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Jind News: कोथली की मिठास फीकी, यादों में सिमट गई सावन की पारंपरिक सुहाली
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5 जुलाना 01: मिट्टी के चुल्हे पर सुहाली बनाती महिला। संवाद
जुलाना। सावन का महीना आते ही हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के घरों में सुहाली की खुशबू बिखर जाती थी लेकिन अब यह यादों में सिमट कर रह गई है। सुहाली की जगह अब बाजार में मिलने वाले बिस्कुट, नमकीन, चॉकलेट और अन्य पैक्ड खाद्य पदार्थों ने ले ली है।
एक समय था जब सावन में विवाहित बेटियों के लिए भेजी जाने वाली कोथली बिना सुहाली के अधूरी मानी जाती थी। महिलाएं घर पर कठोर आटे में गुड़ मिलाकर विशेष विधि से सुहाली तैयार करती थीं और उसे सरसों के तेल में तलती थीं।
शुद्ध सामग्री से बनी यह सुहाली स्वादिष्ट होने के साथ-साथ लंबे समय तक सुरक्षित भी रहती थी। यही वजह थी कि इसे बेटी के ससुराल तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए लोहे के टीन में पैक कर भेजा जाता था। कई दिनों बाद भी इसका स्वाद और कुरकुरापन बरकरार रहता था। आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। नई पीढ़ी पारंपरिक सुहाली से अनजान होती जा रही है। संवाद
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पहले हर घर में कोथली के लिए सुहाली बनाई जाती थी। इसका स्वाद आज भी याद है लेकिन अब घर में इसे बनाने का चलन लगभग खत्म हो गया है। परिवार के लोग खेतों में जाते समय भी सुहाली को खाते थे लेकिन अब सुहाली लुप्त हो चुकी है। -रामो
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बाजार के सामान ने परंपरागत व्यंजनों की जगह ले ली है। पहले घर की बनी सुहाली में अपनापन और शुद्धता दोनों होती थीं। जिसे बेटी के ससुराल पक्ष के लोग बड़े चाव से खाते थे। - राजल
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सुहाली कई दिनों तक खराब नहीं होती थी इसलिए इसे बेटी की कोथली में जरूर रखा जाता था। आज की पीढ़ी शायद इसका नाम भी नहीं जानती। सुहाली बेटी के घर तक सही पहुंचे इसके लिए सुहाली को लोहे के टीन में पैक करके भेजा जाता था। - मामो
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हमें अपनी पुरानी परंपराओं और व्यंजनों को बचाने का प्रयास करना चाहिए। बच्चों को भी सुहाली जैसी पारंपरिक चीजों का स्वाद और महत्व बताना जरूरी है। बाजार में मिलावटी सामान की बजाए घर पर तैयार सुहाली ही बेटी की कोथली में देनी चाहिए। - सुनेहरी
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एक समय था जब सावन में विवाहित बेटियों के लिए भेजी जाने वाली कोथली बिना सुहाली के अधूरी मानी जाती थी। महिलाएं घर पर कठोर आटे में गुड़ मिलाकर विशेष विधि से सुहाली तैयार करती थीं और उसे सरसों के तेल में तलती थीं।
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शुद्ध सामग्री से बनी यह सुहाली स्वादिष्ट होने के साथ-साथ लंबे समय तक सुरक्षित भी रहती थी। यही वजह थी कि इसे बेटी के ससुराल तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए लोहे के टीन में पैक कर भेजा जाता था। कई दिनों बाद भी इसका स्वाद और कुरकुरापन बरकरार रहता था। आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। नई पीढ़ी पारंपरिक सुहाली से अनजान होती जा रही है। संवाद
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पहले हर घर में कोथली के लिए सुहाली बनाई जाती थी। इसका स्वाद आज भी याद है लेकिन अब घर में इसे बनाने का चलन लगभग खत्म हो गया है। परिवार के लोग खेतों में जाते समय भी सुहाली को खाते थे लेकिन अब सुहाली लुप्त हो चुकी है। -रामो
बाजार के सामान ने परंपरागत व्यंजनों की जगह ले ली है। पहले घर की बनी सुहाली में अपनापन और शुद्धता दोनों होती थीं। जिसे बेटी के ससुराल पक्ष के लोग बड़े चाव से खाते थे। - राजल
सुहाली कई दिनों तक खराब नहीं होती थी इसलिए इसे बेटी की कोथली में जरूर रखा जाता था। आज की पीढ़ी शायद इसका नाम भी नहीं जानती। सुहाली बेटी के घर तक सही पहुंचे इसके लिए सुहाली को लोहे के टीन में पैक करके भेजा जाता था। - मामो
हमें अपनी पुरानी परंपराओं और व्यंजनों को बचाने का प्रयास करना चाहिए। बच्चों को भी सुहाली जैसी पारंपरिक चीजों का स्वाद और महत्व बताना जरूरी है। बाजार में मिलावटी सामान की बजाए घर पर तैयार सुहाली ही बेटी की कोथली में देनी चाहिए। - सुनेहरी

5 जुलाना 01: मिट्टी के चुल्हे पर सुहाली बनाती महिला। संवाद

5 जुलाना 01: मिट्टी के चुल्हे पर सुहाली बनाती महिला। संवाद

5 जुलाना 01: मिट्टी के चुल्हे पर सुहाली बनाती महिला। संवाद

5 जुलाना 01: मिट्टी के चुल्हे पर सुहाली बनाती महिला। संवाद