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सीबीएसई की एडवाइजरी का नहीं है अधिकतर स्कूलों पर कोई असर
ब्यूरो कैथ्ाल
Updated Tue, 25 Apr 2017 12:14 AM IST
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दुकान से किताबें खरीदते अभिभावक
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सीबीएसई की एडवाइजरी का शहर के अधिकतर निजी स्कूलों पर कोई असर नहीं दिख रहा है। एडवाइजरी के बाद भी शहर अभिभावकों से पुस्तकों और वर्दियों के माध्यम से अघोषित लूट जारी है। ऐसा नहीं है कि स्कूल संचालक ही निजी प्रकाशकों को प्राथमिकता दे रहे हैं। बाजार में एनसीईआरटी की किताबें ही नहीं हैं। इसी बात का फायदा कहीं ना कहीं स्कूल संचालक पुस्तक विक्रेताओं के साथ मिलकर उठा रहे हैं।
एनसीईआरटी की किताबों में भी भारी कमीशन
सरकार की ओर से दुकानदारों को एनसीईआरटी की किताबों पर 20 प्रतिशत का डिस्काउंट मिलता है। दुकानदार एनसीईआरटी की किताब पर प्रकाशित मूल्य पर ही विद्यार्थियों को किताबें देते हैं। निजी स्कूल संचालक अगर एनसीईआरटी की किताबें पूरी तरह से लगवाता है उसमें भी स्कूल संचालक व दुकानदार 10-10 प्रतिशत डिस्काउंट से अपनी जेेबें भरते हैं। जिसका भुगतान अभिभावकों को करना पड़ता है।
एनसीईआरटी की किताबें ही नहीं हैं बाजार में
शहर के बाजारों में सभी विषयों की पूरी किताबें ही नहीं हैं। यहां तक की कैथल जिले में एक भी सब बुुक डिपो नहीं है। दुकानदार अंबाला व अन्य शहर से किताबें लेकर आते हैं। शहर के तीन दुकानदार एनसीईआरटी की किताबें बेचते हैं। जिसमें केवल 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को किताबें उपलब्ध हो पाती हैं। बाकी पुस्तकें निजी प्रकाशकों की पढ़ाई जा रही हैं। यही स्थिति हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड की है। महज 30 प्रतिशत किताबें ही बोर्ड की बाजार में उपलब्ध होती हैं। जिस कारण बच्चों को बाजार से पुस्तकें खरीदनी पड़ती हैं।
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जुराब-जूतों से लेकर वर्दियों तक की फिक्स है दुकान
अधिकतर निजी स्कूल संचालकों ने विद्यार्थियों के लिए जुराब-जूतों से लेकर वर्दियों तक दुकानें फिक्स की हुई हैं। स्कूल संचालकों ने लाखों रुपये में कमीशन फिक्स किया हुआ है। स्कूल संचालक एक ही दुकान से विद्यार्थियों के वर्दी, जुराब व जूते तक लेने के लिए बाध्य करते हैं। स्कूलों से तो यहां तक पता चला है कि महज बोर्ड की कक्षाओं में ही एनसीईआरटी की किताबें लगवाई जा रही हैं। बाकी कक्षाओं में निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लगवाकर कमीशनखोरी का खेल खेला जा रहा है।
बड़े पैमाने पर है मिलीभगत
एक पुस्तक विक्रेता ने बताया कि बड़े पैमाने पर मिलीभगत है। एनसीईआरटी की पूरी किताबें नहीं पहुंचने के कारण यही होता है। जब पूरी किताबें नहीं पहुंची है तो प्राइवेट पब्लिशर व निजी स्कूल संचालकों को लाभ मिलता है।
कोई सुनवाई नहीं
अभिभावक जोगिंद्र ढुल, शमशेर, अनुज कुमार, पुनीत कुमार, मलकीत सिंह ने बताया कि एनसीईआरटी की एडवाइजरी का कोई असर नजर नहीं आ रहा। अभिभावकों की ना तो सरकार सुन रही है ना ही शिक्षा विभाग कोई ठोस कार्रवाई कर रहा है।
