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दुर्योधन का वध करने के बाद पांडवों ने पाराशर तीर्थ में की थी शिव पूजा
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श्री पाराशर तीर्थ के मंदिर।
करनाल। बात महाभारत काल की है। जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध चल रहा था, इसी समय कुरुक्षेत्र से बनी सुरंग के जरिए दुर्योधन करनाल के गांव काछवा स्थित 32 एकड़ भूमि में फैली महर्षि पाराशर की तपस्या स्थली में मौजूद सरोवर में आकर छिप गया था लेकिन यहां भी भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर पांडव पहुंच गए थे और यहीं पर दुर्योधन का वध किया गया था। यहां पर भूगर्भ से एक शिवलिंग की पूजा पांडवों ने भी की थी। जो आज भी लोगों की आस्था का केंद्र है। इससे कई मान्यताएं भी जुड़ी हैं।
कई प्राचीन अवशेष भी यहां तीर्थ की प्राचीनता को दर्शाते हैं। अब यहां शिव के तीन आकर्षक मंदिर हैं, बड़ा सरोवर हैं, जिसमें स्नानागार बने हैं। 750 गाय व नंदियों वाली गोशाला है। तीन साल पहले एक लक्ष्मी नारायण का मंदिर भी बनवाया गया है। इसके सुंदरीकरण का कार्य श्रीमहंत बाबा प्रीतम सिंह गिरि की देखरेख में चल रहा है। मंदिर के मुख्य श्री महंत बाबा भल्ले गिरि महाराज हैं। आंवला एकादशी पर यहां बड़ा मेला लगता है।
कौन थे ऋषि पाराशर
ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी के पौत्र, इनके पिता का नाम शक्ति मुनि, माता का नाम अदृश्यंती था। बताया जाता है कि उन्होंने 12 वर्षों तक माता के गर्भ में ही रहकर वेदाभ्यास किया था। यह माता के पेट से वेद रचनाएं बोलते हुए बाहर आए थे। इसलिए इनका नाम पाराशर रखा गया। यह छब्बीसवें द्वापर व्यास थे। उनका विवाह सत्यवती के साथ हुआ था। उन्होंने विष्णु पुराण, वृहद पाराशर स्मृति आदि की रचना की। पाराशर व सत्यवती के पुत्र का नाम व्यास था। ये 28वें द्वापर व्यास थे, इन्होंने महाभारत आदि की रचना की।
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तीर्थ करीब पांच हजार साल पुराना है। 44 कोस की परिधि में जब भी किसी की मृत्यु होती है तो उसकी पत्नी अन्य परिजनों के साथ तीर्थ पर आती है, सरोवर में स्नान करने के बाद नए वस्त्र धारण करती हैं। मृतक के फूल भी इसी सरोवर में अर्पित किए जाते हैं। तीर्थ का सुंदरीकरण का कार्य चल रहा है। तीर्थ के पास 365 एकड़ जमीन और भी है, जिस पर लोगों ने कब्जा कर लिया है, मामला न्यायालय में विचाराधीन है।
- बाबा प्रीतम गिरि, महंत
मान्यता है कि सरोबर में स्नान करने से किसी भी व्यक्ति को चर्म रोगों से छुटकारा मिल जाता है। यही कारण है कि हर दिन दूर दराज से बड़ी संख्या में लोग स्नान करने आते हैं। महिला व पुरुषों के स्नान के लिए अलग-अलग स्नान घर बनाए गए हैं, जो सीधे सरोवर में खुलते हैं। हर अमावस के लिए यहां लोग साधु संतों की समाधियों पर खीर चढ़ाने आते हैं।
- गोपाल गोस्वामी, संचालक
यह प्राचीन तीर्थ है, देश भर में मान्यता है। महाभारत काल से सीधे जुड़ा है, दुर्योधन के वध, पांडवों द्वारा शिवपूजा से जुड़ा है। यहां जो सुरंग है, वह सीधे कुरुक्षेत्र तक जाती है। इसमें कोई अंदर न जाए, इसलिए सुरंग के द्वार पर एक द्वार बनवाकर उसे बारिश के दिनों में ढक दिया जाता है।
- बाबा भल्ले गिरि, मुख्य श्रीमहंत
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कई प्राचीन अवशेष भी यहां तीर्थ की प्राचीनता को दर्शाते हैं। अब यहां शिव के तीन आकर्षक मंदिर हैं, बड़ा सरोवर हैं, जिसमें स्नानागार बने हैं। 750 गाय व नंदियों वाली गोशाला है। तीन साल पहले एक लक्ष्मी नारायण का मंदिर भी बनवाया गया है। इसके सुंदरीकरण का कार्य श्रीमहंत बाबा प्रीतम सिंह गिरि की देखरेख में चल रहा है। मंदिर के मुख्य श्री महंत बाबा भल्ले गिरि महाराज हैं। आंवला एकादशी पर यहां बड़ा मेला लगता है।
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कौन थे ऋषि पाराशर
ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी के पौत्र, इनके पिता का नाम शक्ति मुनि, माता का नाम अदृश्यंती था। बताया जाता है कि उन्होंने 12 वर्षों तक माता के गर्भ में ही रहकर वेदाभ्यास किया था। यह माता के पेट से वेद रचनाएं बोलते हुए बाहर आए थे। इसलिए इनका नाम पाराशर रखा गया। यह छब्बीसवें द्वापर व्यास थे। उनका विवाह सत्यवती के साथ हुआ था। उन्होंने विष्णु पुराण, वृहद पाराशर स्मृति आदि की रचना की। पाराशर व सत्यवती के पुत्र का नाम व्यास था। ये 28वें द्वापर व्यास थे, इन्होंने महाभारत आदि की रचना की।
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तीर्थ करीब पांच हजार साल पुराना है। 44 कोस की परिधि में जब भी किसी की मृत्यु होती है तो उसकी पत्नी अन्य परिजनों के साथ तीर्थ पर आती है, सरोवर में स्नान करने के बाद नए वस्त्र धारण करती हैं। मृतक के फूल भी इसी सरोवर में अर्पित किए जाते हैं। तीर्थ का सुंदरीकरण का कार्य चल रहा है। तीर्थ के पास 365 एकड़ जमीन और भी है, जिस पर लोगों ने कब्जा कर लिया है, मामला न्यायालय में विचाराधीन है।
- बाबा प्रीतम गिरि, महंत
मान्यता है कि सरोबर में स्नान करने से किसी भी व्यक्ति को चर्म रोगों से छुटकारा मिल जाता है। यही कारण है कि हर दिन दूर दराज से बड़ी संख्या में लोग स्नान करने आते हैं। महिला व पुरुषों के स्नान के लिए अलग-अलग स्नान घर बनाए गए हैं, जो सीधे सरोवर में खुलते हैं। हर अमावस के लिए यहां लोग साधु संतों की समाधियों पर खीर चढ़ाने आते हैं।
- गोपाल गोस्वामी, संचालक
यह प्राचीन तीर्थ है, देश भर में मान्यता है। महाभारत काल से सीधे जुड़ा है, दुर्योधन के वध, पांडवों द्वारा शिवपूजा से जुड़ा है। यहां जो सुरंग है, वह सीधे कुरुक्षेत्र तक जाती है। इसमें कोई अंदर न जाए, इसलिए सुरंग के द्वार पर एक द्वार बनवाकर उसे बारिश के दिनों में ढक दिया जाता है।
- बाबा भल्ले गिरि, मुख्य श्रीमहंत