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650 करोड़ का मेडिकल भवन देखना है तो करनाल आईये, इलाच के लिए रेफर हो जाइये
Updated Wed, 03 Jan 2018 10:25 PM IST
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650 करोड़ का मेडिकल भवन देखना है तो करनाल आईये, इलाज के लिए रेफर हो जाइये
सोमदत्त शर्मा
करनाल। इलाज के लिए नहीं, हां अगर 650 करोड़ रुपये का शानदार मेडिकल भवन देखना है तो जरूर कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कालेज चले आईये। गंभीर बीमारियों के इलाज के नाम पर यहां पर रेफर नाम का मरहम लगाया जाता है। नवजात बच्चा हो, हार्ट अटैक आया हो, सिर में चोट हो या फिर किसी को वेंटीलेटर की जरूरत तो यहां के डाक्टर बिना चेक की ही उसे रेफर लिख देते हैं। इसके भी ऐसी कई गंभीर बीमारियां हैं, जिनका आज तक कालेज में न तो कोई डाक्टर है और न ही कोई उपकरण और मशीन। मेडिकल कालेज के प्रबंधन की लापरवाही और ढुलमुल रवैये का कारण रोजाना न कोई न कोई मरीज दम तोड़ रहा है, बावजूद इसके कालेज में न डाक्टर आ रहे हैं और न ही उपकरण आ रहे हैं। खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। किसी डाक्टर व कर्मचारी की लापरवाही से किसी की मौत हो जाए तो भी कालेज के डायरेक्टर पर इस बात का असर नहीं पड़ता, जांच तो दूर की बात है संबंधित डाक्टर से पूछताछ नहीं की जाती है। ऐसे में अंदाजा लगाना कठिन नहीं होगा कि यहां पर किस प्रकार से लोगों का इलाज हो सकता है।
बता दें कि कल्पना चावला मेडिकल कालेज का शिलान्यास पत्थर पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने 18 नवंबर, 2012 में लगाया था। इसे करीब 25 माह में बनना था, लेकिन कालेज आखिरकार पूरे चार साल बाद बनकर तैयार हो गया है। करीब 50 एकड़ में बने कालेज के निर्माण पर करीब 650 करोड़ रुपये खर्च आया है। गत 13 अप्रैल, 2017 को सीएम मनोहर लाल ने नये भवन का उद्घाटन किया। शिफ्टिंग के नौ माह बाद भी कालेज प्रबंधन मेडिकल कालेज में व्यवस्था बनाने में पूरी तरह से फेल रहा है। डायरेक्टर के ढुलमुल रवैये के कारण जो काम 9 माह पहले शुरू होने थे, वो आज तक कागजों में ही चक्कर लगा रहे हैं। डाक्टरों, सुविधाओं व उपकरणों व मशीनों के नाम पर यहां पर सिविल अस्पताल जैसे भी प्रबंध नहीं है। करीब 650 करोड़ रुपये के भवन को देखकर मरीज यहां इलाज के लिए आते हैं, लेकिन अंदर की व्यवस्था उन्हें और बीमार कर देती है। मरीज आता है, पर्ची बनते ही उसे रेफर करके उसका इलाज शुरू और खत्म कर दिया जाता है। ट्रामा सेंटर में न तो अल्ट्रसाउंड है, न सीटी स्कैन है और न ही एमआरआई मशीन है। इसके अलावा ही कोई न्यूरो सर्जन है। कालेज में डाक्टरों की भी भारी कमी है, कालेज के माहौल को देखते हुए यहां पर नये डाक्टर आने से भी कन्नी काट रहे हैं, जो आ गए वे वापस जाने की तैयारी में हैं। ऐसे में गंभीर मरीजों को केवल रेफल की दवाई लेकर यहां से चलता कर दिया जाता है। अनुमान है कि एमरजेंसी में रोजाना 100 के करीब मरीज आते हैं, इनमें 10 से 15 मरीजों को रेफर किया जाता है।
बाक्सब तक ये होना चाहिए
-कालेज में अब तक वेंटीलेटर की सुविधा होनी चाहिए थी।-एमआरआई व सीटी स्कैन में नहीं है, जो होनी चाहिए।-कालेज में स्पेशल्सिट डाक्टरों की कमी है, पद भरे जाएं।
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एक रेडियोलोजिस्ट दे चुके इस्तीफा, दूसरे ने थमाया नोटिस, कैसे होंगे टेस्ट
