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Karnal News: लड़कियां और महिलाएं हरे वस्त्र पहनकर बढ़ाती थी पींगे
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पहले सावन माह में हरे रंग का काफी महत्व होता था, जिसमें लड़कियां और महिलाएं हरे रंग की चूड़ियां और कपड़े पहना करती थी। उन्हीं कपड़ों में झूलों पर पींगे बढ़ाती थीं। गांव के लोग मिलकर सावन के महीने को हर दिन उत्साह के साथ मनाया करते थे। उस समय हर घर के सामने बड़े-बड़े पेड़ होते थे जिनके नीचे अकसर शाम के समय आस-पड़ोस की महिलाएं एकत्रित होकर सावन के गीत गाया करती थी। सभी बहन-बेटियां पेड़ों पर झूला डालकर झूलती थी।
वहीं एक नियम हुआ करता था कि गांव के पुरुष वर्ग मिलकर कांवड़ लेने जाया करते थे हर घर का एक आदमी कांवड़ लाता था। उस समय घर की महिलाएं गांव में भगवान शिव की कथाएं और भजन करतीं। शिवरात्रि का इंतजार हर महिला को रहता था जिसमें महिलाएं व्रत रख कर भगवान शिव को मनाती थी। उस समय हर लड़की सावन के महीने के लिए काफी उत्साहित रहा करती थीं जिसमें वह हर सोमवार के व्रत और सोलह सोमवार के व्रत रखा करती थीं। उस समय का दौर सबसे अलग था जो आज देखने को नहीं मिलता। बच्चों में संस्कार खत्म होते जा रहे हैं, लोगों में सहनशीलता नहीं है और सबसे बड़ी बात कि एकल परिवार सबसे अधिक होने लगे हैं। आज बहुत कम परिवार रह गए है जो संयुक्त परिवार में रहते हैं।
आज समय बदल चुका है जिसमें युवा वर्ग काॅफी उत्साह के साथ कांवड़ लेने तो जाते हैं लेकिन उनमें भक्ति कम शोर-शराबा अधिक होता है। वहीं व्यस्त और आधुनिक संसाधनों से परिपूर्ण जिंदगी के कारण लोगों में अहंकार अधिक आने लगा है। पहले सभी पड़ोसी मिलकर हर त्योहार को उत्साह के साथ मनाते थे लेकिन आज एक पड़ोसी को दूसरे पड़ोसी के बारे में भनक तक नहीं होती। दाैर चाहे कोई भी आए लेकिन लोगों को अपने त्योहारों और रीति रिवाजों की जानकारी जरूर होनी चाहिए। उन्हें अपने बच्चों को हर त्योहार के मायने और उसके बारे में बताना चाहिए ताकि भविष्य की पीढ़ी अपनी परंपराओं को निभा सके।
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प्रस्तुति : सुनीता देवी, वसंत विहार, करनाल
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वहीं एक नियम हुआ करता था कि गांव के पुरुष वर्ग मिलकर कांवड़ लेने जाया करते थे हर घर का एक आदमी कांवड़ लाता था। उस समय घर की महिलाएं गांव में भगवान शिव की कथाएं और भजन करतीं। शिवरात्रि का इंतजार हर महिला को रहता था जिसमें महिलाएं व्रत रख कर भगवान शिव को मनाती थी। उस समय हर लड़की सावन के महीने के लिए काफी उत्साहित रहा करती थीं जिसमें वह हर सोमवार के व्रत और सोलह सोमवार के व्रत रखा करती थीं। उस समय का दौर सबसे अलग था जो आज देखने को नहीं मिलता। बच्चों में संस्कार खत्म होते जा रहे हैं, लोगों में सहनशीलता नहीं है और सबसे बड़ी बात कि एकल परिवार सबसे अधिक होने लगे हैं। आज बहुत कम परिवार रह गए है जो संयुक्त परिवार में रहते हैं।
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आज समय बदल चुका है जिसमें युवा वर्ग काॅफी उत्साह के साथ कांवड़ लेने तो जाते हैं लेकिन उनमें भक्ति कम शोर-शराबा अधिक होता है। वहीं व्यस्त और आधुनिक संसाधनों से परिपूर्ण जिंदगी के कारण लोगों में अहंकार अधिक आने लगा है। पहले सभी पड़ोसी मिलकर हर त्योहार को उत्साह के साथ मनाते थे लेकिन आज एक पड़ोसी को दूसरे पड़ोसी के बारे में भनक तक नहीं होती। दाैर चाहे कोई भी आए लेकिन लोगों को अपने त्योहारों और रीति रिवाजों की जानकारी जरूर होनी चाहिए। उन्हें अपने बच्चों को हर त्योहार के मायने और उसके बारे में बताना चाहिए ताकि भविष्य की पीढ़ी अपनी परंपराओं को निभा सके।
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प्रस्तुति : सुनीता देवी, वसंत विहार, करनाल