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Kaithal News: पड़ोसी राज्यों में मिठास फैला रहा सीवन का गोल्डन ग्लोरी खरबूजा
Sat, 03 May 2025 12:58 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Sat, 03 May 2025 12:58 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
सीवन। यहां के खरबूजे अपने मीठा और सुगंधित के लिए लोकप्रियता बटोर रहा है। गोल्डन ग्लोरी किस्म के खरबूजे ने अपने बेहतरीन स्वाद, चमकदार रंग और लंबी शेल्फ लाइफ के चलते बाजार में अपनी खास पहचान बना ली है। इसकी मिठास हर ओर फैल रही है।
यह फसल अब इतनी प्रसिद्ध हो चुकी है कि किसान अपनी उपज को मंडी तक नहीं ले जाते बल्कि खरीदार खुद खेतों में आकर खरबूजे की बोली लगाते हैं और एडवांस बुकिंग कर लेते हैं।
बढ़ती मांग, मजबूत ब्रांडिंग ः इस समय सीवन, गोबिंदपुरा, फिरोजपुर, मलिकपुर, खानपुर और आस-पास के क्षेत्रों में करीब 2000 एकड़ में खरबूजे की खेती हो रही है। स्थानीय किसान नवदीप सिंह, अंतरजीत सिंह, राजेश रहेजा और जरनैल सिंह बताते हैं कि सीवन का खरबूजा अब हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, चंडीगढ़ और हिमाचल तक पहुंच चुका है। इन राज्यों के व्यापारी पहले से ही खेतों में आकर खरबूजे खरीदने लगे हैं। बाजार में इस समय बोबी खरबूजा 40 से 50 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिक रहा है।
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मल्चिंग तकनीक से क्रांति ः सीवन के किसानों ने पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाया है। विशेष रूप से मल्चिंग तकनीक ने उन्हें अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता देने में सहायता की है। इस तकनीक में पॉलीथीन की परत मिट्टी पर बिछाई जाती है, जिससे नमी बरकरार रहती है, खरपतवार नहीं उगते और मिट्टी का तापमान नियंत्रित रहता है।
किसानों का कहना है कि इस तकनीक से शुरुआत में लागत थोड़ी अधिक आती है, लेकिन इसके लाभ कई गुना ज्यादा हैं। गोल्डन ग्लोरी किस्म का बीज 28,000 रुपये प्रति किलो तक आता है, और प्रति एकड़ करीब 250-300 ग्राम बीज की जरूरत होती है। खेती लागत 55,000 से 60,000 रुपये प्रति एकड़ के बीच आती है और मुनाफा कई गुना तक है।
मल्चिंग तकनीक को जानें
मल्चिंग एक ऐसी तकनीक है जिसमें मिट्टी की सतह को जैविक या अकार्बनिक सामग्री से ढका जाता है। यह तकनीक मिट्टी की नमी बनाए रखने, खरपतवारों को नियंत्रित करने, मिट्टी के कटाव को रोकने और मिट्टी की उर्वरता में सुधार करने के लिए उपयोगी है।
खासियतें जो बनाती हैं सीवन के खरबूजे को खास
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गोल्डन ग्लोरी किस्म का खरबूजा स्वाद में अत्यंत मीठा और सुगंधित होता है, जो इसे बाकी किस्मों से अलग बनाता है।
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यह किस्म जल्दी खराब नहीं होती, जिससे व्यापारी इसे दूर-दराज तक ले जा सकते हैं।
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किसानों को मंडियों की निर्भरता से राहत मिली है। व्यापारी खुद खेत में आकर खरबूजे की बोली लगाते हैं।
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सीवन। यहां के खरबूजे अपने मीठा और सुगंधित के लिए लोकप्रियता बटोर रहा है। गोल्डन ग्लोरी किस्म के खरबूजे ने अपने बेहतरीन स्वाद, चमकदार रंग और लंबी शेल्फ लाइफ के चलते बाजार में अपनी खास पहचान बना ली है। इसकी मिठास हर ओर फैल रही है।
यह फसल अब इतनी प्रसिद्ध हो चुकी है कि किसान अपनी उपज को मंडी तक नहीं ले जाते बल्कि खरीदार खुद खेतों में आकर खरबूजे की बोली लगाते हैं और एडवांस बुकिंग कर लेते हैं।
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बढ़ती मांग, मजबूत ब्रांडिंग ः इस समय सीवन, गोबिंदपुरा, फिरोजपुर, मलिकपुर, खानपुर और आस-पास के क्षेत्रों में करीब 2000 एकड़ में खरबूजे की खेती हो रही है। स्थानीय किसान नवदीप सिंह, अंतरजीत सिंह, राजेश रहेजा और जरनैल सिंह बताते हैं कि सीवन का खरबूजा अब हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, चंडीगढ़ और हिमाचल तक पहुंच चुका है। इन राज्यों के व्यापारी पहले से ही खेतों में आकर खरबूजे खरीदने लगे हैं। बाजार में इस समय बोबी खरबूजा 40 से 50 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिक रहा है।
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मल्चिंग तकनीक से क्रांति ः सीवन के किसानों ने पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाया है। विशेष रूप से मल्चिंग तकनीक ने उन्हें अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता देने में सहायता की है। इस तकनीक में पॉलीथीन की परत मिट्टी पर बिछाई जाती है, जिससे नमी बरकरार रहती है, खरपतवार नहीं उगते और मिट्टी का तापमान नियंत्रित रहता है।
किसानों का कहना है कि इस तकनीक से शुरुआत में लागत थोड़ी अधिक आती है, लेकिन इसके लाभ कई गुना ज्यादा हैं। गोल्डन ग्लोरी किस्म का बीज 28,000 रुपये प्रति किलो तक आता है, और प्रति एकड़ करीब 250-300 ग्राम बीज की जरूरत होती है। खेती लागत 55,000 से 60,000 रुपये प्रति एकड़ के बीच आती है और मुनाफा कई गुना तक है।
मल्चिंग तकनीक को जानें
मल्चिंग एक ऐसी तकनीक है जिसमें मिट्टी की सतह को जैविक या अकार्बनिक सामग्री से ढका जाता है। यह तकनीक मिट्टी की नमी बनाए रखने, खरपतवारों को नियंत्रित करने, मिट्टी के कटाव को रोकने और मिट्टी की उर्वरता में सुधार करने के लिए उपयोगी है।
खासियतें जो बनाती हैं सीवन के खरबूजे को खास
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गोल्डन ग्लोरी किस्म का खरबूजा स्वाद में अत्यंत मीठा और सुगंधित होता है, जो इसे बाकी किस्मों से अलग बनाता है।
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यह किस्म जल्दी खराब नहीं होती, जिससे व्यापारी इसे दूर-दराज तक ले जा सकते हैं।
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किसानों को मंडियों की निर्भरता से राहत मिली है। व्यापारी खुद खेत में आकर खरबूजे की बोली लगाते हैं।