मेडिकल कालेज के कुव्यवस्था से तंग आकर एक रेडियोलाजिस्ट नौकरी से इस्तीफा दे चुके हैं, जबकि दूसरे ने नोटिस दे दिया है। ऐसें में आज के समय में मेडिकल कालेज के पास न सीटी स्कैन मशीन है और न ही एमआरआई। सिविल अस्पातल की डा. सविता सिविल अस्पताल के भवन में जरूर अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन करती हैं। कालेज में दाखिल मरीजों के भी टेस्ट यहीं कराए जाते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि ऐसी व्यवस्था कितने दिन तक चल सकती है। गौरतलब है कि सिविल अस्पताल में अल्ट्रासाउंड के लिए अलसुबह ही लाइनें लग जाती हैं और इसको लेकर कई बार गर्भवति महिलाएं सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर चुकी हैं और जाम तक लगा चुकी हैं।
मानसिक रोगी हैं तो कालेज मत आना, डाक्टर छुटी पर हैं (फोटो-6आर)
एक साइको लैफ्टिनेंट ने पलपल में कुछ ही घंटों में छह लोगों को मौत के घाट उतार दिया। करनाल के हालात की बात करें तो करनाल में भी सड़कों पर ऐसे व्यक्ति घूमते रहे हैं, जो मानसिक रूप से विकृत हैं और किसी भी वारदात को अंजाम दे सकते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि इतने बड़े मेडिकल कालेज में एक ही मनोचिकित्सक डा. सविता चहल हैं, जो अब सर्दी की छुट्टियों पर चली गई हैं। इसके बाद से प्रबंधन इसके स्थान पर किसी डाक्टर को यहां पर तैनात नहीं कर सका है। वार्ड बंद पड़ा है, ओपीडी में केवल काउंसर बैठते हैं, ऐसे में दवा कौन लिखे। गौरतलब है कि भारी तनाव के चलते मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन मेडिकल कालेज में मनो रोगियों को चेक करने तक की व्यवस्था नहीं है, इलाज तो दूर की बात है। हालांकि, मेडिकल कालेज के कालेज के डायरेक्टर डा. सुरेंद्र कशयप का दावा है कि एक जूनियर रेजिडेंट डाक्टर मरीजों को चेक कर रहे हैं।
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सोमदत्त शर्मा
करनाल। इलाज के लिए नहीं, हां अगर 650 करोड़ रुपये का शानदार मेडिकल भवन देखना है तो जरूर कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कालेज चले आईये। गंभीर बीमारियों के इलाज के नाम पर यहां पर रेफर नाम का मरहम लगाया जाता है। नवजात बच्चा हो, हार्ट अटैक आया हो, सिर में चोट हो या फिर किसी को वेंटीलेटर की जरूरत तो यहां के डाक्टर बिना चेक की ही उसे रेफर लिख देते हैं। इसके भी ऐसी कई गंभीर बीमारियां हैं, जिनका आज तक कालेज में न तो कोई डाक्टर है और न ही कोई उपकरण और मशीन। मेडिकल कालेज के प्रबंधन की लापरवाही और ढुलमुल रवैये का कारण रोजाना न कोई न कोई मरीज दम तोड़ रहा है, बावजूद इसके कालेज में न डाक्टर आ रहे हैं और न ही उपकरण आ रहे हैं। खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। किसी डाक्टर व कर्मचारी की लापरवाही से किसी की मौत हो जाए तो भी कालेज के डायरेक्टर पर इस बात का असर नहीं पड़ता, जांच तो दूर की बात है संबंधित डाक्टर से पूछताछ नहीं की जाती है। ऐसे में अंदाजा लगाना कठिन नहीं होगा कि यहां पर किस प्रकार से लोगों का इलाज हो सकता है।
