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शीतला सप्तमी पर्व पर माथा टेक मांगी मन्नतें, शीतला मां के मंदिरों में उमड़ी हजारों की भीड़
Updated Thu, 08 Mar 2018 11:45 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
कैथल। जिलाभर में वीरवार को शीतला सप्तमी का पर्व धूमधाम से मनाया। इस मौके पर माता गेट पर स्थित शीतला माता के मंदिरों में हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। लोगों ने माथा टेक अपनी मनोकामनाएं मांगी। राजौंद में इस पर्व पर हजारों श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना कर सुख समृद्धि की कामना की। गुरुवार को सुबह तीन बजे शुरू हुआ यह मेला दोपहर 12 बजे तक चलता रहा। मेले में सभी बिरादरी के लोगों ने पहुंचकर माता शीतला की पूजा अर्चना की। भारी संख्या में पहुंचे भक्तों ने मां शीतला कि पूजा-अर्चना कर अपनी एवं परिवार कि सुख-समृद्धि के लिए मन्नतें मांगी। जिनकी मन्नतें पूरी हुई उन्होंने अपने बच्चों के मुंडन भी करवाए। दुर्गा मंदिर में इस दिन सभी बिरादरी के लोग मत्था टेकने के लिए भारी संख्या में पहुंचे, नगर के जो लोग अन्य शहरों में रह रहे हैं वह भी इस दिन शीतला माता के मंदिर में अवश्य पहुंचते है। इस त्यौहार को बासड़ों के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन लोग एक दिन पहलेे बनाए गए खाद्य पदार्थ सुबह मंदिर में चढ़ाकर अपने परिवार की सुख शांति के लिए मन्नतें मांगते हैं। इस दिन महिलाएं, बच्चे व पुरुषों ने भारी संख्या में पहुंचकर पूजा अर्चना की। जिन लोगों की मन्नत पूरी होती है वह लोग इस दिन अपने बच्चों का मुंडन भी करवाते है। इस दौरान मंदिर कमेटी के अध्यक्ष देवेंद्र भनोट, भारत भूषण, सदस्य सतपाल मित्तल, पवन मित्तल, सुरेश मित्तल, सुभाष रावल, दुर्गा दास शर्मा, मनमोहन भनोट, पंडित रामपाल, नरेंद्र शर्मा, अमन राणा, रमेश कुमार, मनोज शर्मा, शुभम शर्मा, रोहित, राहुल, अनिल, मनोज इत्यादि का भरपूर सहयोग रहा।
धूमधाम से संपन्न हुआ वार्षिक मेला
अमर उजाला ब्यूरो
कलायत। होली के एक सप्ताह पश्चात शीतला माता पर आयोजित होने वाला वाषक मेला आज धूमधाम से संपन्न हो गया। मेला मंदिर के बाहर अनेक अस्थायी दुकानें लगी हुई थी। नगर के लगभग प्रत्येक घर से परिवार के सदस्यों ने माता के मंदिर में आकर पूजा अर्चना की। मंदिर के मुख्य पुजारी वेदप्रकाश गौतम ने बताया कि इस मंदिर में सदियों से ही पूजा अर्चना करने का यह सिलसिला चला हुआ है। यह त्यौहार होलिका दहन के एक सप्ताह पश्चात आता है। उन्होंने बताया कि इस त्यौहार पर माता शीतला को बासी भोजन का प्रसाद लगाया जाता है। त्यौहार के पहले दिन महिलाएं मीठी रोटी या मीठे चावल बनाती हैं जिससे अगली सुबह माता के मंदिर में पूजा व भोग लगाया जाता है। शीतला माता को बूढ़ी माता भी कहा जाता है तथा मेले को स्थानीय भाषा में बासड़े के त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है। गौतम ने बताया कि यह त्यौहार शीली सप्तमी के दिन आता है जिसे पूरी तरह से शुद्ध माना जाता है जिसके चलते ही विवाह शादी के अलावा किसी भी पावन कार्य के लिए इस दिन को बिना पूछे तय कर लिया जाता है।
ौराहा व बारली माता की भी इसी दिन होती है प
शीतला माता पर पूर्व अर्चना के पश्चात श्रद्धालुओं द्वारा रास्ते में आने वाली चौराहे पर पानी डाल जहां उसे शुद्ध किया जाता है वहीं यहां पूजा अर्चना के तौर पर पकवान भी चढ़ाया जाता है। इसके पश्चात जाहर पीर वीर गोगा जी के पास बनी बारली माता पर भी पूजा अर्चना की जाती है। सभी स्थानों पर इस कद्र भीड़ का आलम होता है कि श्रद्धालुओं का जहां इंतजार करना पड़ता है वहीं जगह-जगह चावल पड़े होने के कारण बनी फिसलन के चलते यह भी भय बना रहता है कि कहीं पैर ही न फिसल जाए। चौराहे पर की गई पूजा अर्चना पर जो सामान चढ़ावे के तौर पर चढ़ाया जाता है उसे खाने के लिए पशुओं का भी पूरा जमावड़ा उस स्थल पर बना रहता है।
