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Kaithal News: ट्रैक्टरों व वाहनों की हेडलाइट जलाकर किया जाता था रामलीला का मंचन
Tue, 30 Sep 2025 01:33 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Tue, 30 Sep 2025 01:33 AM IST
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33 सीवन में रंगमंच क्लब की ओर से की गई रामलीला में सुग्रीव व राम का मिलन फाइल फोटो
संवाद न्यूज एजेंसी
सीवन। इन दिनों सीवन में चल रही रामलीला में बाबा नारायण दास रंगमंच क्लब की ओर से आयोजित रामलीला कई वर्षों से आयोजित की जा रही है। 1972 में शुरू हुई इस रामलीला को देखने के लिए दर्शक दूर-दूर से देखने के लिए आते है। गुहला के विधायक देवेंद्र हंस के पिता मुंशी राम हंस की भागीदारी वे सेना में कार्यरत थे व छुट्टी लेकर ही राम का रोल अदा किया करते थे। उन्होंने बताया कि रामलीला के दिनों में दर्शक अक्सर ट्रैक्टर-ट्राॅली व अन्य वाहन लेकर कई-कई मील दूर से आते थे। बिजली चली जाने पर थिएटर की रोशनी नहीं होने पर भी लोग हार नहीं मानते थे। कई बार तो ट्रैक्टरों व वाहनों की हेडलाइट जलाकर ही दर्शक रामलीला का आनंद उठा लेते है। ऐसी गुंजाइशें और बचपन की नादानियां भी रामलीला की रंगीन परंपरा का हिस्सा रहीं।
उन्होंने बताया कि पुरानी पीढ़ी के अन्य सम्मानित कलाकारों में ज्ञानचंद नलवा, मोहनलाल, अजीत बावरा, अमरनाथ कामरा व श्रवण कुमार बहल का नाम अक्सर लिया जाता है। इनकी अदाकारी और मंचीय उपस्थिति को हमेशा सराहा गया है। 1972 के बाद सुग्रीव–बाली की जोड़ी दयानंद तनेजा व मांगेराम शर्मा इतनी लोकप्रिय हुई कि उनका ड्रामा देखने दूर-दूर से दर्शक आते थे। राम व सुग्रीव की मित्रता व सुग्रीव और बाली के युद्ध जैसे दृश्यों में इन कलाकारों की केमिस्ट्री विशेष रूप से यादगार रही। बाबा नारायण दास रंगमंच क्लब की रामलीला केवल नाटकीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि समुदाय की साझी स्मृति और जुड़ाव का प्रतीक रही है। पुराने कलाकारों की मेहनत, दर्शकों की लगन और ग्रामीण उत्सव की चिर परिचितता ने इस परंपरा को आज भी जीवित रखा हुआ है। स्थानीय लोग इन यादों को संजोए रखते हैं और आने वाली पीढ़ियों को भी यह विरासत हस्तांतरित कर रहे हैं। रंगमंच की परंपरा के मुताबिक रामलीला आरंभ होने से पहले एक स्थायी पूर्वाभ्यास अनिवार्य माना जाता था। पूरी टीम अधिकांशतः एक-एक महत्त्वपूर्ण रिहर्सल कर के ही मंच पर आती थी, ताकि कलाकार अपने-अपने संवाद, गीत और क्रियाएं पूरी तरह याद रखें और प्रस्तुति निर्बाध हो। मंच व्यवस्था, साज-सज्जा और संगीत का भी विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने बताया कि रामलीमा में राम की भूमिका मुशीराम हंस, रावण की भूमिक चौधरी जगन्नाथ, सुग्रीव की भूमिका पवन शर्मा, बाली की भूमिका मूूलचंद और सीता की भूमिका श्याम सुंदर बहल निभाते थे।
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सीवन। इन दिनों सीवन में चल रही रामलीला में बाबा नारायण दास रंगमंच क्लब की ओर से आयोजित रामलीला कई वर्षों से आयोजित की जा रही है। 1972 में शुरू हुई इस रामलीला को देखने के लिए दर्शक दूर-दूर से देखने के लिए आते है। गुहला के विधायक देवेंद्र हंस के पिता मुंशी राम हंस की भागीदारी वे सेना में कार्यरत थे व छुट्टी लेकर ही राम का रोल अदा किया करते थे। उन्होंने बताया कि रामलीला के दिनों में दर्शक अक्सर ट्रैक्टर-ट्राॅली व अन्य वाहन लेकर कई-कई मील दूर से आते थे। बिजली चली जाने पर थिएटर की रोशनी नहीं होने पर भी लोग हार नहीं मानते थे। कई बार तो ट्रैक्टरों व वाहनों की हेडलाइट जलाकर ही दर्शक रामलीला का आनंद उठा लेते है। ऐसी गुंजाइशें और बचपन की नादानियां भी रामलीला की रंगीन परंपरा का हिस्सा रहीं।
उन्होंने बताया कि पुरानी पीढ़ी के अन्य सम्मानित कलाकारों में ज्ञानचंद नलवा, मोहनलाल, अजीत बावरा, अमरनाथ कामरा व श्रवण कुमार बहल का नाम अक्सर लिया जाता है। इनकी अदाकारी और मंचीय उपस्थिति को हमेशा सराहा गया है। 1972 के बाद सुग्रीव–बाली की जोड़ी दयानंद तनेजा व मांगेराम शर्मा इतनी लोकप्रिय हुई कि उनका ड्रामा देखने दूर-दूर से दर्शक आते थे। राम व सुग्रीव की मित्रता व सुग्रीव और बाली के युद्ध जैसे दृश्यों में इन कलाकारों की केमिस्ट्री विशेष रूप से यादगार रही। बाबा नारायण दास रंगमंच क्लब की रामलीला केवल नाटकीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि समुदाय की साझी स्मृति और जुड़ाव का प्रतीक रही है। पुराने कलाकारों की मेहनत, दर्शकों की लगन और ग्रामीण उत्सव की चिर परिचितता ने इस परंपरा को आज भी जीवित रखा हुआ है। स्थानीय लोग इन यादों को संजोए रखते हैं और आने वाली पीढ़ियों को भी यह विरासत हस्तांतरित कर रहे हैं। रंगमंच की परंपरा के मुताबिक रामलीला आरंभ होने से पहले एक स्थायी पूर्वाभ्यास अनिवार्य माना जाता था। पूरी टीम अधिकांशतः एक-एक महत्त्वपूर्ण रिहर्सल कर के ही मंच पर आती थी, ताकि कलाकार अपने-अपने संवाद, गीत और क्रियाएं पूरी तरह याद रखें और प्रस्तुति निर्बाध हो। मंच व्यवस्था, साज-सज्जा और संगीत का भी विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने बताया कि रामलीमा में राम की भूमिका मुशीराम हंस, रावण की भूमिक चौधरी जगन्नाथ, सुग्रीव की भूमिका पवन शर्मा, बाली की भूमिका मूूलचंद और सीता की भूमिका श्याम सुंदर बहल निभाते थे।
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33 सीवन में रंगमंच क्लब की ओर से की गई रामलीला में सुग्रीव व राम का मिलन फाइल फोटो
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