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Karnal News: किताबों को दोस्त बना छुड़ा रहे मोबाइल फोन की लत
Sat, 07 Feb 2026 12:36 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
Updated Sat, 07 Feb 2026 12:36 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। जिले में कई अभिभावक अपने बच्चों की मोबाइल फोन की लत छुड़ाने के लिए जिला बाल कल्याण विभाग के पास लाने लगे हैं। हर माह ऐसे दो से चार मामले आते हैं। विभाग के केंद्र में सात दिनों में पांच चरणों की काउंसिलिग की जाती है। बच्चों में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया की लत को किताबों को पढ़ाकर छुड़वाया जा रहा है। बच्चे की रुचि के अनुसार अन्य गतिविधियां भी कराई जाती हैं।
जिला बाल कल्याण समिति की परामर्शदाता पूनम ने बताया कि बच्चों को किताबें और अखबार पढ़ाने पर जोर दिया जाता है। बच्चे की रुचि को जानकर उन्हें चित्रकला, संगीत, नृत्य जैसी गतिविधियों में लगाया जाता है। बच्चे मोबाइल की लत इतनी अधिक लगा चुके होते हैं कि उन्हें माता-पिता ही दुश्मन लगने लगते हैं। कई चरणों में काउंसिलिंग की जाती है। बच्चे तनाव, गुस्से और अकेलेपन से आत्मघाती विचारों तक पहुंच चुके होते हैं। न केवल पढ़ाई से दूरी बना लेते हैं बल्कि परिवार, समाज और वास्तविक दुनिया से भी कटते जाते हैं। जिला बाल कल्याण समिति काउंसिलिंग से उनकी मोबाइल की लत छुड़ाती है।
स्कूल के वातावरण पर भी देना चाहिए ध्यान
समिति के अध्यक्ष चंद्रप्रकाश का कहना है कि बच्चों के व्यवहार और मोबाइल की लत में सबसे बड़ी भूमिका माता-पिता, स्कूल में दोस्त और वातावरण निभाते हैं। माता-पिता कामकाजी होने से बच्चा स्वयं को अकेला पाकर मोबाइल में व्यस्त हो जाता है। स्कूल का वातावरण सबसे बड़ा कारण बनता है जिसमें दोस्तों के साथ मोबाइल को लेकर प्रतियोगिता रखना भी अपनी भूमिका निभाती है।
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- ये होती समस्याएं : ऑनलाइन गेमिंग, जीत-हार से जुड़ा तनाव और आक्रामकता, सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म पर शॉर्ट वीडियो देखने की आदत, लाइक्स और फॉलोअर्स का दबाव, माता-पिता का समय न दे पाना, मोबाइल को शांत रखने का साधन बनाना, अकेलापन और भावनात्मक कमी, दोस्ती में दूरी, घर में संवाद की कमी।
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ऐसे करते हैं काउंसिलिंग- पहला चरण : प्रारंभिक स्क्रीनिंग में माता-पिता व बच्चा दोनों की काउंसिलिंग। बच्चे के व्यवहार का आकलन, मोबाइल उपयोग का समय और प्रकार, मानसिक स्थिति की जांच।
- दूसरा चरण : काउंसलर से बातचीत में बच्चे को सुरक्षित माहौल देना, डर, गुस्सा और अकेलेपन पर खुलकर बात, भरोसे का रिश्ता बनाना।
- तीसरा चरण : काउंसिलिंग में माता-पिता को लत के संकेत समझाना। सख्ती नहीं, संवाद अपनाने की सलाह।
- चौथा चरण : थेरेपी और डिजिटल डिटॉक्स में मोबाइल से धीरे-धीरे दूरी, खेल, कला और समूह गतिविधियां।
- पांचवां चरण : फॉलो-अप में पहले लगातार सात सत्रों में काउंसलिंग करना, इसके बाद हर दस से पंद्रह दिन बाद फॉलोअप लेना
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ये हैं मुख्य थेरेपी-
