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एक्ट में की गई है दलितों की अनदेखी
ब्यूरो/अमर उजाला, कैथल
Updated Tue, 05 Jul 2016 12:06 AM IST
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अनुसूचित जाति
- फोटो : ब्यूरो
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कैथल। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी एजूकेशन इंस्टीट्यूट एक्ट 2004 पर सवाल उठाए हैं। एक्ट में दलितों की अनदेखी पर अध्ययन करते हुए आयोग ने सदस्य ईश्वर सिंह को रिपोर्ट तैयार करने और सरकार से दलितों को उनका हक दिलवाए जाने की मांग करने के लिए अधिकृत किया है। आयोग के सदस्य ईश्वर सिंह ने यह जानकारी दी।
लघु सचिवालय में लोगों की समस्याएं सुनने आए आयोग के सदस्य सिंह ने कहा कि सरकार द्वारा नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी एजूकेशन इंस्टीट्यूट एक्ट 2004 पारित किया गया था। इसके बाद वर्ष 2006 व 2010 में इसमें संशोधन किए गए। भाषा व धर्म के नाम पर 6 प्रकार के लोगों को इसमें शामिल किया गया है। जिसमें जैन, बौद्ध, सिख, मुस्लिम व पारसी समुदाय के लोगों को शामिल किया गया। जो अपनी जरूरत के अनुसार विश्वविद्यालय, कॉलेज या फिर शैक्षणिक संस्थान खोल सकते हैं। वे किसी भी विश्वविद्यालय से इसकी संबद्धता ले सकते हैं।
यदि मेरिट से इन संस्थानों में सीटें ना भरें तो आयोग इन 6 श्रेणियों में से उम्मीदवार बच्चों को दाखिला दे सकते हैं। इस एक्ट के पैराग्राफ 30 में पता चला कि दलितों को इससे इसीलिए वंचित किया गया कि वे हिंदू हैं। सिंह ने कहा कि जब 30 प्रतिशत होकर मुसलमानों को इसमें शामिल किया जा सकता है तो पूरे देश में वंचित तबके में शामिल 20 प्रतिशत दलितों को इसका लाभ क्यों नहीं दिया गया।
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दाखिलों सहित अन्य विवादों के कारण देश में 9 बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं। इसलिए आयोग की सरकार से मांग है कि इस एक्ट में संशोधन कर दलितों को शामिल किया जाए। या फिर दलितों के लिए इसी की तर्ज पर नया एक्ट पारित कर उनकी शिक्षा के रास्ते खोले जाएं।
ईश्वर सिंह ने बताया कि इसके लिए अनुसूचित जाति आयोग के सभी सदस्यों की बैठक में उन्हें विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है, जिसपर अधिकतर काम पूरा हो गया है। शीघ्र ही इस संबंध में सरकार को रिपोर्ट तैयार कर इन मांगों को पूरा करने की बात उठाई जाएगी।
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लघु सचिवालय में लोगों की समस्याएं सुनने आए आयोग के सदस्य सिंह ने कहा कि सरकार द्वारा नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी एजूकेशन इंस्टीट्यूट एक्ट 2004 पारित किया गया था। इसके बाद वर्ष 2006 व 2010 में इसमें संशोधन किए गए। भाषा व धर्म के नाम पर 6 प्रकार के लोगों को इसमें शामिल किया गया है। जिसमें जैन, बौद्ध, सिख, मुस्लिम व पारसी समुदाय के लोगों को शामिल किया गया। जो अपनी जरूरत के अनुसार विश्वविद्यालय, कॉलेज या फिर शैक्षणिक संस्थान खोल सकते हैं। वे किसी भी विश्वविद्यालय से इसकी संबद्धता ले सकते हैं।
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यदि मेरिट से इन संस्थानों में सीटें ना भरें तो आयोग इन 6 श्रेणियों में से उम्मीदवार बच्चों को दाखिला दे सकते हैं। इस एक्ट के पैराग्राफ 30 में पता चला कि दलितों को इससे इसीलिए वंचित किया गया कि वे हिंदू हैं। सिंह ने कहा कि जब 30 प्रतिशत होकर मुसलमानों को इसमें शामिल किया जा सकता है तो पूरे देश में वंचित तबके में शामिल 20 प्रतिशत दलितों को इसका लाभ क्यों नहीं दिया गया।
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दाखिलों सहित अन्य विवादों के कारण देश में 9 बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं। इसलिए आयोग की सरकार से मांग है कि इस एक्ट में संशोधन कर दलितों को शामिल किया जाए। या फिर दलितों के लिए इसी की तर्ज पर नया एक्ट पारित कर उनकी शिक्षा के रास्ते खोले जाएं।
ईश्वर सिंह ने बताया कि इसके लिए अनुसूचित जाति आयोग के सभी सदस्यों की बैठक में उन्हें विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है, जिसपर अधिकतर काम पूरा हो गया है। शीघ्र ही इस संबंध में सरकार को रिपोर्ट तैयार कर इन मांगों को पूरा करने की बात उठाई जाएगी।