसात

Wed, 13 Mar 2024 04:01 AM IST
भूपेंद्र सिंह मोहित धुपड़, अमर उजाला, करनाल (हरियाणा)
मोहित धुपड़, अमर उजाला, करनाल (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Wed, 13 Mar 2024 04:01 AM IST
सार

सीएम के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी का डर खत्म करने व पिछड़े वर्ग की 78 बिरादरियों को साधने की कोशिश है। जाट मतदाताओं का बिखराव और गैर जाट वोट बैंक का साथ होने की संभावना से भाजपा को सूबे में फायदेमंद दिख रहा है।

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Haryana: BJP lays new political chessboard for assembly elections even before Lok Sabha elections
मनोहर लाल और नायब सिंह सैनी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा ने हरियाणा में बड़ा फेरबदल कर एक तीर से तीन निशाने साधने का काम किया है। कुछ ही घंटों के दौरान सूबे के मुख्यमंत्री का चेहरा बदल देना भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। ऐसा कर भाजपा ने लोकसभा चुनाव के दौरान ही छह माह बाद हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सियासत की नई बिसात बिछा दी है।

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हालांकि मनोहर लाल को सीएम पद से हटाने संबंधी फैसले को विपक्ष अपने तरीके से भुनाने की कोशिश कर रहा है मगर सीएम को हटाने की पटकथा अचानक नहीं लिखी गई। इसके पीछे पिछले कुछ महीनों से सीएम मनोहर लाल के खिलाफ सामने आ रहा एंटी इंकम्बेंसी (विरोध लहर) फेक्टर का डर एक बड़ी वजह था, जिसे सूबे में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस लगातार भुनाने की कोशिश कर रहा था मगर भाजपा ने लोकसभा चुनाव से पहले ही सीएम का चेहरा बदलकर इस एंटी इंकम्बेंसी फेक्टर को खत्म करने का प्रयास किया है।
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अब यह अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि मनोहर लाल को लोकसभा की टिकट देकर भाजपा केंद्रीय राजनीति में ले जाना चाहती है। ऐसा प्रयोग हाल ही में भाजपा मध्यप्रदेश में कर चुकी है, जहां पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को हटाने के बाद उन्हें अब विदिशा सीट से लोकसभा का टिकट देकर मैदान में उतारा गया है।
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दूसरी ओर, हरियाणा में वर्ष 2014 से गैर जाट की राजनीति कर आगे बढ़ रही भाजपा के लिए अन्य बिरादरियों को साधने की चुनौती भी बढ़ती जा रही थी। विपक्ष बार-बार भाजपा पर पिछड़ी जातियों की अनदेखी करने का आरोप मढ़ रहा है। हरियाणा में यदि पिछड़ी जातियों की स्थिति देखी जाए, तो इस बिरादरी को अनदेखा नहीं किया सकता।

सूबे में कुल 79 जातियां पिछड़े वर्ग के दायरे में आती हैं। इनमें 71 जातियां पिछड़ा वर्ग (बीसी)-ए और 8 जातियां पिछड़ा वर्ग (बीसी)-बी की श्रेणी में शामिल हैं। सैनी और बिश्नोई बिरादरी बीसी-बी श्रेणी का हिस्सा हैं। हरियाणा की कुल आबादी में पिछड़ा वर्ग जाति की हिस्सेदारी करीबन 21 प्रतिशत मानी जाती है।

लिहाजा सैनी बिरादरी से मुख्यमंत्री का नया चेहरा देकर भाजपा ने सूबे में पिछड़े वर्ग को साधने का प्रयास किया है जबकि सूबे में पंजाबी, बनिया और ब्राह्मण वोट बैंक पर भाजपा पहले से ही अपनी अच्छी पकड़ मानती है।

इसके अलावा भाजपा ने अपने इस चौंकाने वाले फैसले से हरियाणा में विपक्षियों के लिए भी एक चुनौती देने का काम भी किया है। हरियाणा में चुनाव के दौरान जाट मतदाता एक निर्णायक कारक माने जाते हैं। चूंकि भाजपा हरियाणा में गैर जाट की राजनीति के बूते अपनी सियासी रणनीति तय करती आई है। उस लिहाज से प्रदेश में इस वक्त भाजपा और जजपा (जननायक जनता पार्टी) की राह अलग-अलग हो जाने से भाजपा को ही अपना सियासी फायदा दिख रहा है।

देखा जाए तो किसान आंदोलन हो या जाट आरक्षण का मुद्दा या फिर हाल ही में पहलवानों का विवाद, इन सभी मसलों पर जाट बिरादरी व खापें हरियाणा सरकार से खुश नजर नहीं आ रही हैं।

दूसरा, हाल ही में भाजपा के हिसार से जाट सांसद बृजेंद्र सिंह ने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया है, उनके पिता पूर्व मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह की भी कांग्रेस में घर वापसी की अटकलें लगाई जा रही हैं। उधर, इनेलो (इंडियन नेशनल लोकदल) के सुप्रीमो व पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला भी इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनने की इच्छा जता चुके हैं। ऐसे में भाजपा से नाराज जाट मतदाताओं का कैंप सूबे में और मजबूत होता दिख रहा है।



इस स्थिति में जाट मतदाताओं के बिखराव और अधिक से अधिक गैर जाट मतदाताओं को साधने की रणनीति भाजपा को हरियाणा में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर फायदेमंद दिख रही है। इसी रणनीति के तहत भाजपा ने लोकसभा चुनाव से पहले ही पिछड़ी जाति का सीएम देकर गैर जाट बिरादरी को साधने का अपना सियासी दांव खेल दिया है।


उधर जजपा के भाजपा से अलग होने के बाद भाजपा से नाराज चल रहा एक बड़ा जाट वोट बैंक भी जजपा से फिर जुड़ सकता है, क्योंकि गठबंधन सरकार में डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला और उनके पिता पूर्व सांसद अजय चौटाला भी जाट राजनीति में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की तरह अपना बड़ा दखल रखते हैं।

जजपा के कुछ जाट मतदाता समर्थक वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने के बाद 10 सीटें जीतने के बावजूद प्रतिद्वंद्वी रही भाजपा से मिलकर ही गठबंधन सरकार बनाने से नाराज चल रहे थे। अब भाजपा से अलग होने के बाद जजपा भी अपने इन नाराज समर्थकों को फिर से एकजुट कर सकती है। इस स्थिति में बड़ी चुनौती कांग्रेस के समक्ष ही खड़ी दिख रही है, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की राजनीति का बड़ा केंद्र बिंदु जाट मतदाता ही है।

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