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Kaithal News: घटे अवशेष जलाने के केस अब तक पांच मामले दर्ज
Thu, 30 Oct 2025 12:32 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Thu, 30 Oct 2025 12:32 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। पराली प्रबंधन पर अब जिले के किसान जागरूक हो रहे हैं। इस बार अब तक पराली जलाने के सिर्फ पांच मामले ही सामने आए हैं, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि तक 137 केस दर्ज किए गए थे।
किसानों में बढ़ती जागरूकता और कृषि यंत्र सब्सिडी योजना के कारण यह सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। गांव नौच के किसान लवप्रीत ने बताया कि पहले धान की कटाई के बाद पराली निपटान सबसे बड़ी समस्या थी। मजबूरी में पराली जलानी पड़ती थी, जिससे न केवल प्रदूषण फैलता था बल्कि खेत की उर्वरक क्षमता भी घटती थी। अब किसान एसएमएस (स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम) और सुपर सीडर जैसी मशीनों से पराली को खेत में ही मिला रहे हैं, जिससे मिट्टी उपजाऊ बन रही है। उन्होंने कहा कि “पराली खेत में मिलाना डीएपी की एक बोरी नहीं, बल्कि दस बोरी का काम करता है।
गांव जसवंती के किसान सोनू राठी ने कहा कि अब पराली खेत में दबाने से मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ते हैं और भूमि की उर्वरता बनी रहती है। गांव कैलरम के किसान राकेश ने बताया कि कुछ किसान बेलर मशीन से पराली की गांठें बनाकर उसे वाणिज्यिक रूप से बेचकर अतिरिक्त आमदनी भी कमा रहे हैं। उन्होंने अपील की कि किसान पराली जलाने से बचें, क्योंकि इससे मिट्टी के उपयोगी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं और भूमि की उपजाऊ शक्ति घटती है।
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कृषि विभाग के अनुसार, कैथल सहित हरियाणा के कई जिलों में पराली प्रबंधन के लिए मशीन सब्सिडी योजना से किसानों की रुचि बढ़ी है। इससे इस बार पराली जलाने के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। सरकार की ओर से पराली प्रबंधन के लिए दी जा रही 1200 रुपये प्रति एकड़ राशि का लाभ भी किसानों को मिल रहा है।
कृषि विभाग के सहायक अभियंता जगदीश मलिक ने बताया कि किसानों को पराली न जलाने के लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे पराली प्रबंधन अपनाकर सरकार की योजनाओं का अधिकतम लाभ उठाएं।
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कैथल। पराली प्रबंधन पर अब जिले के किसान जागरूक हो रहे हैं। इस बार अब तक पराली जलाने के सिर्फ पांच मामले ही सामने आए हैं, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि तक 137 केस दर्ज किए गए थे।
किसानों में बढ़ती जागरूकता और कृषि यंत्र सब्सिडी योजना के कारण यह सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। गांव नौच के किसान लवप्रीत ने बताया कि पहले धान की कटाई के बाद पराली निपटान सबसे बड़ी समस्या थी। मजबूरी में पराली जलानी पड़ती थी, जिससे न केवल प्रदूषण फैलता था बल्कि खेत की उर्वरक क्षमता भी घटती थी। अब किसान एसएमएस (स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम) और सुपर सीडर जैसी मशीनों से पराली को खेत में ही मिला रहे हैं, जिससे मिट्टी उपजाऊ बन रही है। उन्होंने कहा कि “पराली खेत में मिलाना डीएपी की एक बोरी नहीं, बल्कि दस बोरी का काम करता है।
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गांव जसवंती के किसान सोनू राठी ने कहा कि अब पराली खेत में दबाने से मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ते हैं और भूमि की उर्वरता बनी रहती है। गांव कैलरम के किसान राकेश ने बताया कि कुछ किसान बेलर मशीन से पराली की गांठें बनाकर उसे वाणिज्यिक रूप से बेचकर अतिरिक्त आमदनी भी कमा रहे हैं। उन्होंने अपील की कि किसान पराली जलाने से बचें, क्योंकि इससे मिट्टी के उपयोगी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं और भूमि की उपजाऊ शक्ति घटती है।
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कृषि विभाग के अनुसार, कैथल सहित हरियाणा के कई जिलों में पराली प्रबंधन के लिए मशीन सब्सिडी योजना से किसानों की रुचि बढ़ी है। इससे इस बार पराली जलाने के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। सरकार की ओर से पराली प्रबंधन के लिए दी जा रही 1200 रुपये प्रति एकड़ राशि का लाभ भी किसानों को मिल रहा है।
कृषि विभाग के सहायक अभियंता जगदीश मलिक ने बताया कि किसानों को पराली न जलाने के लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे पराली प्रबंधन अपनाकर सरकार की योजनाओं का अधिकतम लाभ उठाएं।