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वैवाहिक जिम्मेदारी के बोझ तले दब रहा बचपन

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 04 Aug 2022 02:18 AM IST
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Childhood buried under the burden of matrimonial responsibility
संवाद न्यूज एजेंसी
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करनाल। वैवाहिक जिम्मेदारी के बोझ तले बचपन दब रहा है, जिससे घरेलू हिंसा के मामले बढ़ते जा रहे हैं। जिसका मुख्य कारण बेटियों की कम उम्र में शादी होना है। जिस उम्र में बेटियों को पढ़-लिखकर अपना भविष्य संवारना चाहिए, उस उम्र में उनकी शादी करा दी जाती है, जबकि अधिकतर बेटियां इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए मानसिक रूप से तैयार ही नहीं होती हैं। इतनी कम उम्र में शादी के बाद वह घर में आपसी तालमेल नहीं बैठा पातीं, जिससे उन्हें गृह क्लेश व हिंसा का सामना करना पड़ता है। इस तरह के अधिकांश मामले वन स्टॉप सेंटर पहुंच रहे हैं। वन स्टॉप सेंटर में 2015 से जुलाई 2022 तक घरेलू हिंसा के 1307 मामले दर्ज हो चुके हैं।
12वीं के बाद करा दी शादी, खेल में मुकाम हासिल करने का था सपना
एक मामले में पीड़ित महिला ने सेंटर में दी शिकायत में बताया कि उसका पति आए दिन उसके साथ मारपीट करता है। उनकी पांच और डेढ़ साल की दो बेटियां भी हैं। जिसका उन पर काफी असर पड़ रहा है। उसके बाद वन स्टॉप सेंटर की काउंसलर ने पीड़ित महिला की काउंसलिंग की। पीड़िता ने बताया कि जब वह 12वीं कक्षा में पढ़ती थी तो खेलों में भाग लेती थी। उसका सपना खेल के जरिए जीवन में बड़ा मुकाम हासिल करने का था, लेकिन घरवालों ने 12वीं पास करने के एक साल बाद शादी करवा दी। ससुराल में पति उसका साथ देने के बजाय छोटी-छोटी बातों पर टोकता था। जिससे वह मानसिक रूप से काफी परेशान रहने लगी है। वहीं, पति ने काउंसलिंग के दौरान बताया कि जब उसकी शादी हुई पत्नी की उम्र 20 वर्ष थी। शादी के छह साल बीत चुके हैं, लेकिन उसके अंदर अब भी बचपना ही है। किसी भी बात पर वह अड़ जाती है। ससुराल में कैसे रहना है इसका उसे एहसास ही नहीं है।
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शादी से पहले मानसिक मजबूती जरूरी
सेंटर की प्रबंधक रीना ने बताया कि शादी से पहले लड़की की मानसिक मजबूती जरूरी है, क्योंकि बेटी को नए घर जाना पड़ता है। जिससे वहां के रहन-सहन, तौर-तरीके समझने पड़ते हैं। जितनी अपने घर पर छूट थी, उतनी ही छूट वहां नहीं मिल पाती। अगर बेटी मानसिक रूप से मजबूत होगी तो घरेलू हिंसा नहीं होगी। वहीं लड़के के परिवार के सदस्यों को भी समझना चाहिए कि घर पर नया सदस्य आया है तो उसे अपने तौर-तरीके या रीति रिवाज समझने में कुछ समय तो लगता ही है।
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