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शीतला सप्तमी पर्व पर माथा टेक मांगी मन्नतें, शीतला मां के मंदिरों में उमड़ी हजारों की भीड़
फोटो नंबर-1 से 3 व 44
कैथल। जिलाभर में वीरवार को शीतला सप्तमी का पर्व धूमधाम से मनाया। इस मौके पर माता गेट पर स्थित शीतला माता के मंदिरों में हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। लोगों ने माथा टेक अपनी मनोकामनाएं मांगी। राजौंद में इस पर्व पर हजारों श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना कर सुख समृद्धि की कामना की। गुरुवार को सुबह तीन बजे शुरू हुआ यह मेला दोपहर 12 बजे तक चलता रहा। मेले में सभी बिरादरी के लोगों ने पहुंचकर माता शीतला की पूजा अर्चना की। भारी संख्या में पहुंचे भक्तों ने मां शीतला कि पूजा-अर्चना कर अपनी एवं परिवार कि सुख-समृद्धि के लिए मन्नतें मांगी। जिनकी मन्नतें पूरी हुई उन्होंने अपने बच्चों के मुंडन भी करवाए। दुर्गा मंदिर में इस दिन सभी बिरादरी के लोग मत्था टेकने के लिए भारी संख्या में पहुंचे, नगर के जो लोग अन्य शहरों में रह रहे हैं वह भी इस दिन शीतला माता के मंदिर में अवश्य पहुंचते है। इस त्यौहार को बासड़ों के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन लोग एक दिन पहलेे बनाए गए खाद्य पदार्थ सुबह मंदिर में चढ़ाकर अपने परिवार की सुख शांति के लिए मन्नतें मांगते हैं। इस दिन महिलाएं, बच्चे व पुरुषों ने भारी संख्या में पहुंचकर पूजा अर्चना की। जिन लोगों की मन्नत पूरी होती है वह लोग इस दिन अपने बच्चों का मुंडन भी करवाते है। इस दौरान मंदिर कमेटी के अध्यक्ष देवेंद्र भनोट, भारत भूषण, सदस्य सतपाल मित्तल, पवन मित्तल, सुरेश मित्तल, सुभाष रावल, दुर्गा दास शर्मा, मनमोहन भनोट, पंडित रामपाल, नरेंद्र शर्मा, अमन राणा, रमेश कुमार, मनोज शर्मा, शुभम शर्मा, रोहित, राहुल, अनिल, मनोज इत्यादि का भरपूर सहयोग रहा।
धूमधाम से संपन्न हुआ वार्षिक मेला
अमर उजाला ब्यूरो
कलायत। होली के एक सप्ताह पश्चात शीतला माता पर आयोजित होने वाला वाषक मेला आज धूमधाम से संपन्न हो गया। मेला मंदिर के बाहर अनेक अस्थायी दुकानें लगी हुई थी। नगर के लगभग प्रत्येक घर से परिवार के सदस्यों ने माता के मंदिर में आकर पूजा अर्चना की। मंदिर के मुख्य पुजारी वेदप्रकाश गौतम ने बताया कि इस मंदिर में सदियों से ही पूजा अर्चना करने का यह सिलसिला चला हुआ है। यह त्यौहार होलिका दहन के एक सप्ताह पश्चात आता है। उन्होंने बताया कि इस त्यौहार पर माता शीतला को बासी भोजन का प्रसाद लगाया जाता है। त्यौहार के पहले दिन महिलाएं मीठी रोटी या मीठे चावल बनाती हैं जिससे अगली सुबह माता के मंदिर में पूजा व भोग लगाया जाता है। शीतला माता को बूढ़ी माता भी कहा जाता है तथा मेले को स्थानीय भाषा में बासड़े के त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है। गौतम ने बताया कि यह त्यौहार शीली सप्तमी के दिन आता है जिसे पूरी तरह से शुद्ध माना जाता है जिसके चलते ही विवाह शादी के अलावा किसी भी पावन कार्य के लिए इस दिन को बिना पूछे तय कर लिया जाता है।
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ौराहा व बारली माता की भी इसी दिन होती है प
शीतला माता पर पूर्व अर्चना के पश्चात श्रद्धालुओं द्वारा रास्ते में आने वाली चौराहे पर पानी डाल जहां उसे शुद्ध किया जाता है वहीं यहां पूजा अर्चना के तौर पर पकवान भी चढ़ाया जाता है। इसके पश्चात जाहर पीर वीर गोगा जी के पास बनी बारली माता पर भी पूजा अर्चना की जाती है। सभी स्थानों पर इस कद्र भीड़ का आलम होता है कि श्रद्धालुओं का जहां इंतजार करना पड़ता है वहीं जगह-जगह चावल पड़े होने के कारण बनी फिसलन के चलते यह भी भय बना रहता है कि कहीं पैर ही न फिसल जाए। चौराहे पर की गई पूजा अर्चना पर जो सामान चढ़ावे के तौर पर चढ़ाया जाता है उसे खाने के लिए पशुओं का भी पूरा जमावड़ा उस स्थल पर बना रहता है।
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फोटो नंबर-1 से 3 व 44