वहीं एक स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा कि एनसीईआरटी की किताबें ही नहीं हैं। रही बात जूते-जुराबों और वर्दियों की तो ऐसी कोई बात नहीं हैं। अभिभावक जहां मर्जी से पुस्तकें खरीद सकते हैं।
डिप्टी डीईओ शमशेर सिरोही का कहना है कि पूर्व में सरकार के निर्देशानुसार स्कूल संचालकों को नोटिस जारी कर दिया गया था। यदि किसी अभिभावक को परेशानी है तो वह शिकायत दे सकता है।
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एनसीईआरटी की किताबों में भी भारी कमीशन
सरकार की ओर से दुकानदारों को एनसीईआरटी की किताबों पर 20 प्रतिशत का डिस्काउंट मिलता है। दुकानदार एनसीईआरटी की किताब पर प्रकाशित मूल्य पर ही विद्यार्थियों को किताबें देते हैं। निजी स्कूल संचालक अगर एनसीईआरटी की किताबें पूरी तरह से लगवाता है उसमें भी स्कूल संचालक व दुकानदार 10-10 प्रतिशत डिस्काउंट से अपनी जेेबें भरते हैं। जिसका भुगतान अभिभावकों को करना पड़ता है।
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एनसीईआरटी की किताबें ही नहीं हैं बाजार में
शहर के बाजारों में सभी विषयों की पूरी किताबें ही नहीं हैं। यहां तक की कैथल जिले में एक भी सब बुुक डिपो नहीं है। दुकानदार अंबाला व अन्य शहर से किताबें लेकर आते हैं। शहर के तीन दुकानदार एनसीईआरटी की किताबें बेचते हैं। जिसमें केवल 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को किताबें उपलब्ध हो पाती हैं। बाकी पुस्तकें निजी प्रकाशकों की पढ़ाई जा रही हैं। यही स्थिति हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड की है। महज 30 प्रतिशत किताबें ही बोर्ड की बाजार में उपलब्ध होती हैं। जिस कारण बच्चों को बाजार से पुस्तकें खरीदनी पड़ती हैं।
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जुराब-जूतों से लेकर वर्दियों तक की फिक्स है दुकान
अधिकतर निजी स्कूल संचालकों ने विद्यार्थियों के लिए जुराब-जूतों से लेकर वर्दियों तक दुकानें फिक्स की हुई हैं। स्कूल संचालकों ने लाखों रुपये में कमीशन फिक्स किया हुआ है। स्कूल संचालक एक ही दुकान से विद्यार्थियों के वर्दी, जुराब व जूते तक लेने के लिए बाध्य करते हैं। स्कूलों से तो यहां तक पता चला है कि महज बोर्ड की कक्षाओं में ही एनसीईआरटी की किताबें लगवाई जा रही हैं। बाकी कक्षाओं में निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लगवाकर कमीशनखोरी का खेल खेला जा रहा है।
बड़े पैमाने पर है मिलीभगत
एक पुस्तक विक्रेता ने बताया कि बड़े पैमाने पर मिलीभगत है। एनसीईआरटी की पूरी किताबें नहीं पहुंचने के कारण यही होता है। जब पूरी किताबें नहीं पहुंची है तो प्राइवेट पब्लिशर व निजी स्कूल संचालकों को लाभ मिलता है।
कोई सुनवाई नहीं
अभिभावक जोगिंद्र ढुल, शमशेर, अनुज कुमार, पुनीत कुमार, मलकीत सिंह ने बताया कि एनसीईआरटी की एडवाइजरी का कोई असर नजर नहीं आ रहा। अभिभावकों की ना तो सरकार सुन रही है ना ही शिक्षा विभाग कोई ठोस कार्रवाई कर रहा है।
वहीं एक स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा कि एनसीईआरटी की किताबें ही नहीं हैं। रही बात जूते-जुराबों और वर्दियों की तो ऐसी कोई बात नहीं हैं। अभिभावक जहां मर्जी से पुस्तकें खरीद सकते हैं।
डिप्टी डीईओ शमशेर सिरोही का कहना है कि पूर्व में सरकार के निर्देशानुसार स्कूल संचालकों को नोटिस जारी कर दिया गया था। यदि किसी अभिभावक को परेशानी है तो वह शिकायत दे सकता है।