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डिपोर्ट हुए युवकों की पीड़ा: दस दिन तक गाजर, गोभी और टमाटर पर नमक लगाकर खाया; जिंदगी बचाने के लिए झेली यातनाएं
Wed, 29 Oct 2025 01:55 PM IST
शाहरुख खान
सोनू थुआ, अमर उजाला, कैथल
सोनू थुआ, अमर उजाला, कैथल
Published by: शाहरुख खान
Updated Wed, 29 Oct 2025 01:55 PM IST
सार
अमेरिका से डिपोर्ट हुए युवकों ने दर्द साझा किया है। युवकों ने बताया कि 10 दिनों तक गाजर, गोभी और टमाटर पर नमक लगाकर खाया। शाकाहारी लोगों ने अमेरिका की जेलों में जीवन बचाने के लिए यातनाएं झेलीं। बाद में एक-आधी रोटी मिलनी शुरू हुई। इसके लिए भी सेना से गालियां मिलती थीं।
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Donkey Route
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
डंकी रूट से डॉलर कमाने की चाह में अमेरिका पहुंचे लोगों का जीवन वहां की अस्थायी जेलों में नारकीय बन गया है। सैकड़ों लोगों को पीने का पानी और भरपेट भोजन तक नहीं मिल पा रहा है।
जीवन बचाने के लिए शाकाहारी लोगों को दस दिन तक कच्ची गोभी, टमाटर और गाजर जैसी मौसमी सब्जियों पर नमक लगाकर पेट भरना पड़ा। यह दर्दभरी सच्चाई अमेरिका से डिपोर्ट होकर लौटे लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर साझा की।
अमेरिका में रह चुके राजेश, बिट्टू और नरेंद्र का कहना है कि वे परिवार को बेहतर जिंदगी देने के लिए डॉलर कमाने की चाह में अमेरिका गए थे लेकिन ट्रंप सरकार आने के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। पैसा कमाने गए लोग अब खुलकर काम भी नहीं कर पा रहे हैं। अंग्रेजी न बोल पाने वाले भारतीयों को पकड़-पकड़कर जेलों में डाला जा रहा है।
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अमेरिकी इमिग्रेशन एंड कस्टम इंफोर्समेंट एजेंसी के कर्मचारी जगह-जगह नाके लगाकर विदेशी नागरिकों के कागजों की जांच कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि डर के माहौल में घर से बाहर निकलना तक मुश्किल हो गया है। खाने-पीने का सामान लाने के लिए भी लोग डरते हैं कि कहीं अमेरिकी सैनिक पकड़कर जेल में न डाल दें।
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जीवन बचाने के लिए शाकाहारी लोगों को दस दिन तक कच्ची गोभी, टमाटर और गाजर जैसी मौसमी सब्जियों पर नमक लगाकर पेट भरना पड़ा। यह दर्दभरी सच्चाई अमेरिका से डिपोर्ट होकर लौटे लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर साझा की।
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अमेरिका में रह चुके राजेश, बिट्टू और नरेंद्र का कहना है कि वे परिवार को बेहतर जिंदगी देने के लिए डॉलर कमाने की चाह में अमेरिका गए थे लेकिन ट्रंप सरकार आने के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। पैसा कमाने गए लोग अब खुलकर काम भी नहीं कर पा रहे हैं। अंग्रेजी न बोल पाने वाले भारतीयों को पकड़-पकड़कर जेलों में डाला जा रहा है।
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अमेरिकी इमिग्रेशन एंड कस्टम इंफोर्समेंट एजेंसी के कर्मचारी जगह-जगह नाके लगाकर विदेशी नागरिकों के कागजों की जांच कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि डर के माहौल में घर से बाहर निकलना तक मुश्किल हो गया है। खाने-पीने का सामान लाने के लिए भी लोग डरते हैं कि कहीं अमेरिकी सैनिक पकड़कर जेल में न डाल दें।
कैथल जिले की बात करें तो यहां से करीब एक हजार लोग अमेरिका के शहरों कैलिफोर्निया, शिकागो, न्यूयॉर्क, डेलस, फ्रेस्नो और एरिजोना आदि में काम करने गए हुए हैं। सभी को अपने देश डिपोर्ट किए जाने का खतरा बना हुआ है।
अपनी पुश्तैनी जमीन बेचकर गए अमेरिका
हरियाणा और पंजाब के अधिकांश लोग अपनी जमीन-जायदाद, दुकानें और गहने बेचकर या गिरवी रखकर विदेश गए हैं। परिजनों के चेहरों पर मायूसी छाई हुई है क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं उनके लाल खाली हाथ वापस न लौट आएं।
हरियाणा और पंजाब के अधिकांश लोग अपनी जमीन-जायदाद, दुकानें और गहने बेचकर या गिरवी रखकर विदेश गए हैं। परिजनों के चेहरों पर मायूसी छाई हुई है क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं उनके लाल खाली हाथ वापस न लौट आएं।
मौसमी कच्ची सब्जियों पर नमक छिड़ककर भरा पेट
