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शहीद के आखिरी सफर के साक्षी बने हजारों लोग, किया नमन
Updated Tue, 21 Aug 2018 12:29 AM IST
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शहीद को नमन कर महिलाएं बोलीं, मां नै योए दिन देखण खात्तर जाम्या था लाल
- गुहला के सबसे बड़े गांव भागल ने पहली बार देखी इतनी भीड़
- लद्दाख के दुर्गम इलाके में ड्यूटी के दौरान शहीद हुए राइफलमैन राजेश पूनिया
अमर उजाला ब्यूरो
गुहला-चीका। यह शव यात्रा नहीं, शहीद की बारात निकली है। मां कृष्णा अपने जवान बेटे के लिए बहू ढूंढ रही थी लेकिन उसे मालूम नहीं था कि बेटा शहादत को ही अपनी दुल्हन बनाने की बात नियति में लिखवाकर आया था। गांव भागल के जांबाज राजेश पूनिया ने जब तीन साल पहले सेना की वर्दी पहनी थी तो पूरा गांव माता-पिता को बधाई देने आया था। सोमवार को जब वह अपने उसी फौजी वर्दी वाले जिस्म पर तिरंगा लपेटकर वापस घर लौटा तो पूरा गांव दिलासा देने उमड़ पड़ा। आसपास का कोई ऐसा गांव नहीं था जिससे लोग शहीद ही अंतिम यात्रा के साक्षी बनने न पहुंचे हों। क्या बच्चे, क्या बूढ़े हर कोई गांव की गलियों में जमा थे। शहीद को नमन करते हुए महिलाओं ने कहा कि मां नै योए दिन देखण खात्तर जाम्या था लाल।
गांव वालों ने आज पूरे गांव को तिरंगे झंडों से सजाया था। रास्ते में कई जगह पर तिरंगी रंगोलियां बनाकर लिख दिया था हमारा राजेश अमर रहे। एक बजे तक पहुंचने की सूचना थी लेकिन राजेश का पार्थिव शरीर पांच बजे के बाद आया। उसका स्वागत करने के लिए पिहोवा से लेकर भागल तक हाथ से हाथ पकड़े लोग ही लोग खड़े थे। एक हजार से ज्यादा मोटर साइकिल भागल से काफी पहले फौज की गाड़ी के आगे-आगे चल रहे थे।
अपने फौजी साथियों के कंधों पर घर पहुंचे शहीद के लिए सभी ने श्रद्धा से हाथ जोड़े लेकिन मां कृष्णा ने बेटे का माथा चूमकर आंखें बंद कर ली जैसे आखिरी विदाई के लिए अपने आपको तैयार कर रही हो। मां बोली, अपने दूसरे बेटे को भी सेना में ही भर्ती कराऊंगी। भाई रामफल भी बोला जिस रास्ते भाई गया है, उसी रास्ते पर गया तो इससे बेहतर और हो भी क्या सकता है।
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सेना की टुकड़ी ने फिर अपने वीर के ताबूत को कंधे पर उठा लिया। फिर उसी फौजी गाड़ी में उसे विराजमान किया और आखिरी मंजिल की तरफ लेकर चल पड़े। एक बार फिर भावनाओं का ज्वार बह निकला। लोग रो रहे थे पर साथ ही भारत माता की जय जैसे गर्वीले नारे भी लगा रहे थे। श्मशान घाट में राजेश को पूरे राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी गई। यह पहली बार था कि गांव के श्मशान घाट में सैकड़ों महिलाएं भी पहुंचीं थी। 80 साल की छोटी देवी बोली लुगाइयां का उरै आणा माड़ा मान्या जै म्हारे गाम मैं पर आज नहीं रूक्या जांदा। शहीद राजेश के बचपन का साथी गुरजंट बोला कि मर जाने और शहीद होने में क्या फर्क होता है, आज ही जाना है।
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- गुहला के सबसे बड़े गांव भागल ने पहली बार देखी इतनी भीड़
- लद्दाख के दुर्गम इलाके में ड्यूटी के दौरान शहीद हुए राइफलमैन राजेश पूनिया
अमर उजाला ब्यूरो
गुहला-चीका। यह शव यात्रा नहीं, शहीद की बारात निकली है। मां कृष्णा अपने जवान बेटे के लिए बहू ढूंढ रही थी लेकिन उसे मालूम नहीं था कि बेटा शहादत को ही अपनी दुल्हन बनाने की बात नियति में लिखवाकर आया था। गांव भागल के जांबाज राजेश पूनिया ने जब तीन साल पहले सेना की वर्दी पहनी थी तो पूरा गांव माता-पिता को बधाई देने आया था। सोमवार को जब वह अपने उसी फौजी वर्दी वाले जिस्म पर तिरंगा लपेटकर वापस घर लौटा तो पूरा गांव दिलासा देने उमड़ पड़ा। आसपास का कोई ऐसा गांव नहीं था जिससे लोग शहीद ही अंतिम यात्रा के साक्षी बनने न पहुंचे हों। क्या बच्चे, क्या बूढ़े हर कोई गांव की गलियों में जमा थे। शहीद को नमन करते हुए महिलाओं ने कहा कि मां नै योए दिन देखण खात्तर जाम्या था लाल।
गांव वालों ने आज पूरे गांव को तिरंगे झंडों से सजाया था। रास्ते में कई जगह पर तिरंगी रंगोलियां बनाकर लिख दिया था हमारा राजेश अमर रहे। एक बजे तक पहुंचने की सूचना थी लेकिन राजेश का पार्थिव शरीर पांच बजे के बाद आया। उसका स्वागत करने के लिए पिहोवा से लेकर भागल तक हाथ से हाथ पकड़े लोग ही लोग खड़े थे। एक हजार से ज्यादा मोटर साइकिल भागल से काफी पहले फौज की गाड़ी के आगे-आगे चल रहे थे।
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अपने फौजी साथियों के कंधों पर घर पहुंचे शहीद के लिए सभी ने श्रद्धा से हाथ जोड़े लेकिन मां कृष्णा ने बेटे का माथा चूमकर आंखें बंद कर ली जैसे आखिरी विदाई के लिए अपने आपको तैयार कर रही हो। मां बोली, अपने दूसरे बेटे को भी सेना में ही भर्ती कराऊंगी। भाई रामफल भी बोला जिस रास्ते भाई गया है, उसी रास्ते पर गया तो इससे बेहतर और हो भी क्या सकता है।
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सेना की टुकड़ी ने फिर अपने वीर के ताबूत को कंधे पर उठा लिया। फिर उसी फौजी गाड़ी में उसे विराजमान किया और आखिरी मंजिल की तरफ लेकर चल पड़े। एक बार फिर भावनाओं का ज्वार बह निकला। लोग रो रहे थे पर साथ ही भारत माता की जय जैसे गर्वीले नारे भी लगा रहे थे। श्मशान घाट में राजेश को पूरे राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी गई। यह पहली बार था कि गांव के श्मशान घाट में सैकड़ों महिलाएं भी पहुंचीं थी। 80 साल की छोटी देवी बोली लुगाइयां का उरै आणा माड़ा मान्या जै म्हारे गाम मैं पर आज नहीं रूक्या जांदा। शहीद राजेश के बचपन का साथी गुरजंट बोला कि मर जाने और शहीद होने में क्या फर्क होता है, आज ही जाना है।