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मेरे दिल के मंडेरे पै दीवा किसने जलाया सै....
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23-कैथल। मासिक गोष्ठी में पुस्तक का विमोचन करते हुए साहित्यकार।
- फोटो : Kaithal
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कैथल। आरकेएसडी कॉलेज में रविवार को साहित्य सभा की मासिक गोष्ठी हुई। इस मौके पर रचनाकारों ने ‘समय कहता बंदे न कर आजकल, मैं भी चल रहा हूं तू मेरे साथ चल’ और ‘मेरे दिल के मंडेरे पै दीवा किसने जलाया सै’ आदि रचनाएं प्रस्तुत कर दर्शकों की खूब तालियां बटोरी। गोष्ठी की शुरुआत में सभी सदस्यों ने अपनी गत मास की उपलब्धियों पर टिप्पणी प्रस्तुत की।
राजेश भारती को इंडिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में प्रथम बाल तांका संग्रह के लेखक के रूप में शामिल किए जाने पर बधाई दी। गोष्ठी का आगाज करते हुए डॉ. भल्ला ने अपनी रचना ‘बड़ा मुश्किल था हंसना मुस्कुराना, मुस्कुराए हैं। पतझड़ में बहारों के, हमीं ने गुल खिलाए हैं’ प्रस्तुत की।
रविंद्र कुमार रवि ने सुनाया- ‘मर जाएगा तू भी अगर गमों की आग सह लेगा कि कंचन भी हमेशा आग में तपकर निखरता है।’, पूंडरी से आए दिनेश बंसल ने ‘अटके खजूर में जो गिरे आसमां से हम, सहमे रहे हयात के हर इम्तिहां से हम’, हरियाणवी कवि सतबीर जागलान ने हरियाणवी ने ‘चार साल के अग्निवीर, मनै फौज की करी तैयारी, भर्ती तो कोई नई लिकड़ी, मेरी उम्र लिकड गई सारी’ रचना प्रस्तुत की। युवा कवि राजेश भारती ने ‘तुम इतने भयभीत भी मत हो जाना कि कोई जब पूछे हत्यारों का पता तो तुम अपनी वाणी को न दे सको शब्दों का सहारा’, सतीश शर्मा ने ‘समय कहता बंदे न कर आजकल, मैं भी चल रहा हूं तू मेरे साथ चल’, शिव शंकर पाहवा ने ‘इश्क न देखें खब्बे सज्जे, इश्क तां बस भज्जे भज्जे’, दिलबाग अकेला ने ‘बाल कविता बादल आए बादल आए, शीतल-शीतल जल भर लाए सुनाई।’ अनिल कौशिक ने ‘समय बड़ा बलवान, इसके हाथ में तीर कमान’ कविता सुनाई। पाई से आए सतपाल पराशर आनंद ने हरियाणवी गजल ‘कुछ यूं रही-मेरे दिल के मंडेरे पै दीवा किसने जलाया सै’, रजनीश शर्मा ने बशीर बद्र साहब की गजल तरन्नुम में पेश करके खूब वाहवाही लूटी।
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नीरु मेहता ने ‘जब भी होता है दिल उदास, चाय पी लेती हूं’ , रिसाल जांगड़ा ने ‘खतरे की जद में है खैरियत के, उड़ रहे हैं परखच्चे इंसानियत के’ रचना प्रस्तुत की। शमशेर कैंदल हमसफर ने अपनी कनाडा यात्रा पर कविता सुनाई। अमृतलाल मदान ने लघुकथा मां और मार्केट सुनाई। प्रीतम शर्मा ने प्रश्न किया, गुनाह करने में तुम्हें कोई खौफ नहीं है। ईश्वर गर्ग ने ‘वह आंसू क्या पिएगा जिसको गम खाना नहीं आता’ रचना सुनाई। डॉ. अशोक अत्री ने अपनी रचना ‘मेरा हिमालय अब झुकने लगा है, अटल निर्भय सदा साथ पाया है’, धनौरी से आए रामफल गौड़ ने हरियाणवी गजल ‘जिस मानस में हो मगरूरी, किसकी समझै वा मजबूरी’ सुनाई। चतुर्भुज बंसल ने कहा-घणे आदमी गैर के सिर टेक्के भार बुराई का। डॉ. हरीश झंडई की अध्यक्षता में हुई इस गोष्ठी का संचालन डॉ. प्रद्युम्न भल्ला ने किया।