बता दें कि कल्पना चावला मेडिकल कालेज का शिलान्यास पत्थर पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने 18 नवंबर, 2012 में लगाया था। इसे करीब 25 माह में बनना था, लेकिन कालेज आखिरकार पूरे चार साल बाद बनकर तैयार हो गया है। करीब 50 एकड़ में बने कालेज के निर्माण पर करीब 650 करोड़ रुपये खर्च आया है। गत 13 अप्रैल, 2017 को सीएम मनोहर लाल ने नये भवन का उद्घाटन किया। शिफ्टिंग के नौ माह बाद भी कालेज प्रबंधन मेडिकल कालेज में व्यवस्था बनाने में पूरी तरह से फेल रहा है। डायरेक्टर के ढुलमुल रवैये के कारण जो काम 9 माह पहले शुरू होने थे, वो आज तक कागजों में ही चक्कर लगा रहे हैं। डाक्टरों, सुविधाओं व उपकरणों व मशीनों के नाम पर यहां पर सिविल अस्पताल जैसे भी प्रबंध नहीं है। करीब 650 करोड़ रुपये के भवन को देखकर मरीज यहां इलाज के लिए आते हैं, लेकिन अंदर की व्यवस्था उन्हें और बीमार कर देती है। मरीज आता है, पर्ची बनते ही उसे रेफर करके उसका इलाज शुरू और खत्म कर दिया जाता है। ट्रामा सेंटर में न तो अल्ट्रसाउंड है, न सीटी स्कैन है और न ही एमआरआई मशीन है। इसके अलावा ही कोई न्यूरो सर्जन है। कालेज में डाक्टरों की भी भारी कमी है, कालेज के माहौल को देखते हुए यहां पर नये डाक्टर आने से भी कन्नी काट रहे हैं, जो आ गए वे वापस जाने की तैयारी में हैं। ऐसे में गंभीर मरीजों को केवल रेफल की दवाई लेकर यहां से चलता कर दिया जाता है। अनुमान है कि एमरजेंसी में रोजाना 100 के करीब मरीज आते हैं, इनमें 10 से 15 मरीजों को रेफर किया जाता है।
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बाक्सब तक ये होना चाहिए
-कालेज में अब तक वेंटीलेटर की सुविधा होनी चाहिए थी।-एमआरआई व सीटी स्कैन में नहीं है, जो होनी चाहिए।-कालेज में स्पेशल्सिट डाक्टरों की कमी है, पद भरे जाएं।
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एक रेडियोलोजिस्ट दे चुके इस्तीफा, दूसरे ने थमाया नोटिस, कैसे होंगे टेस्ट
मेडिकल कालेज के कुव्यवस्था से तंग आकर एक रेडियोलाजिस्ट नौकरी से इस्तीफा दे चुके हैं, जबकि दूसरे ने नोटिस दे दिया है। ऐसें में आज के समय में मेडिकल कालेज के पास न सीटी स्कैन मशीन है और न ही एमआरआई। सिविल अस्पातल की डा. सविता सिविल अस्पताल के भवन में जरूर अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन करती हैं। कालेज में दाखिल मरीजों के भी टेस्ट यहीं कराए जाते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि ऐसी व्यवस्था कितने दिन तक चल सकती है। गौरतलब है कि सिविल अस्पताल में अल्ट्रासाउंड के लिए अलसुबह ही लाइनें लग जाती हैं और इसको लेकर कई बार गर्भवति महिलाएं सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर चुकी हैं और जाम तक लगा चुकी हैं।
मानसिक रोगी हैं तो कालेज मत आना, डाक्टर छुटी पर हैं (फोटो-6आर)
एक साइको लैफ्टिनेंट ने पलपल में कुछ ही घंटों में छह लोगों को मौत के घाट उतार दिया। करनाल के हालात की बात करें तो करनाल में भी सड़कों पर ऐसे व्यक्ति घूमते रहे हैं, जो मानसिक रूप से विकृत हैं और किसी भी वारदात को अंजाम दे सकते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि इतने बड़े मेडिकल कालेज में एक ही मनोचिकित्सक डा. सविता चहल हैं, जो अब सर्दी की छुट्टियों पर चली गई हैं। इसके बाद से प्रबंधन इसके स्थान पर किसी डाक्टर को यहां पर तैनात नहीं कर सका है। वार्ड बंद पड़ा है, ओपीडी में केवल काउंसर बैठते हैं, ऐसे में दवा कौन लिखे। गौरतलब है कि भारी तनाव के चलते मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन मेडिकल कालेज में मनो रोगियों को चेक करने तक की व्यवस्था नहीं है, इलाज तो दूर की बात है। हालांकि, मेडिकल कालेज के कालेज के डायरेक्टर डा. सुरेंद्र कशयप का दावा है कि एक जूनियर रेजिडेंट डाक्टर मरीजों को चेक कर रहे हैं।