नाम न छापने की शर्त पर डिपोर्ट होकर लौटे एक व्यक्ति ने भावुक होकर बताया कि वह मैं मार्च में अमेरिका में दीवार फांदकर दाखिल हुए थे। पांच महीने जंगलों में छिपकर गुजारे। डोंकरों को 20 लाख रुपये देकर वहां से निकले। सात दिन भूखे-प्यासे पैदल चले।
नाम न छापने की शर्त पर डिपोर्ट होकर लौटे एक व्यक्ति ने भावुक होकर बताया कि वह मैं मार्च में अमेरिका में दीवार फांदकर दाखिल हुए थे। पांच महीने जंगलों में छिपकर गुजारे। डोंकरों को 20 लाख रुपये देकर वहां से निकले। सात दिन भूखे-प्यासे पैदल चले।
उन्होंने बताया कि अमेरिका की अस्थायी जेल में दो दिन तक उनके सामने मुर्गे का मांस रखा गया लेकिन शाकाहारी होने के कारण वह खा नहीं सके। दो दिन सिर्फ पानी पर गुजारा किया। फिर गाजर, गोभी और टमाटर जैसी कच्ची सब्जियों पर नमक लगाकर खाना शुरू किया।
दस दिन तक यही खाया-पिया। बाद में एक-आधी रोटी मिलनी शुरू हुई। उन्होंने बताया कि उनके पास सिर्फ एक एकड़ जमीन थी जिसे बेचकर गए थे। एजेंट से 75 लाख रुपये में सौदा हुआ था। उनका कहना है कि अगर विदेश जाना ही है तो कानूनी रास्ते से जाएं। डंकी रूट मौत को दावत देने जैसा है।
पानी मांगने पर सेना के जवान देते थे गालियां
शहर निवासी एक युवक ने बताया कि वह सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था लेकिन सफलता न मिलने पर विदेश जाने का निर्णय लिया। नवंबर में वह स्पेन गया और वहां से तीन बार मेक्सिको जाने की कोशिश की लेकिन हर बार हवाई अड्डे से वापस भेज दिया गया।
शहर निवासी एक युवक ने बताया कि वह सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था लेकिन सफलता न मिलने पर विदेश जाने का निर्णय लिया। नवंबर में वह स्पेन गया और वहां से तीन बार मेक्सिको जाने की कोशिश की लेकिन हर बार हवाई अड्डे से वापस भेज दिया गया।
चौथी बार में वह मेक्सिको पहुंचा जहां से अमेरिका गया। अमेरिका की अस्थायी जेल में उसे दिन में दो बार पानी मिलता था। वह भी रेतीला और खारा। पानी और खाना खाते समय अमेरिकी सैनिक ऊपर खड़े रहते और अंग्रेजी में गालियां देते थे।
एक सेंटर में 40 से 60 लोगों को कबूतरों की तरह जाल में ठूंसा गया था। सोने के लिए सिर्फ पॉलीथिन दी जाती थी। उसने बताया कि वह 50 लाख रुपये खर्च करके गया था जो उसने अपनी मां के गहने बेचकर जुटाए थे। अब लौटकर कहता है कि देश में रहकर ही मेहनत करें विदेश जाकर जान जोखिम में न डालें।
एक सेंटर में 40 से 60 लोगों को कबूतरों की तरह जाल में ठूंसा गया था। सोने के लिए सिर्फ पॉलीथिन दी जाती थी। उसने बताया कि वह 50 लाख रुपये खर्च करके गया था जो उसने अपनी मां के गहने बेचकर जुटाए थे। अब लौटकर कहता है कि देश में रहकर ही मेहनत करें विदेश जाकर जान जोखिम में न डालें।
फरवरी से पहले लोकेशन लगाकर छोड़ दिया जाता था, अब नियम सख्त
अमेरिका में रहने वाले रामजी और सुखदेव ने बताया कि पहले अमेरिका के नियम इतने सख्त नहीं थे। फरवरी से पहले डंकी रूट से पकड़े गए लोगों को अस्थायी जेल में रखकर बाद में अदालत में पेश किया जाता था। फिर उनके हाथ-पैर में लोकेशन डिवाइस लगाकर छोड़ दिया जाता था। वे उसी लोकेशन सीमा में रहकर काम कर सकते थे।
अमेरिका में रहने वाले रामजी और सुखदेव ने बताया कि पहले अमेरिका के नियम इतने सख्त नहीं थे। फरवरी से पहले डंकी रूट से पकड़े गए लोगों को अस्थायी जेल में रखकर बाद में अदालत में पेश किया जाता था। फिर उनके हाथ-पैर में लोकेशन डिवाइस लगाकर छोड़ दिया जाता था। वे उसी लोकेशन सीमा में रहकर काम कर सकते थे।
इमिग्रेशन एंड कस्टम इंफोर्समेंट एजेंसी के अधिकारी हफ्ते में एक बार स्थिति की जांच करते थे। वर्क परमिट भी जारी हो जाता था और ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की अनुमति भी मिल जाती थी लेकिन अब नियम बेहद सख्त कर दिए गए हैं।
सरकारी नौकरी छोड़कर गया था युवक
गांव जाडौला निवासी सुखबीर तीन साल पहले इटली गया था और वहां एक वर्ष रहा। परिजनों ने उसे भेजने में 17 लाख रुपये खर्च किए थे। बाद में उसने मेक्सिको की दीवार पार करने की कोशिश की लेकिन पकड़ा गया।
गांव जाडौला निवासी सुखबीर तीन साल पहले इटली गया था और वहां एक वर्ष रहा। परिजनों ने उसे भेजने में 17 लाख रुपये खर्च किए थे। बाद में उसने मेक्सिको की दीवार पार करने की कोशिश की लेकिन पकड़ा गया।
छह महीने पहले उसकी मां का निधन हो गया। सुखबीर करनाल में फायर ब्रिगेड विभाग में कर्मचारी था लेकिन बेहतर भविष्य के लिए उसने नौकरी छोड़ दी। उसके दो छोटे बेटे हैं। दो वर्ष से वह शिविर में रह रहा था। अब उसे डिपोर्ट कर भारत भेज दिया गया है।