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राजेश भारती को इंडिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में प्रथम बाल तांका संग्रह के लेखक के रूप में शामिल किए जाने पर बधाई दी। गोष्ठी का आगाज करते हुए डॉ. भल्ला ने अपनी रचना ‘बड़ा मुश्किल था हंसना मुस्कुराना, मुस्कुराए हैं। पतझड़ में बहारों के, हमीं ने गुल खिलाए हैं’ प्रस्तुत की।
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रविंद्र कुमार रवि ने सुनाया- ‘मर जाएगा तू भी अगर गमों की आग सह लेगा कि कंचन भी हमेशा आग में तपकर निखरता है।’, पूंडरी से आए दिनेश बंसल ने ‘अटके खजूर में जो गिरे आसमां से हम, सहमे रहे हयात के हर इम्तिहां से हम’, हरियाणवी कवि सतबीर जागलान ने हरियाणवी ने ‘चार साल के अग्निवीर, मनै फौज की करी तैयारी, भर्ती तो कोई नई लिकड़ी, मेरी उम्र लिकड गई सारी’ रचना प्रस्तुत की। युवा कवि राजेश भारती ने ‘तुम इतने भयभीत भी मत हो जाना कि कोई जब पूछे हत्यारों का पता तो तुम अपनी वाणी को न दे सको शब्दों का सहारा’, सतीश शर्मा ने ‘समय कहता बंदे न कर आजकल, मैं भी चल रहा हूं तू मेरे साथ चल’, शिव शंकर पाहवा ने ‘इश्क न देखें खब्बे सज्जे, इश्क तां बस भज्जे भज्जे’, दिलबाग अकेला ने ‘बाल कविता बादल आए बादल आए, शीतल-शीतल जल भर लाए सुनाई।’ अनिल कौशिक ने ‘समय बड़ा बलवान, इसके हाथ में तीर कमान’ कविता सुनाई। पाई से आए सतपाल पराशर आनंद ने हरियाणवी गजल ‘कुछ यूं रही-मेरे दिल के मंडेरे पै दीवा किसने जलाया सै’, रजनीश शर्मा ने बशीर बद्र साहब की गजल तरन्नुम में पेश करके खूब वाहवाही लूटी।
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नीरु मेहता ने ‘जब भी होता है दिल उदास, चाय पी लेती हूं’ , रिसाल जांगड़ा ने ‘खतरे की जद में है खैरियत के, उड़ रहे हैं परखच्चे इंसानियत के’ रचना प्रस्तुत की। शमशेर कैंदल हमसफर ने अपनी कनाडा यात्रा पर कविता सुनाई। अमृतलाल मदान ने लघुकथा मां और मार्केट सुनाई। प्रीतम शर्मा ने प्रश्न किया, गुनाह करने में तुम्हें कोई खौफ नहीं है। ईश्वर गर्ग ने ‘वह आंसू क्या पिएगा जिसको गम खाना नहीं आता’ रचना सुनाई। डॉ. अशोक अत्री ने अपनी रचना ‘मेरा हिमालय अब झुकने लगा है, अटल निर्भय सदा साथ पाया है’, धनौरी से आए रामफल गौड़ ने हरियाणवी गजल ‘जिस मानस में हो मगरूरी, किसकी समझै वा मजबूरी’ सुनाई। चतुर्भुज बंसल ने कहा-घणे आदमी गैर के सिर टेक्के भार बुराई का। डॉ. हरीश झंडई की अध्यक्षता में हुई इस गोष्ठी का संचालन डॉ. प्रद्युम्न भल्ला ने किया।