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Karnal News: माहौल में गूंजने लगे छठ मैया के गीत
Sat, 25 Oct 2025 01:44 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
Updated Sat, 25 Oct 2025 01:44 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। छठ पर्व की तैयारी जोरों पर है। शहर की गलियों और घरों में कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय... जैसे छठ पूजा के लोकप्रिय गीत गूंजने लगे हैं। पूर्वांचल समाज की महिलाओं में पर्व को लेकर जबरदस्त उत्साह दिखाई दे रहा है। प्रेमनगर से लेकर शिव कॉलोनी और न्यू रमेश नगर तक महिलाएं सामूहिक रूप से गीतों की धुनों में डूबी हुई हैं।
छठ पूजा के दौरान गाए जाने वाले इन गीतों में भावनाओं का अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। महिलाएं पारंपरिक सुर में मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए, ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय... जैसे गीत गा रही हैं।
प्रसाद बनाते समय सुनाई देती है गीतों की गूंज
प्रेम नगर से फूलमती देवी ने बताया कि छठी पर गीत गाने वाली महिलाओं ने बताया कि भक्ति और लोकधुनों से गूंजा माहौल सूर्य मंदिर और घरों के आंगन में प्रतिदिन महिलाएं सामूहिक रूप से गीत गाकर पूजा करती हैं। मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद बनाते समय भी गीतों की गूंज सुनाई देती है।
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मजबूत हो रही आस्था
न्यू रमेश नगर से रिंकू देवी का कहना है कि छठ के गीत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि वे पूर्वांचल की लोकसंस्कृति और स्त्री शक्ति का जीवंत स्वरूप भी हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आस्था की डोर को मजबूत बनाए रखते हैं।
गीत से करती हैं व्रत शुरुआत
रामनगर की पूजा कुमारी ने बताया कि छठी मैया का गीत गाने से मन को शांति मिलती है। हर साल हम ऊ जे केरवा जे फरेला खबद... गीत गाकर व्रत की शुरुआत करते हैं। यह गीत हमारे दिल में आस्था का संचार करता है।
लोक संस्कृति को रखते हैं जीवंत
रामनगर से सीता देवी ने बताया कि हम लोग कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय गीत गाते हैं, जो श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। इसमें घाट तक बहंगी लेकर जाने की परंपरा की झलक मिलती है। छठी मैया के नाम से गाए जाने वाले ये गीत हमारी संस्कृति को जीवंत रखते हैं।
सामूहिक रूप से गीत गाती हैं महिलाएं
शिव कॉलोनी की शशि देवी ने बताया कि ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय गीत गाते समय आंखें नम हो जाती हैं क्योंकि इसमें एक स्त्री का समर्पण और छठी मैया से प्रार्थना झलकती है। उन्होंने बताया कि व्रत के दौरान महिलाएं सामूहिक रूप से इन गीतों से वातावरण को भक्ति में डूबा देती हैं।
गीतों के बिना पर्व अधूरा
रीता देवी का कहना है कि गीतों के बिना छठ पर्व अधूरा है। जब हम गीत गाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे छठी मैया हमारे सामने खड़ी हैं। इन गीतों में मातृत्व, भक्ति और लोकसंस्कृति का अद्भुत मेल है। नई पीढ़ी को भी इन गीतों को सीखना चाहिए ताकि परंपरा कायम रहे।
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करनाल। छठ पर्व की तैयारी जोरों पर है। शहर की गलियों और घरों में कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय... जैसे छठ पूजा के लोकप्रिय गीत गूंजने लगे हैं। पूर्वांचल समाज की महिलाओं में पर्व को लेकर जबरदस्त उत्साह दिखाई दे रहा है। प्रेमनगर से लेकर शिव कॉलोनी और न्यू रमेश नगर तक महिलाएं सामूहिक रूप से गीतों की धुनों में डूबी हुई हैं।
छठ पूजा के दौरान गाए जाने वाले इन गीतों में भावनाओं का अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। महिलाएं पारंपरिक सुर में मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए, ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय... जैसे गीत गा रही हैं।
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प्रसाद बनाते समय सुनाई देती है गीतों की गूंज
प्रेम नगर से फूलमती देवी ने बताया कि छठी पर गीत गाने वाली महिलाओं ने बताया कि भक्ति और लोकधुनों से गूंजा माहौल सूर्य मंदिर और घरों के आंगन में प्रतिदिन महिलाएं सामूहिक रूप से गीत गाकर पूजा करती हैं। मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद बनाते समय भी गीतों की गूंज सुनाई देती है।
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मजबूत हो रही आस्था
न्यू रमेश नगर से रिंकू देवी का कहना है कि छठ के गीत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि वे पूर्वांचल की लोकसंस्कृति और स्त्री शक्ति का जीवंत स्वरूप भी हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आस्था की डोर को मजबूत बनाए रखते हैं।
गीत से करती हैं व्रत शुरुआत
रामनगर की पूजा कुमारी ने बताया कि छठी मैया का गीत गाने से मन को शांति मिलती है। हर साल हम ऊ जे केरवा जे फरेला खबद... गीत गाकर व्रत की शुरुआत करते हैं। यह गीत हमारे दिल में आस्था का संचार करता है।
लोक संस्कृति को रखते हैं जीवंत
रामनगर से सीता देवी ने बताया कि हम लोग कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय गीत गाते हैं, जो श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। इसमें घाट तक बहंगी लेकर जाने की परंपरा की झलक मिलती है। छठी मैया के नाम से गाए जाने वाले ये गीत हमारी संस्कृति को जीवंत रखते हैं।
सामूहिक रूप से गीत गाती हैं महिलाएं
शिव कॉलोनी की शशि देवी ने बताया कि ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय गीत गाते समय आंखें नम हो जाती हैं क्योंकि इसमें एक स्त्री का समर्पण और छठी मैया से प्रार्थना झलकती है। उन्होंने बताया कि व्रत के दौरान महिलाएं सामूहिक रूप से इन गीतों से वातावरण को भक्ति में डूबा देती हैं।
गीतों के बिना पर्व अधूरा
रीता देवी का कहना है कि गीतों के बिना छठ पर्व अधूरा है। जब हम गीत गाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे छठी मैया हमारे सामने खड़ी हैं। इन गीतों में मातृत्व, भक्ति और लोकसंस्कृति का अद्भुत मेल है। नई पीढ़ी को भी इन गीतों को सीखना चाहिए ताकि परंपरा कायम रहे।