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Kaithal News: बजरंगबली के किरदार ने बदली जेपी की जिंदगी
Fri, 03 Apr 2026 01:44 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Fri, 03 Apr 2026 01:44 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। शहर के तलाई बाजार निवासी 60 वर्षीय जयप्रकाश ने रामलीला मंचन में निभाए गए हनुमान के किरदार से न सिर्फ पहचान बनाई, बल्कि इसे अपनी आस्था और जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। करीब 25 वर्षों तक लगातार हनुमान की भूमिका निभाने वाले जयप्रकाश आज भी लोगों की स्मृतियों में ‘जीवंत हनुमान’ के रूप में बसे हुए हैं।
जयप्रकाश की यह यात्रा केवल अभिनय तक सीमित नहीं रही बल्कि यह उनकी गहरी धार्मिक आस्था और समर्पण की कहानी भी है। वर्ष 1992 से 2017 तक उन्होंने हर साल रामलीला में हनुमान का ही किरदार निभाया। खास बात यह रही कि उन्होंने कभी किसी अन्य भूमिका को स्वीकार नहीं किया। उनके लिए यह मंचन एक कला नहीं बल्कि भक्ति का माध्यम था। वे तन मन धन से हनुमान भगवान के प्रति समर्पित हैं और निरंतर उनके नाम का जाप करते रहते हैं। इससे उनका मन को शांति की अनुभूति होती है।
वे श्री 11 रुद्री मंदिर से जुड़े श्री गणेश ड्रामेटिक क्लब के सक्रिय सदस्य रहे और निर्देशक धर्मवीर सतीजा के निर्देशन में उन्होंने हनुमान के चरित्र को जीवंत किया। उनकी संवाद अदायगी, भाव-भंगिमा और ऊर्जा इतनी प्रभावशाली होती थी कि दर्शक उन्हें देखकर भावविभोर हो जाते थे। जब भी जयप्रकाश मंच पर आते, पूरा वातावरण ‘जय श्री राम’ और ‘बजरंगबली की जय’ के जयकारों से गूंज उठता था।
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जयप्रकाश बताते हैं कि हनुमान का किरदार निभाने के बाद उनके जीवन में कई सकारात्मक बदलाव आए। वे इसे भगवान की कृपा मानते हैं। उनका कपड़ों का व्यवसाय भी समय के साथ आगे बढ़ा और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई। उनका मानना है कि सच्चे मन से की गई भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।
कैथल में दशहरे से पहले चंदाना गेट पर होने वाली रामलीला में जयप्रकाश का हनुमान रूप विशेष आकर्षण का केंद्र होता था। दूर-दूर से लोग उनके अभिनय को देखने आते थे। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर वर्ग के लोग उनके अभिनय से प्रभावित होते थे।
हालांकि वर्ष 2017 में स्वास्थ्य कारणों के चलते उन्होंने मंच से दूरी बना ली, लेकिन उनकी पहचान और लोकप्रियता आज भी बरकरार है। लोग आज भी उन्हें सम्मानपूर्वक याद करते हैं और उनके योगदान को सराहते हैं।
जयप्रकाश की कहानी यह संदेश देती है कि जब कला और आस्था का संगम होता है, तो वह व्यक्ति को एक अलग पहचान दिलाता है। उन्होंने अपने समर्पण से यह साबित किया कि मंच केवल अभिनय का माध्यम नहीं बल्कि भक्ति का भी सशक्त जरिया हो सकता है।
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कैथल। शहर के तलाई बाजार निवासी 60 वर्षीय जयप्रकाश ने रामलीला मंचन में निभाए गए हनुमान के किरदार से न सिर्फ पहचान बनाई, बल्कि इसे अपनी आस्था और जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। करीब 25 वर्षों तक लगातार हनुमान की भूमिका निभाने वाले जयप्रकाश आज भी लोगों की स्मृतियों में ‘जीवंत हनुमान’ के रूप में बसे हुए हैं।
जयप्रकाश की यह यात्रा केवल अभिनय तक सीमित नहीं रही बल्कि यह उनकी गहरी धार्मिक आस्था और समर्पण की कहानी भी है। वर्ष 1992 से 2017 तक उन्होंने हर साल रामलीला में हनुमान का ही किरदार निभाया। खास बात यह रही कि उन्होंने कभी किसी अन्य भूमिका को स्वीकार नहीं किया। उनके लिए यह मंचन एक कला नहीं बल्कि भक्ति का माध्यम था। वे तन मन धन से हनुमान भगवान के प्रति समर्पित हैं और निरंतर उनके नाम का जाप करते रहते हैं। इससे उनका मन को शांति की अनुभूति होती है।
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वे श्री 11 रुद्री मंदिर से जुड़े श्री गणेश ड्रामेटिक क्लब के सक्रिय सदस्य रहे और निर्देशक धर्मवीर सतीजा के निर्देशन में उन्होंने हनुमान के चरित्र को जीवंत किया। उनकी संवाद अदायगी, भाव-भंगिमा और ऊर्जा इतनी प्रभावशाली होती थी कि दर्शक उन्हें देखकर भावविभोर हो जाते थे। जब भी जयप्रकाश मंच पर आते, पूरा वातावरण ‘जय श्री राम’ और ‘बजरंगबली की जय’ के जयकारों से गूंज उठता था।
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जयप्रकाश बताते हैं कि हनुमान का किरदार निभाने के बाद उनके जीवन में कई सकारात्मक बदलाव आए। वे इसे भगवान की कृपा मानते हैं। उनका कपड़ों का व्यवसाय भी समय के साथ आगे बढ़ा और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई। उनका मानना है कि सच्चे मन से की गई भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।
कैथल में दशहरे से पहले चंदाना गेट पर होने वाली रामलीला में जयप्रकाश का हनुमान रूप विशेष आकर्षण का केंद्र होता था। दूर-दूर से लोग उनके अभिनय को देखने आते थे। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर वर्ग के लोग उनके अभिनय से प्रभावित होते थे।
हालांकि वर्ष 2017 में स्वास्थ्य कारणों के चलते उन्होंने मंच से दूरी बना ली, लेकिन उनकी पहचान और लोकप्रियता आज भी बरकरार है। लोग आज भी उन्हें सम्मानपूर्वक याद करते हैं और उनके योगदान को सराहते हैं।
जयप्रकाश की कहानी यह संदेश देती है कि जब कला और आस्था का संगम होता है, तो वह व्यक्ति को एक अलग पहचान दिलाता है। उन्होंने अपने समर्पण से यह साबित किया कि मंच केवल अभिनय का माध्यम नहीं बल्कि भक्ति का भी सशक्त जरिया हो सकता है।