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भारतीय परंपरा में सदैव ऋतु के अनुरूप निर्धारित रही जीवनशैली : डाॅ. गिल
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लाइब्रेरी में मासिक गोष्ठी में भाग लेते सदस्य। विज्ञप्ति
कैथल। पंचनद शोध संस्थान कैथल अध्ययन केंद्र की ओर से विवेकानंद जिला लाइब्रेरी में मासिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी का विषय ऋतुचर्या और खान-पान रहा। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता आयुर्वेदिक मेडिकल ऑफिसर, कैथल डॉ. जितेंद्र गिल रहे।डॉ. जितेंद्र गिल ने कहा कि भारतीय परंपरा में खान-पान और जीवनशैली सदैव ऋतु के अनुरूप निर्धारित रही है।
उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज मौसम के अनुसार आहार-विहार अपनाते थे जिसके पीछे गहरा अनुभव और स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान निहित था। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि वर्षा ऋतु में वात का प्रभाव बढ़ता है जिससे जोड़ों और शरीर से संबंधित कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में परंपरागत रूप से तिल के तेल से बने व्यंजन और ऋतु के अनुकूल खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता था। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ को शरीर की प्रकृति और स्वास्थ्य से जोड़कर देखा गया है। दिनचर्या और आयु के विभिन्न चरणों में भी इनका प्रभाव अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है।
बच्चों में कफ की प्रधानता विकास में सहायक होती है, जबकि पित्त तेज बुद्धि, सक्रियता और नेतृत्व जैसे गुणों से जुड़ा माना जाता है। आयु बढ़ने के साथ वात का प्रभाव बढ़ने पर जोड़ों के दर्द जैसी समस्याएं अधिक देखने को मिल सकती हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. मनोज भांबू ने की। इस अवसर पर पंचनद शोध संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अशोक अत्रि, डॉ. मोनिका जाखड़, सीए मनोज गर्ग, डॉ. गोविंद वल्लभ, डॉ. रविंद्र जांगड़ा, डॉ. नवीन, डॉ. रोहित और डॉ. अनुराग सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम में वक्ता ने कहा कि अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े ज्ञान को समझना और जीवन में उपयोगी रूप में अपनाना आज भी उतना ही प्रासंगिक है। गोष्ठी का उद्देश्य भारतीय जीवन-पद्धति, आयुर्वेद और ऋतु के अनुरूप खान-पान के महत्व के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाना रहा।
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उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज मौसम के अनुसार आहार-विहार अपनाते थे जिसके पीछे गहरा अनुभव और स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान निहित था। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि वर्षा ऋतु में वात का प्रभाव बढ़ता है जिससे जोड़ों और शरीर से संबंधित कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में परंपरागत रूप से तिल के तेल से बने व्यंजन और ऋतु के अनुकूल खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता था। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ को शरीर की प्रकृति और स्वास्थ्य से जोड़कर देखा गया है। दिनचर्या और आयु के विभिन्न चरणों में भी इनका प्रभाव अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है।
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बच्चों में कफ की प्रधानता विकास में सहायक होती है, जबकि पित्त तेज बुद्धि, सक्रियता और नेतृत्व जैसे गुणों से जुड़ा माना जाता है। आयु बढ़ने के साथ वात का प्रभाव बढ़ने पर जोड़ों के दर्द जैसी समस्याएं अधिक देखने को मिल सकती हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. मनोज भांबू ने की। इस अवसर पर पंचनद शोध संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अशोक अत्रि, डॉ. मोनिका जाखड़, सीए मनोज गर्ग, डॉ. गोविंद वल्लभ, डॉ. रविंद्र जांगड़ा, डॉ. नवीन, डॉ. रोहित और डॉ. अनुराग सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम में वक्ता ने कहा कि अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े ज्ञान को समझना और जीवन में उपयोगी रूप में अपनाना आज भी उतना ही प्रासंगिक है। गोष्ठी का उद्देश्य भारतीय जीवन-पद्धति, आयुर्वेद और ऋतु के अनुरूप खान-पान के महत्व के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाना रहा।

लाइब्रेरी में मासिक गोष्ठी में भाग लेते सदस्य। विज्ञप्ति
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