- बिहेवियर थेरेपी : व्यवहार में बदलाव
- कॉग्निटिव थेरेपी : नकारात्मक सोच पर काम
- डिजिटल डिटॉक्स प्लान
- आर्ट और प्ले थेरेपी
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करनाल। जिले में कई अभिभावक अपने बच्चों की मोबाइल फोन की लत छुड़ाने के लिए जिला बाल कल्याण विभाग के पास लाने लगे हैं। हर माह ऐसे दो से चार मामले आते हैं। विभाग के केंद्र में सात दिनों में पांच चरणों की काउंसिलिग की जाती है। बच्चों में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया की लत को किताबों को पढ़ाकर छुड़वाया जा रहा है। बच्चे की रुचि के अनुसार अन्य गतिविधियां भी कराई जाती हैं।
जिला बाल कल्याण समिति की परामर्शदाता पूनम ने बताया कि बच्चों को किताबें और अखबार पढ़ाने पर जोर दिया जाता है। बच्चे की रुचि को जानकर उन्हें चित्रकला, संगीत, नृत्य जैसी गतिविधियों में लगाया जाता है। बच्चे मोबाइल की लत इतनी अधिक लगा चुके होते हैं कि उन्हें माता-पिता ही दुश्मन लगने लगते हैं। कई चरणों में काउंसिलिंग की जाती है। बच्चे तनाव, गुस्से और अकेलेपन से आत्मघाती विचारों तक पहुंच चुके होते हैं। न केवल पढ़ाई से दूरी बना लेते हैं बल्कि परिवार, समाज और वास्तविक दुनिया से भी कटते जाते हैं। जिला बाल कल्याण समिति काउंसिलिंग से उनकी मोबाइल की लत छुड़ाती है।
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स्कूल के वातावरण पर भी देना चाहिए ध्यान
समिति के अध्यक्ष चंद्रप्रकाश का कहना है कि बच्चों के व्यवहार और मोबाइल की लत में सबसे बड़ी भूमिका माता-पिता, स्कूल में दोस्त और वातावरण निभाते हैं। माता-पिता कामकाजी होने से बच्चा स्वयं को अकेला पाकर मोबाइल में व्यस्त हो जाता है। स्कूल का वातावरण सबसे बड़ा कारण बनता है जिसमें दोस्तों के साथ मोबाइल को लेकर प्रतियोगिता रखना भी अपनी भूमिका निभाती है।
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- ये होती समस्याएं : ऑनलाइन गेमिंग, जीत-हार से जुड़ा तनाव और आक्रामकता, सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म पर शॉर्ट वीडियो देखने की आदत, लाइक्स और फॉलोअर्स का दबाव, माता-पिता का समय न दे पाना, मोबाइल को शांत रखने का साधन बनाना, अकेलापन और भावनात्मक कमी, दोस्ती में दूरी, घर में संवाद की कमी।
ऐसे करते हैं काउंसिलिंग- पहला चरण : प्रारंभिक स्क्रीनिंग में माता-पिता व बच्चा दोनों की काउंसिलिंग। बच्चे के व्यवहार का आकलन, मोबाइल उपयोग का समय और प्रकार, मानसिक स्थिति की जांच।
- दूसरा चरण : काउंसलर से बातचीत में बच्चे को सुरक्षित माहौल देना, डर, गुस्सा और अकेलेपन पर खुलकर बात, भरोसे का रिश्ता बनाना।
- तीसरा चरण : काउंसिलिंग में माता-पिता को लत के संकेत समझाना। सख्ती नहीं, संवाद अपनाने की सलाह।
- चौथा चरण : थेरेपी और डिजिटल डिटॉक्स में मोबाइल से धीरे-धीरे दूरी, खेल, कला और समूह गतिविधियां।
- पांचवां चरण : फॉलो-अप में पहले लगातार सात सत्रों में काउंसलिंग करना, इसके बाद हर दस से पंद्रह दिन बाद फॉलोअप लेना
ये हैं मुख्य थेरेपी-
- बिहेवियर थेरेपी : व्यवहार में बदलाव
- कॉग्निटिव थेरेपी : नकारात्मक सोच पर काम
- डिजिटल डिटॉक्स प्लान
- आर्ट और प्ले थेरेपी