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Karnal News: दीवारों से दिलों तक, सांझी की परंपरा बरकरार

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 14 Oct 2026 02:35 AM IST
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From walls to hearts, the tradition of Sanjhi lives on.
संवाद न्यूज एजेंसी
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करनाल। नवरात्र आते ही कभी हरियाणा के घरों की दीवारें सांझी माता की कलाकृतियों से सज उठती थीं। फूल, मिट्टी और गोबर से तैयार होने वाली सांझी केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि महिलाओं के सामूहिक उत्सव और लोककला की पहचान भी रही है। बदलते समय के साथ इसे बनाने के तरीके बदले हैं, लेकिन बुजुर्ग महिलाओं के मन में इसके प्रति श्रद्धा आज भी कायम है। पहले महिलाएं कई दिन पहले से प्राकृतिक सामग्री जुटाने लगती थीं। फूलों की पंखुड़ियों और मिट्टी से सांझी को आकर्षक रूप दिया जाता था। अब कई घरों में गोबर से ही सांझी माता की अलग-अलग आकृतियां बनाई जा रही हैं।
पहले घर की बड़ी-बुजुर्ग महिलाएं बेटियों और छोटी बच्चियों को सांझी बनाना सिखाती थीं। दीवार पर आकृतियां उकेरने से लेकर उन्हें सजाने तक परिवार की महिलाएं साथ जुटती थीं। इस दौरान लोकगीत गाने और पारंपरिक रीति-रिवाज निभाने का भी विशेष महत्व था। आज सामूहिक भागीदारी भले कम हुई हो, लेकिन महिलाएं इस लोककला को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं।
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नई पीढ़ी को समझाएं महत्व
पहले नवरात्र में सांझी बनाने के लिए घर में उपलब्ध मिट्टी, गोबर और फूल ही पर्याप्त होते थे। सभी महिलाएं और लड़कियां मिलकर इसे सजाती थीं। आज भी नवरात्र आते ही पुराने दिनों की याद ताजा हो जाती है। परंपरा को पूरी तरह छोड़ने के बजाय नई पीढ़ी को इसका महत्व समझाना चाहिए। -राजबाला, गांव चिड़ाव
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गोबर से सिखा रहीं लोककला
सांझी बनाने के तरीके में बदलाव आया है, लेकिन श्रद्धा कम नहीं हुई। वह चाहती हैं कि घर की बच्चियां भी अपने हाथों से सांझी बनाना सीखें, ताकि उन्हें पुरानी परंपराओं और उनसे जुड़ी कला का महत्व समझ आए। -संतोष देवी, वीटा कॉलोनी

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संस्कृति की पहचान है सांझी
पहले नवरात्र में महिलाएं एक साथ बैठकर सांझी बनाती और फूलों से सजाती थीं। समय की कमी से कई घरों में यह परंपरा सीमित हो रही है। उनका कहना है कि सांझी बनती रहेगी तो बच्चों का जुड़ाव अपनी संस्कृति और पुरानी जीवनशैली से बना रहेगा। -निर्मला रानी, वीटा कॉलोनी
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