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सांसारिक विषयों से विरक्त होना ही भगवत कृपा : स्वामी शाश्वत
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श्रीकृष्ण मंदिर सेक्टर-14 में चल रही श्रीमद्भागवत कथा
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। श्रीकृष्ण मंदिर सेक्टर-14 में श्रीमद्भागवत में प्रवचन करते हुए श्री धाम गोदा विहार मंदिर वृंदावन के महंत स्वामी शाश्वत आचार्य ने कहा कि जीव ब्रह्म की ओर जा रहा है। ब्रह्म के निकट जाने से संसार के रंग फीके लगने लगते हैं और भगवत भक्ति का प्रेममयी रंग हम पर चढ़ने लगता है।
उन्होंने कहा कि सांसारिक विषयों से विरक्त होना ही भगवत कृपा की सुखानुभूति है। भगवान अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए व जीवों पर कृपा करने के लिए उन्हें अपनी सेवा प्रदान करने के लिए- भास्कर, गुरु व वैष्णव आदि के कंधों पर चढ़कर जिस रूप से अवतरित होते हैं, उसे ही भगवान का श्रीविग्रह कहते हैं। ठीक उसी प्रकार, जैसा कि प्राचीन समय में राजा को जब कहीं जाना होता था तो वह पालकी में बैठकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता था। देखने में तो लगता हैं कि पालकी में चार व्यक्ति कर्ता हैं तथा पालकी के अंदर जो बैठा हैं वह वास्तविक कर्ता है अर्थात अधीन हैं परंतु वास्तविकता यह हैं कि पालकी में बैठा व्यक्ति कर्ता हैं बाकी सब उसके अधीन हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। श्रीकृष्ण मंदिर सेक्टर-14 में श्रीमद्भागवत में प्रवचन करते हुए श्री धाम गोदा विहार मंदिर वृंदावन के महंत स्वामी शाश्वत आचार्य ने कहा कि जीव ब्रह्म की ओर जा रहा है। ब्रह्म के निकट जाने से संसार के रंग फीके लगने लगते हैं और भगवत भक्ति का प्रेममयी रंग हम पर चढ़ने लगता है।
उन्होंने कहा कि सांसारिक विषयों से विरक्त होना ही भगवत कृपा की सुखानुभूति है। भगवान अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए व जीवों पर कृपा करने के लिए उन्हें अपनी सेवा प्रदान करने के लिए- भास्कर, गुरु व वैष्णव आदि के कंधों पर चढ़कर जिस रूप से अवतरित होते हैं, उसे ही भगवान का श्रीविग्रह कहते हैं। ठीक उसी प्रकार, जैसा कि प्राचीन समय में राजा को जब कहीं जाना होता था तो वह पालकी में बैठकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता था। देखने में तो लगता हैं कि पालकी में चार व्यक्ति कर्ता हैं तथा पालकी के अंदर जो बैठा हैं वह वास्तविक कर्ता है अर्थात अधीन हैं परंतु वास्तविकता यह हैं कि पालकी में बैठा व्यक्ति कर्ता हैं बाकी सब उसके अधीन हैं।
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