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Kaithal News: महर्षि दयानंद सरस्वती के जन्मदिवस पर किया हवन
Thu, 12 Feb 2026 01:02 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Thu, 12 Feb 2026 01:02 AM IST
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11 ढांड 02 हवन में आहुति डालते हुए स्कूल पर प्रबंधक सूबे सिंह आर्य व अन्य।
संवाद न्यूज एजेंसी
ढांड। आर्य नवज्योति सीनियर सेकेंडरी स्कूल, कौल में महर्षि दयानंद सरस्वती के जन्मदिवस पर हवन यज्ञ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में गुरुकुल कुरुक्षेत्र से वेद प्रचारक जयपाल आर्य ने मंत्रोच्चारण कराया। स्कूल प्रबंधक सूबे सिंह आर्य, प्रधान रणवीर आर्य व स्टाफ सदस्यों ने हवन में आहुति डाली।
जयपाल आर्य ने महर्षि दयानंद के जीवन और विचारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे आधुनिक भारत के महान चिंतक, समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक थे। मूलशंकर के रूप में जन्मे दयानंद ने 10 अप्रैल 1875 को आर्य समाज की स्थापना की और ‘वेदों की ओर लौटो’ का संदेश दिया। उन्होंने मूर्तिपूजा, जातिवाद और सामाजिक रूढ़ियों का विरोध करते हुए नारी शिक्षा व समानता का समर्थन किया। उन्होंने बताया कि किशोरावस्था में शिवरात्रि की एक घटना से प्रभावित होकर दयानंद ने मूर्तिपूजा पर प्रश्न उठाए और 14 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया। बाद में मथुरा में गुरु विरजानंद से शिक्षा प्राप्त कर वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार में जुट गए। उन्होंने बाल विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन, शिक्षा के प्रसार और स्वराज्य के विचार को आगे बढ़ाया।
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ढांड। आर्य नवज्योति सीनियर सेकेंडरी स्कूल, कौल में महर्षि दयानंद सरस्वती के जन्मदिवस पर हवन यज्ञ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में गुरुकुल कुरुक्षेत्र से वेद प्रचारक जयपाल आर्य ने मंत्रोच्चारण कराया। स्कूल प्रबंधक सूबे सिंह आर्य, प्रधान रणवीर आर्य व स्टाफ सदस्यों ने हवन में आहुति डाली।
जयपाल आर्य ने महर्षि दयानंद के जीवन और विचारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे आधुनिक भारत के महान चिंतक, समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक थे। मूलशंकर के रूप में जन्मे दयानंद ने 10 अप्रैल 1875 को आर्य समाज की स्थापना की और ‘वेदों की ओर लौटो’ का संदेश दिया। उन्होंने मूर्तिपूजा, जातिवाद और सामाजिक रूढ़ियों का विरोध करते हुए नारी शिक्षा व समानता का समर्थन किया। उन्होंने बताया कि किशोरावस्था में शिवरात्रि की एक घटना से प्रभावित होकर दयानंद ने मूर्तिपूजा पर प्रश्न उठाए और 14 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया। बाद में मथुरा में गुरु विरजानंद से शिक्षा प्राप्त कर वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार में जुट गए। उन्होंने बाल विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन, शिक्षा के प्रसार और स्वराज्य के विचार को आगे बढ़ाया।
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